सवा सौ साल से सैन्य शक्ति का साक्षी है रीवा का एसएएफ मैदान, आजादी के पहले जश्न में पहुचे थें 20 हजार लोग

रीवा। आजादी का जश्न और सैन्य शक्ति का बड़ा ही गहरा रिश्ता है। इसका साक्षा रीवा का एसएएफ मैदान भी है। जिसे पहले व्यंकट बटिलयान के नाम से जाना जाता था, यह सैन्य शक्ति का तकरीबन सवा सौ साल से साक्षी है। इस मैदान में रीवा राज्य की सेना का पड़ाव होता था तो आजादी का पहला राष्ट्रपताका इसी मैदान में फहराया गया था, तब हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ों के टप-टप करते पांव, बिछिया नदी के तट से चलती तोपों की आवाज और जलती मशाल से रीवा की जश्ने आजादी देखते ही बन रही थी। शाम ढ़लते ही पूरा शहर रोशनी से नहा गया। तब बिजली की जुग्नू नही होती थी, पूरे शहर में दीये जलाकर रोशनी की गई थी।

ऐसा है इतिहास

वर्तमान के एसएएफ मैदान से पहले इसका नाम व्यंकट बटालियन था, तब रीवा रियासत के महाराजा वेंकटरमन सिंह जूदेव के शासनकाल में रीवा राज्य की सैन्य ताकत को मजबूत करने के लिए इस व्यंकट बटालियान की स्थापना की गई थी और इसे व्यंकट इंफेंट्री या सैन्य टुकड़ी के रूप में स्थापित किया गया था। इसका गठन रीवा राज्य की आंतरिक सुरक्षा, कानून व्यवस्था बनाए रखने और रियासत की सैन्य शक्ति को मजबूत करने के लिए किया गया था। जिसका उद्देश्य था कि रियासत की सुरक्षा और रीवा राज्य की सीमाओं और आंतरिक क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए एक संगठित और प्रशिक्षित सैन्य बल तैयार किया जाए। ब्रिटिश काल के दौरान रीवा रियासत ने अपनी सैन्य व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए इस बटालियन में कई तरह के नवाचार किए थें।

यहां थें तीन युद्धक विमान

यहां लड़ाकू विमानों को उतारने और उड़ान भरने के लिए हवाई पट्रटी का निर्माण भी किया गया था। बताते है कि रीवा राज्य में तीन युद्धक विमान थें। इनका नामकरण भी किया गया था। जिन युद्धक विमानों का जिक्र मिलता है उनके नाम क्रमशः पहला रीवा, दूसरा बांधव और तीसरा बघेल था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद महाराजा के विमान यहीं रखे जाते थे और यहीं से संचालित होते थे।

तब बना एसएएफ मैदान

जंहा रीवा रियासत के समय वर्तमान एसएएफ ग्राउंड और आसपास का क्षेत्र रियासती फौज और वेंकट बटालियन का ठिकाना हुआ करता था, वही प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रीवा रियासत की सैन्य टुकड़ियों और संसाधनों का विशेष योगदान रहा…आज़ादी के बाद और मध्य प्रदेश राज्य के गठन के साथ, रियासतों की इन सैन्य व्यवस्थाओं को पुनर्गठित करके राज्य में विशेष सशस्त्र बल यानि एसएएफ की विभिन्न बटालियनों की स्थापना की गई, जिनमें रीवा के व्यंकट बटालियान को भी विशेष सशस्त्र सेना यानि की एसएएफ बटालियान में शामिल कर दिया गया, तब से यह व्यंकट बटालियान एसएएफ मैदान के नाम से जानी जा रही है।

महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव ने फहराया था आजादी का पहला राष्ट्रध्वज

इतिहासकार असद खान बताते हैं कि जब देश आजाद हुआ था तो रीवा में पहला ध्वजारोहण रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव ने एसएएफ ग्राउंड में किए थे, एसएएफ ग्राउंड उस समय वेंकट बटालियन के नाम से जाना जाता था. इतिहास कार के अनुसार उस वक्त तकरीबन 20 हजार लोग आजादी के जश्न को देखने के लिए ग्राउंड में आए हुए थे. फौज फाटक, लाव लश्कर से रीवा का एसएएफ मैदान खचा खच भरा हुआ था. मैदान में जागीरदार, इलाकेदार, रीवा महराजा के भाई पट्टीदार और आम जनता सभी लोग इकट्ठा हुए थे, उस वक्त आजादी की खुशी में रीवा के लोग बेहद उत्साहित थे. उत्साहित जनता के बीच रीवा के महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव ने ध्वजारोहण किया, उस दिन पूरा रीवा जगमगा रहा था. आजादी के जश्न में दिये जलाए गए थे. मसाले जलाकर रोशनी की गई थी। पटाखे फोड़ कर खुशियां मनाई जा रही थी. बिछिया नदी के किनारे आजादी के जश्न में तोपे चलाई गई थी।

रीवा में ऐसा होता है आजादी का जश्न

इस जश्ने आजादी की याद रीवा वासियों को हर साल एसएएफ मैदान दिला रहा है। जिला प्रशासन इस मैदान में स्वतंत्रता दिवस का जिला स्तरीय कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। जिसमें रीवा की संस्कृति और प्रशासन की छवि देखते ही बनती है। स्कूली बच्चों का उत्साह और उनके संस्कृति कार्यक्रम की छठा ऐसी होती है, जिसे देख कर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। पुलिस टुकड़िया हर्ष फायर करती है, तो पुलिस कर्मियों के साथ ही एनसीसी, स्काउड के कैडेट्रस कदम-से-कदम मिलाकर चलते हुए जश्ने आजादी में एकता और अनुशासन का संदेश देते है। यहां विभिन्न विभागों की झाकियों का प्रदर्शन भी होता है। जिसमें उक्त विभाग की गतिविधी एवं नवाचार की झलक दिखाई देती है। इस आयोजन में हिस्सा लेने वालों में कम्पटीशन की भावना ओत-प्रोत रहती है और वे पहला, दूसरा एवं तीसरा स्थान पाने के लिए पूरी मेहनत के साथ अपनी प्रस्तुती देते है।

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