National Conference Crisis : टल गया उमर की कुर्सी का संकट? फारुक अब्दुल्ला ने बगावत पर लगाया ब्रेक

National Conference Crisis

National Conference Crisis : जम्मू-कश्मीर की सियासत में इन दिनों महाराष्ट्र जैसा सियासी तूफान उठा है, जिसने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार से लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के संगठन तक को हिलाकर रख दिया। एक तरफ सीएम उमर अब्दुल्ला पत्रकार निधि राजदान के साथ दूसरी शादी करके अपनी निजी जिंदगी को लेकर पहले से ही चर्चा में हैं, इसी बीच अब पार्टी के भीतर बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं। इस बगावत के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस में टूट तक की अटकलें लगने लगीं।

उमर की सरकार में बगावत

ये बगावत एनसी के 24 विधायकों ने की। पहले बंद कमरे में बैठक की, फिर सभी ने नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी जाहिर की और चार मंत्रियों को हटाने की मांग की। फिर उमर अब्दुल्ला की कुर्सी बचाने के लिए और इस बगावत पर ब्रेक लगाने के लिए होती है फारूक अब्दुल्ला की एंट्री, फारुक अबदुल्ला ने सभी बागियों को अपने दरबार में पेशी के लिए बुला लिया।
फारुक अबदुल्ला ने कहा- न पार्टी टूटी थी और न कभी टूटेगी, जिसके बाद जम्मू कश्मीर की लड़खड़ाती सरकार की तस्वीर बदल गई। फारूक अब्दुल्ला ने खुद मोर्चा संभाला। नाराज विधायकों से मुलाकात की। उनकी शिकायतें सुनीं और भरोसा दिया कि कुछ मांगों पर तुरंत फैसला लेंगे, जबकि बाकी मुद्दों को स्टेप बाय स्टेप तरीके से सुलझाएंगे।

इस पेशी के बाद बगावत के सुर भी कुछ धीमे पड़ते दिखाई दिए। नाराज विधायकों ने पार्टी टूटने की खबरों को अफवाह बता दिया। लेकिन सवाल है कि आखिर नेशनल कॉन्फ्रेंस में ऐसी नौबत आई क्यों? क्या यह सिर्फ मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर उपजी नाराजगी थी या फिर उमर अब्दुल्ला की लीडरशिप के खिलाफ पार्टी के भीतर लंबे समय से असंतोष सुलग रहा था?

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क्यों बगावत कर रहें विधायक?

दरअसल, 27 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार ने मंत्रिमंडल का विस्तार किया। इस विस्तार में चार नए चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह मिली। लेकिन पार्टी के कई वरिष्ठ विधायक इस फैसले से नाराज हो गए। इन विधायकों की शिकायत थी कि पार्टी के लिए लंबे समय से काम करने वाले अनुभवी नेताओं को नजरअंदाज किया गया। जबकि कुछ चुनिंदा विधायकों को मंत्री पद देकर सरकार में जगह दे दी गई। नयानी नाराजगी सिर्फ मंत्री नहीं बनाए जाने की नहीं थी बल्कि पार्टी और सरकार में अपनी राजनीतिक हैसियत कम होने की भी थी। धीरे-धीरे यह असंतोष खुलकर सामने आने लगा। पार्टी के करीब 24 असंतुष्ट विधायकों के एकजुट होने की खबर सामने आई।
इन विधायकों की बैठक में 18 विधायक मौजूद बताए गए, जबकि 6 विधायकों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। यहीं से नेशनल कॉन्फ्रेंस में अब तक की सबसे बड़ी अंदरूनी बगावत की चर्चा शुरू हो गई।

नाराज विधायकों ने क्या मांग रखी?

इन बागी विधायकों ने पार्टी के लीडर के सामने कई मांगें रखीं। उनकी प्रमुख मांगों में मंत्रिमंडल में शामिल चार नए मंत्रियों को हटाने और मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार नासिर असलम वानी को उनके पद से हटाने की मांग भी शामिल थी। इसके अलावा विधायकों ने सरकार के कामकाज में अपनी भागीदारी बढ़ाने, संगठन में बदलाव, विधायकों और सरकार के बीच बेहतर समन्वय और उनकी शिकायतों के समाधान के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग उठाई। इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कराने और अनुच्छेद 370 तथा 35A की बहाली के लिए प्रयास तेज करने की मांग भी सामने आई। यानी विधायकों की नाराजगी के कई स्तर थे। एक तरफ मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी का सवाल था, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर सम्मान, अधिकार और राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा भी था। नाराज विधायकों ने नेतृत्व को अपनी मांगों पर फैसला लेने के लिए दो सप्ताह का समय देने की बात भी कही।

जम्मू कश्मीर में कैसे गिर सकती है उमर की सरकार?

