आभूषणों से सजेगी रीवा की मां कालिका, अष्टमी-नवमी पर 16 श्रृगार, 450 साल से है परंपरा, चोर मंदिर में हो गए थें कैद

रीवा। रीवा के ऐतिहासिक रानी तालाब स्थित मां कालिका मंदिर में नवरात्रि (विशेषकर अष्टमी और नवमी तिथि) के अवसर पर मां कालिका का पारंपरिक रूप से 16 श्रृंगार और स्वर्ण-चांदी के आभूषणों से भव्य दिव्य श्रृंगार किया जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है, जो पहले रीवा राजघराने द्वारा निभाई जाती थी। अब जिला प्रशासन और मंदिर व्यवस्था के देखरेख में यह आयोजन होता है। रानी तालाब के मध्य में शिव मंदिर और तट पर मां कालिका का यह सिद्धपीठ मंदिर स्थित है, जहां दूर-दूर से भक्त मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।

अष्टमी पर होता है श्रृगार

मंदिर के पुजारी के अनुसार माता कालिका को साल में दो बार आभूषणों से श्रृगार किया जाता है। अष्टमी की शाम को मां कालिका को पारंपरिक और रियासतकालीन स्वर्ण एवं चांदी के आभूषणों से सजाया जाता है। ये आभूषण कलेक्ट्रेट की नाजारत शाखा में पूरी सुरक्षा के साथ रखे जाते हैं। प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था में आभूषणों को लाया जाता है और माता रानी का श्रृगार किया जाता है। इस दौरान पुलिस विशेष नजर रखती है। जिससे माता रानी के श्रृगार में किसी भी तरह की समस्या न हो सकें।

श्रृंगार और आभूषणों की ऐसी है परंपरा

लोक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, एक बार राजपरिवार (राजा विश्वनाथ या राजघराने के वंश) में किसी पुत्र के विवाह के अवसर पर मां कालिका ने राज परिवार के मुखिया को स्वप्न में आकर अपना 16 श्रृंगार कराने की इच्छा व्यक्त की थी। इस स्वप्न के बाद राजघराने द्वारा सुनारों से विशेष और बहुमूल्य स्वर्ण आभूषण बनवाए गए और माता का भव्य श्रृंगार किया गया, जिसके बाद मांगलिक कार्य (जैसे बारात आदि) संपन्न हुए। तभी से हर साल शारदीय और चौत्र नवरात्रि के दौरान, विशेषकर अष्टमी और नवमी की तिथियों पर मां कालिका का इन शाही स्वर्ण आभूषणों से विशेष श्रृंगार करने की परंपरा चली आ रही है।

आभूषणों की सुरक्षा और व्यवस्था

पहले ये आभूषण रीवा रियासत के किले से लाए जाते थे, लेकिन वर्तमान में यह परंपरा जिला प्रशासन की देखरेख में निभाई जाती है। अष्टमी और नवमी के विशेष पूजन के बाद इन बहुमूल्य स्वर्ण आभूषणों को कड़ी सुरक्षा के बीच सुरक्षित रखवा दिया जाता है। इस मंदिर के आभूषणों से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध घटना भी है कि वर्षों पहले चोरों ने आभूषण चुराने की कोशिश की थी, लेकिन वे मंदिर परिसर से बाहर नहीं जा सके और चमत्कारिक रूप से वहीं फंस गए थे, जिसके बाद से इन आभूषणों की पवित्रता और सुरक्षा को लेकर लोगों की आस्था और गहरी हो गई।

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