Santan Saptmi Vrat 2025 : संतान सप्तमी व्रत की संपूर्ण कथा – संतान सप्तमी व्रत संतान सुख प्राप्ति का व्रत है, और इसे रखने से संतान को आरोग्य और दीर्घायु प्राप्त होती है। इस व्रत का महत्व भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर से भी कहा था। भविष्य पुराण के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि इस दिन सूर्य देव और लक्ष्मी नारायण की पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
कथा का प्रारंभ
भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि इस व्रत को सबसे पहले माता देवकी ने रखा था। कंस के अत्याचारों से परेशान होकर, देवकी ने लोमश ऋषि से संतान सप्तमी व्रत के बारे में सुना और इसे किया। इस व्रत के परिणामस्वरूप भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ और उन्होंने कंस के अत्याचारों से पृथ्वी को मुक्ति दिलाई।
संतान सप्तमी व्रत की विस्तृत कथा
संतान सप्तमी व्रत की एक अन्य प्रसिद्ध कथा राजा नहुष और रानी चंद्रमुखी की है। एक समय अयोध्या में राजा नहुष का शासन था। रानी चंद्रमुखी और उनकी सहेली रूपमती एक दिन सरयू नदी के तट पर स्नान करने गईं, जहाँ उन्होंने बहुत सी महिलाओं को संतान सप्तमी व्रत करते देखा। रानी चंद्रमुखी ने संतान सुख की कामना करते हुए यह व्रत करने का संकल्प लिया, लेकिन समय के साथ वह इसे भूल गईं। कुछ समय बाद, रानी और उनकी सहेली का देहांत हो गया, और वे विभिन्न योनियों में जन्मी। रानी चंद्रमुखी का जन्म ईश्वरी नामक राजकन्या के रूप में हुआ, जबकि रूपमती ने ब्राह्मण की कन्या के रूप में जन्म लिया। रूपमती को अपने पूर्व जन्म की याद थी और उसने संतान सप्तमी व्रत किया, जिसके,फलस्वरूप उसे आठ संतानें प्राप्त हुईं। इसके विपरीत, ईश्वरी ने यह व्रत नहीं किया और वह इस जन्म में भी निःसंतान रही। रूपमती के संतान सुख को देखकर ईश्वरी को जलन हुई और उसने कई बार रूपमती के बच्चों को मारने का प्रयास किया, लेकिन वह असफल रही। अंततः ईश्वरी ने अपनी गलती स्वीकार की और रूपमती से क्षमा मांगी। रूपमती ने उसे क्षमा कर दिया और संतान सप्तमी व्रत करने की सलाह दी। इस व्रत से ईश्वरी को भी संतान सुख की प्राप्ति हुई। इस प्रकार, संतान सप्तमी व्रत से संतान सुख, आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। इसे श्रद्धा और विश्वास से करना चाहिए, और नियमों का पालन करते हुए पूजा करनी चाहिए।




