ब्रिटिश डॉ. ने खोजा था ब्लड चिकित्सा फिर बना ब्लड बैक, घायल सैनिकों को बचाने भारत में शुरू हुआ था रक्तदान

रक्तदान दिवस। रक्तदान चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी जीवनरक्षक खोजों में से एक है, जिसने प्राचीनकाल की दर्दनाक चिकित्सा पद्धतियों से लेकर आज तक का एक लंबा और रोमांचक सफर तय किया है। रक्तदान ऐसी अनमोल प्रक्रिया है जो किसी फैक्ट्री में नहीं, केवल मानव शरीर में बनती है। आज सुरक्षित रक्तदान प्रणालियों के तहत एक यूनिट खून से 4 लोगों की जान बचाई जा सकती है।

बीमारी में निकाला जाता था खून

प्राचीन काल आधुनिक चिकित्सा से पहले, सदियों तक गले की खराश से लेकर प्लेग तक हर बीमारी के इलाज के लिए शरीर से खून निकालने का चलन था। इसमें मिस्र के लोग और मध्ययुगीन यूरोपीय चिकित्सक जोंक (स्ममबीमे) का इस्तेमाल करते थे। यह प्रक्रिया अक्सर मरीजों के लिए घातक साबित होती थी।

वैज्ञानिक शुरुआत (17वीं-19वीं सदी)1628

शुरूआत ब्रिटिश चिकित्सक डॉ. विलियम हार्वे ने खोज की कि रक्त पूरे शरीर में कैसे संचारित होता है। इससे रक्त आधान की वैज्ञानिक नींव पड़ी। 1818 में डॉ. जेम्स ब्लंडेल ने एक विशेष उपकरण का आविष्कार किया और इतिहास का पहला सफल मानव-से-मानव रक्त आधान किया।

रक्त समूहों की खोज फिर ब्लड बैंक

ऑस्ट्रियाई पैथोलॉजिस्ट डॉ. कार्ल लैंडस्टीनर ने 20वीं सदी यानि की 1901 में रक्त समूहों की खोज की, इससे पता चला कि सभी का खून एक-दूसरे को नहीं चढ़ाया जा सकता। बाद में उन्हें इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। अब खून को सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती थी। शरीर के बाहर जमने से बचाने के लिए बेल्जियम के डॉ. हुस्टिन ने 1914 में एंटीकोगुलेंट तकनीक खोजी। 1932 में रूस के डॉ. आंद्रे बगडारसोव ने दान किए गए रक्त को 21 दिनों तक स्टोर करने की विधि विकसित की, जिससे दुनिया का पहला ब्लड बैंक बना।

आधुनिक रक्तदान और भारत

भारत में स्वैच्छिक रक्तदान की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई थी। घायल सैनिकों की जान बचाने के लिए लोगों ने रक्तदान किया। 1939 भारत का पहला ब्लड बैंक कलकत्ता में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ में खोला गया था। 1975-1970 के दशक तक खून को कांच की बोतलों में रखा जाता था। 1975 में कांच की बोतलों की जगह आज की तरह सुरक्षित और सुविधाजनक प्लास्टिक ब्लड बैग ने ले ली।

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