ऐसे में सवाल उठने लगा कि अगर उमर अब्दुल्ला ने मांगें नहीं मानीं तो क्या पार्टी में बड़ी टूट हो सकती है? यहीं से जम्मू-कश्मीर विधानसभा के सियासी गणित का तानाबाना शुरू होता है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल 90 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 46 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। 2024 के विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन उमर अब्दुल्ला दो सीटों से चुनाव जीते थे और बाद में एक सीट छोड़ दी। इसके बाद पार्टी की प्रभावी संख्या 41 रह गई। कांग्रेस के छह विधायकों के समर्थन से उमर अब्दुल्ला ने सरकार बनाई।

वहीं, बीजेपी के पास 29 विधायक हैं। पीडीपी के पास तीन सीटें हैं और विधानसभा में सात निर्दलीय विधायक भी हैं। अब अगर नेशनल कॉन्फ्रेंस के 41 विधायकों में से 24 विधायक सचमुच सरकार से समर्थन वापस ले लेते, तो उमर सरकार का गणित बिगड़ सकता था। इसमें दल-बदल कानून के तहत किसी राजनीतिक दल के विधायकों के अलग गुट के रूप में मान्यता पाने के लिए सामान्य तौर पर दो-तिहाई विधायकों के विलय की शर्त लागू होती है।

NC में फूट से भाजपा को होगा फायदा

इसलिए भारतीय जनता पार्टी लगातार नेशनल कॉन्फ्रेंस के अंदरूनी कलह पर नजर गढ़ाए बैठी है। वजह साफ है। अगर नेशनल कॉन्फ्रेंस में असंतोष बढ़ता है और पार्टी के विधायक सरकार से दूरी बनाते हैं, तो सत्ता का गणित बदल सकता है। राजनीतिक गलियारों में महाराष्ट्र की सियासत का उदाहरण भी दिया जाने लगा। जहां शिवसेना में बगावत के बाद सत्ता का पूरा समीकरण बदल गया था। जम्मू-कश्मीर में भी सवाल उठने लगा कि क्या बीजेपी भविष्य में ऐसा ही कोई सियासी दांव चल सकती है? हालांकि, बीजेपी के पास इस वक्त 29 विधायक हैं। यानी बहुमत के आंकड़े 46 तक पहुंचने के लिए उसे 17 विधायकों का समर्थन और चाहिए।
ऐसे में केवल नेशनल कॉन्फ्रेंस में असंतोष पैदा होना बीजेपी के लिए सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। उसे दूसरे दलों और निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी जुटाना होगा। लेकिन बीजेपी के लिए फिलहाल इंतजार करना ही सबसे बेहतर रणनीति दिखाई दे रही थी।

फारुक अब्दुल्ला ने नाराज विधायकों को समझाया

उससे पहले ही फारूक अब्दुल्ला की एंट्री से जम्मू कश्मीर की सरकार की पूरी तस्वीर बदल गई। जब पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा और टूट की अटकलें तेज हुईं, तो सबकी निगाहें नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर टिक गईं। सभी को फारुक अब्दुल्ला से काफी उम्मीद थी,,, क्योंकि उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री जरूर हैं, लेकिन पार्टी के भीतर फारूक अब्दुल्ला का राजनीतिक और भावनात्मक प्रभाव आज भी काफी मजबूत माना जाता है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को उम्मीद थी कि फारूक साहब के बात करने से नाराज विधायक एकजुट हो सकते है।

ऐसा ही हुआ, फारुक ने जब सभी 24 नाराज विधायकों को बैठक के लिए बुलाया तो उन्हें समझाया और कलह को शांत करने के लिए उनकी मांगे पूरी करने का आश्वासन भी दिया।

इसके बाद गुरेज से विधायक नजीर अहमद गुरेजी ने कहा कि विधायकों ने अपनी सभी समस्याएं और चिंताएं नेतृत्व के सामने रखी हैं। नेतृत्व ने आश्वासन दिया है कि कुछ मुद्दों का समाधान तत्काल किया जाएगा, जबकि बाकी पर धीरे-धीरे काम होगा। उन्होंने यह भी साफ किया कि न तो कोई अलग गुट बना है और न ही कोई अलग पार्टी बनाने की योजना है। यानी जिन विधायकों की नाराजगी को पार्टी में टूट की शुरुआत माना जा रहा था, वही विधायक अब बातचीत के बाद एकजुटता का संदेश देते दिखाई दिए।

पार्टी न टूटी है और न टूटेगी : फारुक अब्दुल्ला

इस बैठक के बाद फारूक अब्दुल्ला ने भी बगावत की खबरों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के विभाजन की खबरें बेबुनियाद हैं। पार्टी पूरी तरह संगठित और एकजुट है। फारूक अब्दुल्ला ने साफ शब्दों में कहा- ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस न कभी टूटी है और न कभी टूटेगी।’ उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि विधायकों की कुछ चिंताएं थीं और बैठक में उन पर विस्तार से चर्चा हुई है। फारूक अब्दुल्ला ने एक तरफ नाराज विधायकों को भरोसे में लेने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ सार्वजनिक तौर पर पार्टी की एकजुटता का संदेश भी दिया।

फिलहाल फारूक अब्दुल्ला की मध्यस्थता के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस में तत्काल टूट का खतरा कम होता दिखाई दे रहा है। नाराज विधायकों ने बातचीत का रास्ता चुना है और नेतृत्व ने उनकी शिकायतें दूर करने का भरोसा दिया है। इस पूरे विवाद ने उमर अब्दुल्ला के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस फिलहाल एकजुट होने का दावा कर रही है। लेकिन पार्टी के भीतर उठे सवालों का जवाब आने वाले दिनों में उमर अब्दुल्ला के फैसलों से ही मिलेगा।

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