बसंत पंचमी। देश भर में बसंत पंचमी का पर्व शुक्रवार यानि 23 जनवरी को मनाया जा रहा है। इस दौरान विशेषकर शिक्षा संस्थानों में विशेष आयोजन हो रहे है। बसंत पंचमी को माता सरस्वती का जन्म भी होना माना गया है। ज्ञान की देवी मां सरस्वती के इस जन्म को बसंत पंचमी उत्सव के रूप में मनाते है। खास तौर से शिक्षा संस्थानों में यह दिन उत्सव के रूप में मनाया जाता है। कई स्कूलों में सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं वार्षिकोत्सव के आयोजन भी हो रहे है। फसलों में फूल आने का इसे उत्वव मनाना भी कहते है। बसंत पंचमी को लेकर यू कहा जाए कि बसंत पंचमी से शुरू होकर यह उत्सव प्रकृति के रंगों, संगीत, नृत्य और उल्लास के साथ पूरे फाल्गुन मास तक चलता है, जो प्रेम, नई शुरुआत और ऊर्जा का प्रतीक है।
बसंत पंचमी का महत्वं
बसंत उत्सव का आगाज वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) से होता है, जो नई ऋतु के आगमन का प्रतीक है, और इस दिन पीले वस्त्र पहनकर, सरस्वती पूजा करके, गुलाल उड़ाकर, और फाग के गीत गाकर इसकी शुरुआत की जाती है, जो बाद में होली के बड़े उत्सव में बदल जाता है, खासकर पश्चिम बंगाल में टैगोर द्वारा शुरू किए गए बसंत उत्सव और पूरे भारत में पतंगबाजी व लोकगीतों के साथ, जो प्रकृति और उल्लास का त्योहार है।
इन देवों की होती है पूजा
बसंत पंचमी या श्री पंचमी हिन्दू त्यौहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती, कामदेव और विष्णु की पूजा की जाती है। यह पूजा विशेष रूप से भारत, बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करते हैं। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।

6 ऋतुओं में बेस्ट
प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन 6 ऋतुओं में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का फूल मानो सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर मांजर (बौ.र) आ जाता और हर तरफ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। भर-भर भंवरे भंवराने लगते। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा उत्सव मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती हैं। यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था।
श्रीकृष्ण और मां सरस्वती से जुड़ा है पर्व
पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी आराधना की जाएगी और तभी से इस वरदान के फलस्वरूप भारत देश में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।
वसंत पंचमी
माघ शुक्ल पंचमी- यह दिन बसंत ऋतु के पृथ्वी पर अवतरण का दिन माना जाता है, और इसी दिन से उत्सव शुरू होता है।
पीले वस्त्र और रंग- लोग पीले रंग के कपड़े पहनते हैं, जो सरसों के फूलों और प्रकृति की नई ऊर्जा का प्रतीक है।
सरस्वती पूजा- ज्ञान, संगीत और कला की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है, जिसमें किताबें, वाद्य यंत्र चढ़ाए जाते हैं।
गुलाल का प्रयोग- इसी दिन से गुलाल उड़ाना और फाग के गीत गाना शुरू हो जाता है।
पश्चिम बंगाल- डोल पूर्णिमा (होली) से एक रात पहले, सुबह-सुबह रवींद्र संगीत और नृत्य के साथ उत्सव शुरू होता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम- छात्र और प्रोफेसर मिलकर संगीत-नृत्य करते हैं और खोल दार खोल गाते हैं।
रोंग खेला- इसी दिन से रंगों के त्योहार की औपचारिक घोषणा होती है।
पतंगबाजी- आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, खासकर राजस्थान और गुजरात में बड़े मेले लगते हैं।
फसल का उत्सव- लहलहाती सरसों की फसल की पूजा होती है और पीले चावल पकाए जाते हैं।
होलिकादहन की तैयारी- उत्तर प्रदेश में इसी दिन से होलिका दहन के लिए लकड़ी इकट्ठा करने की शुरुआत होती है।
दक्षिण भारत- बिहार और ओडिशा में इसे सिरा पंचमी कहते हैं, जहाँ धरती और हल की पूजा होती है।




