डिजिटल अरेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CJI बोले- बैंक की लापरवाही से ठगी हुई तो देना होगा मुआवजा

supreme court

नई दिल्ली। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हो रही साइबर ठगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। गुरुवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अगर बैंक जरूरी सावधानी बरतने में नाकाम रहते हैं और इसी वजह से किसी ग्राहक के साथ साइबर ठगी होती है, तो बैंक को नुकसान की भरपाई करनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि संदिग्ध लेन-देन की पहचान होने पर उसे सत्यापन पूरा होने तक अस्थायी रूप से रोका जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देशों की समीक्षा करने और अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची पेश करने को कहा है। हालांकि, बैंक की जिम्मेदारी और मुआवजे से जुड़ी व्यवस्था को लागू करने के लिए प्रस्तावित नियमों की जांच अभी बाकी है।

800 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान

सुनवाई के दौरान अदालत ने डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी से होने वाले आर्थिक नुकसान पर चिंता जताई। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में अब तक ऐसे घोटालों से देश को 800 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान होने का अनुमान सामने रखा गया।

हालांकि, इस आंकड़े को पूरे साल के अंतिम सरकारी आंकड़े के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इससे पहले सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश जानकारी के मुताबिक, 2025 में डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी 58,239 शिकायतें दर्ज हुई थीं। वहीं, 2026 में 30 जून तक 16,377 शिकायतें दर्ज की गई थीं।

CJI ने पूछा- जागरूकता के बावजूद लोग ठगी का शिकार क्यों

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सवाल किया कि लगातार जागरूकता अभियान चलने और इस तरह की घटनाओं की खबरें सामने आने के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी डिजिटल अरेस्ट के जाल में कैसे फंस रहे हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि घटना के बाद रिपोर्ट तैयार करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि ठगी को समय रहते रोका जाए। CJI ने सवाल उठाया कि जब किसी खाते में असामान्य लेन-देन दिखाई देता है, तो बैंक उसे सत्यापन होने तक रोक क्यों नहीं सकते।

अदालत ने यह भी कहा कि संदिग्ध ट्रांजैक्शन की जांच के साथ संबंधित पुलिस अधिकारियों को इसकी सूचना देने की व्यवस्था होनी चाहिए।

बैंक की लापरवाही साबित हुई तो मुआवजे का प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि RBI के प्रस्तावित नियमों में ऐसे मामलों के लिए मुआवजे की व्यवस्था होनी चाहिए, जिनमें वित्तीय संस्थान जरूरी सावधानी बरतने में विफल रहे हों और इसी वजह से ग्राहक के साथ धोखाधड़ी हुई हो।

अदालत के मुताबिक, ऐसी स्थिति में पीड़ित को हुए नुकसान के बराबर मुआवजा देने का प्रावधान होना चाहिए। साथ ही, बैंकों की जवाबदेही तय करने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था भी जरूरी है।

पीठ ने RBI से सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची मांगी है, ताकि प्रस्तावित निर्देशों को लागू करने के दायरे को स्पष्ट किया जा सके। अदालत RBI के प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देश, 2026 की भी जांच करेगी।

महिला से 2.5 करोड़ रुपये की ठगी का मामला

सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस नप्पिनई ने हाल ही में एक महिला के साथ हुई ठगी का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर महिला से करीब 2.5 करोड़ रुपये ठग लिए गए।

डिजिटल अरेस्ट के मामलों में साइबर अपराधी खुद को पुलिस, CBI या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को फोन या वीडियो कॉल करते हैं। वे गिरफ्तारी, जांच या किसी कथित आपराधिक मामले का डर दिखाकर पीड़ित को मानसिक दबाव में लेते हैं और पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं।

अदालत में इस बात पर जोर दिया गया कि ऐसे मामलों में केवल लोगों को जागरूक करना पर्याप्त नहीं है। बैंकों, नियामक संस्थाओं और पुलिस के बीच ऐसा तंत्र होना चाहिए, जो संदिग्ध लेन-देन की समय रहते पहचान कर सके और ठगी गई रकम को वापस दिलाने में मदद करे।

RBI के नए नियमों पर अब नजर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी को रोकने के लिए प्रस्तावित RBI KYC संशोधन निर्देशों की समीक्षा जरूरी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन निर्देशों को 30 नवंबर 2026 तक अधिसूचित करने और 31 दिसंबर 2026 तक लागू करने का प्रस्ताव है।

अब इस मामले में आगे की सुनवाई के दौरान RBI और केंद्र सरकार को बताना होगा कि संदिग्ध लेन-देन रोकने, पुलिस को सूचना देने और पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *