मध्य प्रदेश के सिंगरौली में होने जा रहा सबसे बड़ा विस्थापन, जमीदोज होगे 22000 घर, लाखों लोग बेघर

सिंगरौली। मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के मोरवा में अब तक का सबसे बड़ा शहरी विस्थापन होने जा रहा है। यहां कोल इंडिया की इकाई नर्दन कोल फील्ड लिमिटेड यानि एनसीएल द्वारा कोयला खदान (जयंत परियोजना) के विस्तार के लिए घरों को गिरा कर कोयला खनन का काम करेगी। इस प्रक्रिया में मोरवा शहर के 22,000 से अधिक मकान व 30,000 से ज्यादा परिवार प्रभावित होंगे। कोयले के बड़े भंडार मिलने के बाद एनसीएल ने यहां से शहर हटाने का मास्टर प्लान तैयार किया है।

2,724 मिलियन टन है यहां कोयला

सिंगरौली के मोरवा में कोयले का अकूत भंडार है। इस शहर की जमीन के नीचे 2,724 मिलियन टन कोयला दबा पड़ा है। केंद्र सरकार इसके खनन की मंजूरी दे चुकी है जिसके लिए सिंगरौली शहर की 1485 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की जा रही है। सिंगरौली में कोयला उत्तर पूर्वी भाग में करीब 220 किमी क्षेत्र में है। भारत में आमतौर पर कोल सीम की मोटाई 30 मीटर तक की होती है लेकिन सिंगरौली में यह 138 मीटर तक की बताई गई है। यहां के झिंगुदरा में तो कोल सीम 162 मीटर तक की है।

सिंगरौली का इतिहास

सिंगरौली आज कोयला भंडार के चलते देश ही नही दुनिया भर में जानी जाती है। इसके इतिहास पर नजर दौड़ाए तो 1926 से पूर्व यहां खैरवार जाति के आदिवासी राजा शासन किया करते थे. बाद में सिंगरौली का आधा हिस्सा, जिसमें उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के खंड शामिल थे, रीवा राज्य के भीतर शामिल कर लिया गया। बीस वर्ष पहले तक समूचा क्षेत्र विंध्याचल और कैमूर के पहाड़ों और जंगलों से घिरा हुआ था, जहाँ अधिकांशतः कत्था, महुआ, बाँस और शीशम के पेड़ उगते थे।

ऐसा पड़ा सिंगरौली नाम

एक पुरानी दंतकथा के अनुसार सिंगरौली का नाम ही सृंगावली पर्वतमाला से निकला है, जो पूर्व-पश्चिम में फैली है. चारों ओर फैले घने जंगलों के कारण यातायात के साधन इतने सीमित थे कि एक ज़माने में सिंगरौली अपने अतुल प्राकृतिक सौंदर्य के बावजूद काला पानी माना जाता था, जहाँ न लोग भीतर आते थे, न बाहर जाने का जोखिम उठाते थे. किंतु आज उसकी संपदा ही उसकी पहचान बन गई। स्थानीय लोग इस बड़े विस्थापन से डरे हुए हैं और मुआवजे व पुनर्वास को लेकर बेहतर व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, क्योंकि कई लोग यहां 40-50 वर्षों से रह रहे हैं।

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