रीवा। डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा समय से पुरीधाम की तर्ज पर रीवा जिले में रथ यात्रा महोत्सव का आयोजन होता आ रहा है। इस रथ यात्रा को लेकर रीवा के भगवान के भक्तों में अपार उत्साह रहता है और जगह-जगह रथ यात्रा का स्वागत किया जाता है, दरअसल भगवान जगन्नाथ को लेकर जो कथायें प्रचलित है उसमें जेष्ठ माह की पूर्णिमा को दिव्य स्रान के बाद उन्हें लू लग जाती है और वे अपने बड़े भाई बलभद्र तथा सुभद्रा के साथ गर्भ ग्रह से बाहर आ जाते हैं। पन्द्रह दिनों तक उनकी विशेष देख भाल की जाती है। उनके स्वस्थ होने पर परम्परा के तहत यह रथ यात्रा आयोजित की जाती है।
रीवा के महाराज भाव सिंह ने की थी शुरूआत
पुराने ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसासर रीवा में जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत 17वीं शताब्दी में रीवा राजघराने के महाराजा भाव सिंह ने की थी। उन्होंने 1664 में पुरी की तर्ज पर रीवा में भगवान जगन्नाथ के मंदिरों का निर्माण कराया था। तब से हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया पर यह यात्रा निकाली जाती है। यह यात्रा केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि इसे असीम पुण्य और मोक्ष का मार्ग माना जाता है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से भगवान के रथ की डोर खींचता है, उसके सभी कष्ट और पाप दूर हो जाते हैं।
भगवान खुद जाते है भक्तों के पास
दरअसल पुरीधाम में भगवान श्री के गर्भग्रह में प्रवेश को लेकर कुछ प्रतिबंध लगे हुए है, जिसका सख्ती से पालन किया जाता है। जिसकी वजह से भक्तों को उनके दर्शन के लिए मुख्य द्वार के समीप से ही पूजा अर्चना करनी पड़ती है। जबकि भगवान स्वयं वर्ष में एक बार अपने भक्तों का हाल-चाल जानने के लिए खुद रथ पर सवार को होकर भ्रमण पर निकलते हैं। यही वजह है कि इसे श्रद्धालु जो भगवान श्री दर्शन मंदिर के भीतर नहीं कर पाते थे। उनके लिए यह अवसर अत्यंत लाभदायक रहता है। यही वजह है कि न केवल पुरीधाम बल्कि जिले में भी भारी संख्या में श्रद्धालु प्रभु का दर्शन एवं पूजा अर्चना करने के लिए सड़क पर आते हैं।
इस मार्ग से चलती है रथयात्रा
यहां गौरतलब बात यह है कि रथ यात्रा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 16 जुलाई को लक्ष्मण बाग से शुरू हुई, जो वहां से चलकर सीधे किला पहुंची। जहां उनकी विधिवत पूजा अर्चना की गई। यात्रा फोर्ट रोड, स्टेच्यू चौराहा से होते हुए जय स्तंभ, पुराना बस स्टैण्ड से होकर ताला हाउस मार्ग से मानस विश्राम करेगी। यात्रा के दौरान भगवान को जामुन, आम, बतासा का अर्पण भक्तों द्वारा किया जाएगा। वहीं रात्रि विश्राम के बाद 17 जुलाई को मानस भवन में भात, कढ़ी व मालपुआ का भोग लगाकर श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाएगा।




