नई दिल्ली: दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 मामले में एक नया और महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ देखने को मिल रहा है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) में अलग-अलग अर्जी दाखिल कर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) की पोषणीयता (Maintainability) पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अरविंद केजरीवाल और सिसोदिया ने अदालत से गुहार लगाई है कि सीबीआई द्वारा दायर इस पुनरीक्षण याचिका को सीधे तौर पर खारिज किया जाए, क्योंकि यह कानूनी रूप से पोषणीय नहीं है और इसे बेहद जल्दबाजी व गैर-गंभीर तरीके से दायर किया गया है।
यह मामला न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ के समक्ष 17 और 18 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। इससे पहले, 16 जुलाई को हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी (AAP) नेता दुर्गेश पाठक को सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए अंतिम अवसर प्रदान किया था।
मामला क्या है? (CBI बनाम अरविंद केजरीवाल एवं अन्य)
दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को लेकर सीबीआई ने अगस्त 2022 में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी। लंबी जांच और पांच चार्जशीट दाखिल करने के बाद एजेंसी ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक समेत 23 लोगों को आरोपी बनाया था।
राउज़ एवेन्यू कोर्ट का 27 फरवरी का डिस्चार्ज आदेश
27 फरवरी 2026 को राउज़ एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य सभी 23 आरोपियों को सभी आरोपों से मुक्त (Discharge) कर दिया था। अदालत ने अपने 549 पन्नों और 1,135 पैराग्राफ वाले विस्तृत आदेश में कहा था कि जांच एजेंसी आरोपियों के खिलाफ कोई भी ठोस या प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रही है।
सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका और आप नेताओं का रुख
अधीनस्थ अदालत द्वारा आरोपियों को डिस्चार्ज किए जाने के तुरंत बाद, सीबीआई ने इस आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में एक पुनरीक्षण याचिका दायर की। अब अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने इसी याचिका की वैधता को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में प्राथमिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने हाई कोर्ट में क्या दलीलें दीं?
अदालत में दायर अपनी पृथक याचिकाओं में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने सीबीआई की कार्यप्रणाली और याचिका की गुणवत्ता पर कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
| क्र. सं. | मुख्य कानूनी आपत्ति | विवरण |
| 1 | अभूतपूर्व जल्दबाजी | फैसला आने के मात्र 4 घंटे के भीतर याचिका दर्ज। |
| 2 | अध्ययन का अभाव | 549 पन्नों का फैसला पढ़े बिना 36 पन्नों की अर्जी। |
| 3 | अस्पष्ट आरोप | आरोपीवार या पैराग्राफवार त्रुटियों का उल्लेख नहीं। |
| 4 | क्षेत्राधिकार का उल्लंघन | रिवीजन के नाम पर अपील (Appeal) का प्रयास। |
‘अभूतपूर्व जल्दबाजी और बेहद गैर-गंभीर रवैया’
अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने कोर्ट में कहा कि सीबीआई ने यह पुनरीक्षण याचिका “अभूतपूर्व जल्दबाजी” और “बेहद अमानक व गैर-गंभीर तरीके” से दायर की है। अर्जी में बताया गया कि विशेष न्यायाधीश द्वारा 549 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाए जाने के महज चार घंटे के भीतर ही सीबीआई ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। अरविंद केजरीवाल का तर्क है कि इतने कम समय में 500 से अधिक पन्नों के कानूनी निष्कर्षों का अध्ययन करना और उसमें विधिक त्रुटियां ढूंढना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
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549 पन्नों का फैसला बनाम 36 पन्नों की याचिका
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि जहां ट्रायल कोर्ट का डिस्चार्ज फैसला 549 पन्नों और 1,135 पैराग्राफों में फैला हुआ है, वहीं सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका केवल 36 पन्नों की है। अरविंद केजरीवाल के अनुसार, सीबीआई यह स्पष्ट करने में पूरी तरह नाकाम रही है कि फैसले के किस विशिष्ट पैराग्राफ या किस निष्कर्ष में कोई कानूनी खराबी, विकृति (Perversity) या अनियमितता है।
‘रिवीजन के नाम पर अपील दाखिल करने की कोशिश’
मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल ने अपनी दलीलों में कहा कि सीबीआई की यह याचिका कानूनन ‘पुनरीक्षण’ की श्रेणी में नहीं आती, बल्कि यह ‘रिवीजन के मुखौटे में अपील’ (Appeal in the garb of Revision) है। आपराधिक कानून के तहत पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction) का दायरा अत्यंत सीमित होता है। इसका उपयोग केवल तभी किया जा सकता है जब निचली अदालत के फैसले में कोई गंभीर कानूनी त्रुटि हो या अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन हुआ हो। मात्र साक्ष्यों को दोबारा परखने के लिए रिवीजन का सहारा नहीं लिया जा सकता।
कानूनी पहलू: क्या पुनरीक्षण याचिका की शर्तें पूरी होती हैं?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च न्यायालय का पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (Section 397/401 CrPC / BNSS) सीमित परिस्थितियों में लागू होता है:
- न्यायसंगत त्रुटि: जब अधीनस्थ न्यायालय ने किसी स्पष्ट कानूनी नियम का उल्लंघन किया हो।
- साक्ष्यों की अनदेखी: जब ऐसा कोई ठोस सबूत छोड़ दिया गया हो जो मामले का रुख बदल सकता था।
- मनमाना निर्णय: जब अदालत का फैसला पूरी तरह तर्कहीन या साक्ष्यों के विपरीत हो।
अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया का पक्ष है कि सीबीआई ने अपनी याचिका में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं दर्शाया है। याचिका में केवल जांच एजेंसी के पुराने तथ्यों का पुनरावर्तन (Re-narration) किया गया है, न कि डिस्चार्ज ऑर्डर की किसी कानूनी खामी को चिन्हित किया गया है। यदि ऐसी अस्पष्ट और गैर-विशिष्ट याचिकाओं को स्वीकार किया जाता है, तो इससे प्रतिवादियों (आरोपियों) के अधिकारों को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
दिल्ली हाई कोर्ट में 17-18 अगस्त की सुनवाई क्यों है बेहद अहम?
