‘ब्योमकेश बख्शी’ से मिली रजित कपूर को पहचान

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Happy Birthday Rajit Kapoor:भारतीय सिनेमा और रंगमंच के एक बेहद मंझे हुए अभिनेता रजित कपूर अपने सहज , ‘एफ़र्टलेस’ (effortless) अभिनय और गंभीर किरदारों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन आप जानते हैं आज से बहोत पहले जब वो बस बारह साल के थे तब से उन्हें अपने अगल -बगल यानी पड़ोस में ख़ास बच्चे के रूप में पहचान मिल चुकी थी क्योंकि उस वक़्त उन्होंनें दूरदर्शन पर बच्चों के नाटक में अभिनय किया था फिर इसके क़रीब दस बरस बाद ,कुछ 22 साल की उम्र में पहला बड़ा टीवी सीरियल ‘घर जमाई’ किया जिसमें उन्होनें फरीदा जलाल और सतीश शाह के साथ अभिनय किया था।

बचपन में निभाया किरदार

पर असली पहचान रजित कपूर को मिली 1991-92 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुए जासूसी धारावाहिक ‘ब्योमकेश बख्शी’ में जासूस ब्योमकेश बख्शी के किरदार से जिसने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया ,आपको बता दें कि बासु चटर्जी ने  शरदिंदु बंद्योपाध्याय की कहानियों पर आधारित इस सीरियल पर बंगाली भाषा में लगभग 20 से ज़्यादा फिल्में और टीवी सीरीज़ बनाई जा चुकी हैं। सत्यजित राय ने ब्योमकेश पर फ़िल्म ‘चिड़ियाख़ाना’ बनाई थी तो 2015 को रिलीज़ हुई दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ में ये किरदार सुशांत सिंह राजपूत ने निभाया था।

रजित कपूर ने भारत के कई ऐतिहासिक और राजनीतिक किरदारों को पर्दे पर जीवंत किया है, जिनमें ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ में गांधी और वेब सीरीज़ ‘रॉकेट बॉयज़’ में पंडित जवाहरलाल नेहरू की भूमिका शामिल है। 1996 में आई फिल्म ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ में महात्मा गांधी का ऐतिहासिक किरदार निभाने के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ मिला था।

फिल्मों में शानदार सफर:

श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित 1992 की फिल्म ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ से शुरू हुआ रजित का फ़िल्मी सफर , ‘ग़ुलाम’, ‘दिल चाहता है’, ‘दो आने की धूप चार आने की बारिश’ और ‘राज़ी’ जैसी कई सफल फिल्मों में उनकी बेहतरीन अदाकारी के साथ जारी है।

थिएटर से लगाव:

रजित रंगमंच (थिएटर) के भी बहुत बड़े दिग्गज हैं। वो 1978 से स्टेज पर सक्रिय हैं और ‘रेज़ प्रोडक्शंस’ (Rage Productions) नाम की थिएटर कंपनी के सह-संस्थापक भी हैं।उनका ये रुझान नया नहीं बल्कि स्कूल के दिनों का है जब वो अंग्रेज़ी-हिंदी रंगमंच पर न केवल अभिनय करते थे बल्कि नाटक लिखते भी थे फिर कॉलेज में भी कई नाटकों में अभिनय किया जैसे – ‘नाइट ऑफ़ जनवरी 16’, ‘डायरी ऑफ़ एनी फ्रैंक’, ‘एंटीगनी’ का हिंदी अनुवाद और इला अरुण के साथ हिंदी में ‘जमीलाबाई कलाई’ और हाँ इसके लिए तो आपने राजस्थानी लहजा भी सीखा था, आपका मशहूर नाटक है- अंग्रेज़ी ज़ुबान का ‘लव लेटर्स’।

इसकी कहानी काफी दिलचस्प है क्योंकि इसमें एक मर्द और औरत के बीच के रिश्ते को चिट्ठियों के ज़रिए बयान किया गया है वो भी उनके बचपन से पचपन की उम्र तक का फलसफा है इसमें , इसका हिंदी संस्करण ‘तुम्हारी अमृता’ नाम से सैकड़ों बार मंचित किया जा चुका है। जिसकी मुख्य भूमिकाओं फ़ारुख़ शेख़ और शबाना आज़मी ने निभाई थीं। ‘लव लेटर्स’ के मंचन के दौरान ही श्याम बेनेगल ने रजित को देखा था फिर उन पर भरोसा करते हुए फिल्म ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ दी थी हालाँकि उन्होंनें रजित से पूछा था , तुम हिंदी तो पढ़ लोगे न!, तुम्हारा तलफ्फ़ुज़ अंग्रेज़ी से प्रभावित लग रहा है न इसलिए पूछा और मैंने कहा ‘मुझे मौका दीजिए, फिर कहिएगा।’

रजित ने 1999 में मलयालम फिल्म ‘अग्निसाक्षी’ में अभिनय किया, जिसने मलयालम में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई पुरस्कार जीते , और उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए केरल राज्य फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।

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