The Emotional Abuse Special-साँच को लागे आंच-आज……..ये पब्लिक है ये सब जानती है

The Emotional Abuse Special-

The Emotional Abuse Special-साँच को लागे आंच-आज…..ये पब्लिक है ये सब जानती है।-बात है मौजूदा हालातों की। किसी को भी न तो अपने व्यक्तित्व की मिटटी पलीद होने की फ़िक्र है और न ही किसी को सामने का व्यव्हार सुगम बनाए रहने की परवाह। इतने पर भी लोंगो को संतुष्टि की आदत नहीं है अपनी स्वार्थ परतता के साथ वो चूमा चापलूसी में लिप्त होकर भी ऐसा कभी नहीं मानते की बुरा जो देखन मैं चला मुझसे बुरा न कोय……उनके हाव-भाव तो किसी सुपीरियर परश्नेलिटी की ही नहीं बल्कि सेलिब्रिटी की तरह एटीट्यूड रखने वाले होते हैं,ये सिरे से भुला कर की तुम्हारी पहचान ही इतने से शुरू होती है की तुम्हे सहारे की , बैशाखी की ज़रूरत है इसके बिना तुम चल ही नहीं सकते ,बल्कि बैठ भी नहीं सकते। तमाम सारी साजिशों में शामिल होकर भी तुम्हें इस बात से सबसे ज्यादा सरोकार और ग़ुरूर होता है की जो हुआ ही नहीं उस विषय पर तुम पीएचडी कर सकते हो और यहीं से तुम्हारी वो पहचान बनती है की लोग मुँह देखते ही तुम्हारी खोखली मुस्कराहट में अपनी हंसी घोल तो देते हैं लेकिन उन्हें अंदाज़ा होता है की इसपर भरोसा नहीं करना है।

तुम रंग तो बदल सकते हो लेकिन सच्चाई नहीं छिपा सकते,क्योंकि गिरगिट को सब जानते हैं

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इसमें कोई जेंडर फैक्ट नहीं ,ये बात समग्र रूप से सब पर लागू होती है। क्योंकि इन चंद लाइनों की खासियत ही ये है की बिना जेंडर बताए या नाम लिए ही वो चेहरा सामने उभर आएगा जिसके लिए ये इंगित है। क्योंकि इतना आसान नहीं नमकहराम होना-ये हर कोई नहीं कर सकता। लेकिन वो यानि तुम या तुमसब तो,ये काम बखूबी निभा सकते नहीं निभा रहे हो। हाँ , वो इसलिए की इनकी रगों में खून कम और ज़हर ज्यादा भरा है ,लेकिन ये भी सच है की इसके बावजूद बात – बात पर बत्तीसी दिखाना ,मसखरों की पहचान है किसी-भद्र व्यक्तित्व की नहीं। हर इंसान अपने आस-पास के माहौल से कुछ न कुछ सीखता है खासकर मुझे ये बहुत पसंद है-जो मैं हर पल हर दम सहेजते ही रहना पसंद करती हूं। लेकिन फ़िलहाल मैं बड़े लौस मैं हूँ-क्योंकि अरसा गुज़रा चोरी-चमारी,अय्यारी और मक्कारी के बीच वैंसा कीच नहीं जो मैं अपना सकूं -ख़ैर इस तरह खुद को सुरक्षित रखकर सहेजे रहना भी कोई आसान नहीं। बस यही सोचकर कि आने वाला कल कुछ ज़रूर सीखा कर जाएगा ऐसा सोचकर,कल के इंतज़ार में हूं कल तो आएगा न…….हाँ ज़रूर आज से बेहतर- बेहतरीन और बढ़कर ,हमेशा की तरह।

The Emotional Abuse Special-मासूम बनने की अदाकारी ही तुम्हारी नाकाम,हैरान परेशांन सी हयात का सबूत है

जो सहज होता है-उसे पहचान लिया जाता है,उन पारखियों से-जिसे हम दुनियां कहते हैं

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लेकिन उस फ़ितरत का मैं क्या करुँ जो हर जगह दुखी या खिन्न रहते हुए भी सब कुछ संवार के रखा की कुछ बिगड़े नहीं ,बिखरे नहीं। इसके लिए बहुत बार कितने घाटे के सौदे कर लिए-और आज तक बहुत कुछ बर्दाश्त किया लेकिन ये सिलसिला कभी तो थमेगा ये आस कभी जाती ही नहीं। कितना बुरा है-ये सब देखना कि जिन्होंने कुछ सीखा या जाना ही नहीं ,वो सीखना चाहते हैं। उस पर विडंबना ये की उन्हें सीखाने की तमीज़ भी नहीं । कह सकते हैं की जिनके पास हाथ ही नहीं वो ऊँगली पकड़ते हैं। और तो और – उनका क्या जो इनकी हिम्मत बढ़ाते हैं ,जो सही रास्तो से भटकने में उनका पूरा साथ निभाते हैं और नतीज़तन ये सब देखते हुए मैं सोचती हूं कि इस सब के बीच कहीं खुद को न खो दूँ। खुद से मेरा मतलब है-मेरे संस्कार ,मेरा आचरण और सबसे महत्वपूर्ण मेरे आदर्श। यही सोच कर हर बार फिर ख़ामोश हो जाती हूं की इनका क्या होगा। जबकि तुम इस मकाम पर भी मेरे आदर्शों के मायनों में बेकार ही नहीं, खुद से भी हर मामले में बेज़ार से नज़र आते हो,तुम्हारे चेहरे की विषैली हंसी,अच्छे,सरल,मासूम बनने की अदाकारी ही- तुम्हारी नाकाम,हैरान परेशांन सी हयात का सबूत है। पता नहीं क्यों लगता है की मैं तुम्हारे कुछ काम आऊं, बस ऐसी खवाहिश से कहना चाहूंगी की जो प्यारा होता है न , वो प्यारा बनता नहीं ,जो मासूम होता है ,वो मासूम बनता नहीं। जो सहज होता है उसे पहचान लिया जाता है-उन पारखियों की पैनी निगाहों से जिसे हम दुनिया कहते हैं……तुमने सुना ही होगा न…..ये पब्लिक है ये सब जानती है।

निष्कर्ष-अंततः ये समझ आ गया है की कुंदन को क्यों इतना तपाया और पीटा जाता है, गीली मिटटी का क्या ? दोष,जब तुम्हें आकार मिला ही नहीं….फिर भी समझ सको तो।

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