न्यायमूर्ति मनोज जैन की अदालत 17 और 18 अगस्त को इस मामले की सुनवाई करेगी। इस सुनवाई में मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर विचार किया जाएगा:
- पोषणीयता पर निर्णय: क्या सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका सुनवाई योग्य है या इसे अरविंद केजरीवाल व सिसोदिया की आपत्तियों के आधार पर खारिज किया जाना चाहिए?
- अंतरिम आदेश का भविष्य: हाई कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेशों की स्थिति क्या रहेगी?
इससे पूर्व सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले की महत्ता को देखते हुए जुलाई में ही जल्द सुनवाई का अनुरोध किया था, लेकिन हाई कोर्ट ने रोस्टर और समय की सीमा को देखते हुए अगस्त मध्य की तिथि निर्धारित की थी।
दिल्ली आबकारी नीति मामले का पूरा घटनाक्रम
- अगस्त 2022: सीबीआई ने दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 में कथित गड़बड़ियों को लेकर FIR दर्ज की।
- 2022-2024: मनीष सिसोदिया और बाद में अरविंद केजरीवाल सहित कई नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं तथा पांच पूरक आरोप पत्र दाखिल किए गए।
- 27 फरवरी 2026: राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने तीन महीने की विस्तृत सुनवाई के बाद अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य सभी 23 आरोपियों को मामले से डिस्चार्ज (आरोपमुक्त) कर दिया।
- 27 फरवरी 2026 (4 घंटे बाद): सीबीआई ने डिस्चार्ज फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी।
- 16 जुलाई 2026: दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और अन्य को जवाब के लिए अंतिम अवसर दिया।
- 13 अगस्त 2026: अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने सीबीआई की याचिका खारिज करने के लिए हाई कोर्ट में आवेदन दाखिल किया।
- 17-18 अगस्त 2026: दिल्ली हाई कोर्ट में मुख्य आपत्तियों पर महत्वपूर्ण सुनवाई।
अकसर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने दिल्ली हाई कोर्ट में क्या याचिका दायर की है?
उत्तर: अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने आबकारी नीति मामले में उन्हें आरोपमुक्त किए जाने के खिलाफ सीबीआई द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने कोर्ट से कहा है कि सीबीआई की यह याचिका पोषणीय नहीं है और इसे बहुत जल्दबाजी व बिना विचार किए दायर किया गया है।
Q2. आम आदमी पार्टी के नेताओं ने सीबीआई की याचिका पर क्या मुख्य आपत्ति जताई है?
उत्तर: आप नेताओं की मुख्य आपत्ति यह है कि सीबीआई ने 549 पन्नों के डिस्चार्ज फैसले के आने के मात्र चार घंटे के भीतर ही 36 पन्नों की रिवीजन पिटीशन दाखिल कर दी। अरविंद केजरीवाल के मुताबिक, इतने कम समय में इतने लंबे फैसले की कानूनी कमियों का आकलन करना असंभव है।
Q3. राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने 27 फरवरी को आबकारी मामले में क्या फैसला दिया था?
उत्तर: 27 फरवरी 2026 को राउज़ एवेन्यू अदालत के विशेष न्यायाधीश ने तीन महीने से अधिक समय तक मामले की विस्तार से सुनवाई करने के बाद अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक सहित सभी 23 आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में पूरी तरह आरोपमुक्त (Discharge) कर दिया था।
Q4. पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) और अपील (Appeal) में क्या अंतर है?
उत्तर: पुनरीक्षण याचिका केवल निचली अदालत के फैसले में कानूनी त्रुटि, क्षेत्राधिकार के दुरुपयोग या गंभीर विकृति को सुधारने के लिए होती है, जबकि अपील में पूरे मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन किया जाता है। अरविंद केजरीवाल का तर्क है कि सीबीआई रिवीजन के नाम पर अपील का प्रयास कर रही है।
Q5. दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
उत्तर: दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति मनोज जैन 17 और 18 अगस्त 2026 को सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका और इसके खिलाफ अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया द्वारा दाखिल की गई पोषणीयता संबंधी आपत्तियों पर सुनवाई करेंगे।
दिल्ली आबकारी नीति मामले में कानूनी लड़ाई अब एक अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच चुकी है। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया द्वारा उठाई गई प्राथमिक आपत्तियां केवल प्रक्रियात्मक नहीं हैं, बल्कि वे आपराधिक न्याय प्रणाली के मूलभूत सिद्धांतों से जुड़ी हैं।
यदि दिल्ली हाई कोर्ट अरविंद केजरीवाल और सिसोदिया की दलीलों से सहमत होता है कि सीबीआई की याचिका में कोई विशिष्ट कानूनी त्रुटि नहीं दर्शायी गई है और यह केवल एक जल्दबाज़ी में उठाया गया कदम था, तो सीबीआई के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। वहीं दूसरी ओर, यदि कोर्ट सीबीआई की याचिका को सुनवाई योग्य मानता है, तो मामले के तथ्यों पर पुनः बहस शुरू होगी। 17 और 18 अगस्त की सुनवाई यह तय करेगी कि यह चर्चित आबकारी केस कानूनी रूप से किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
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