Yogi Adityanath Krishna Janambhumi Video: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 (Uttar Pradesh Assembly Election 2027) में सिर्फ आठ महीने का समय बाकी है, इस बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) के ताजा बयान—“अब बारी बांके बिहारी की, कृष्ण कन्हैया की”—ने प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे दी है। राजनीतिक गलियारों में इस बयान को केवल एक धार्मिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भाजपा के संभावित चुनावी एजेंडे के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को चुनौती देते हुए कहा कि वे श्रीकृष्ण जन्मभूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के अभियान में अपना रुख स्पष्ट करें। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा मथुरा को अयोध्या के बाद अपने अगले बड़े सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श के रूप में सामने ला सकती है।
सीएम योगी के बयान से इतना तो साफ़ है कि उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए अगला नारा अबकी बारी बांके बिहारी ही होगा। कृष्णजन्मभूमि का इतिहास और इसकी लड़ाई भी श्रीराम जन्मभूमि जितनी ही पेचीदा और बड़ी है. करोड़ों सनातनियों की आस्था का विषय है. सीएम योगी का नया नारा और चुनौती ने विपक्ष की राह को और मुश्किल कर दिया है.
लेकिन बीजेपी का चुनावी एजेंडा सिर्फ कृष्णजन्मभूमि पर निर्भर नहीं रहेगा। दो और धार्मिक स्थल हैं जिन्हे बीजेपी अपना एजेंडा बना सकती है.
पहला है वाराणसी का ज्ञानवापी: ज्ञानवापी विवाद पहले से ही राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र रहा है। परिसर के विभिन्न हिस्सों को लेकर अदालतों में सुनवाई जारी है। ASI के सर्वे विपक्ष के दावों को चुनती देते हैं. भाजपा सीधे अदालत की प्रक्रिया पर टिप्पणी करने से बचती रही है, लेकिन पार्टी के कई नेता काशी के धार्मिक महत्व को लगातार प्रमुखता से उठाते रहे हैं। ऐसे में यह मुद्दा भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकता है।
दूसरा संभल मस्जिद/ हरिहर मंदिर: संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि वहां प्राचीन हरिहर मंदिर था। इस मामले में भी न्यायालय की निगरानी में कानूनी प्रक्रिया जारी है। यदि सुनवाई आगे बढ़ती है या कोई महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम होता है, तो यह भी चुनावी विमर्श में प्रमुख स्थान पा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन तीनों मुद्दों पर विपक्ष की राह आसान नहीं है। यदि विपक्ष धार्मिक दावों का खुलकर विरोध करता है, तो भाजपा उस पर आस्था के विरोध का आरोप लगा सकती है। वहीं यदि समर्थन करता है, तो उसकी पारंपरिक राजनीति और वोट बैंक की रणनीति प्रभावित हो सकती है। यानी सीएम योगी ने एक तरह से विपक्ष को ऐसी जगह पर लाकर खड़ा करने की कोशिश की है जहां आगे कुआं है और पीछे खाई है.
फिलहाल इतना तय है कि 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव केवल विकास और कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह सकता। यदि आने वाले महीनों में श्रीकृष्ण जन्मभूमि, ज्ञानवापी और संभल से जुड़े मामलों में कोई बड़ा कानूनी या राजनीतिक घटनाक्रम होता है, तो ये तीनों मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में आ सकते हैं।




