Ujjain Become World’s Time Center: हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की उज्जैन यात्रा ने एक नई वैश्विक बहस को जन्म दे दिया है। उज्जैन में आयोजित तीन दिवसीय “महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस” के उद्धाटन सत्र में उन्होंने भाग लिया और कहा मध्यप्रदेश का उज्जैन समय गणना का असली केंद्र है, उज्जैन वह स्थान है जहाँ प्राइम मेरिडियन रेखा और कर्करेखा आपस में मिलती हैं, और प्राचीनकाल में विश्व की समय गणना यहीं से होती थी। इसीलिए अब समय गणना के लिए वर्तमान में इस्तेमाल होने वाले “GMT” अर्थात “ग्रीनविच मीन टाइम” के स्थान पर “MST” अर्थात “महाकाल स्टैंडर्ड टाइम” को वैश्विक आधार बनाया जाना चाहिए। धर्मेन्द्र प्रधान के इस व्यक्तव्य के बाद सोशल मीडिया में लोगों की राय बंट गई है। कुछ लोग इसे भारत की सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर इसका समर्थन कर रहे हैं, तो वहीं कुछ लोगों ने इसे अव्यावहारिक बताया है।
उज्जैन का सांस्कृतिक महत्व
बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन या उज्जयिनी प्राचीन भारतीय सभ्यता का सांस्कृतिक और राजनैतिक केंद्र रहा है, महाजनपदकाल में यह अवन्ति की राजधानी थी, भारतीय दंतकथाओं के नायक शकारि राजा विक्रमादित्य की राजधानी भी यही नगर था। लेकिन पूर्वकाल से ही इसका महत्व केवल आध्यात्मिक और राजनैतिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक भी रहा है। क्योंकि यह ज्योतिष, खगोलविद्या और समय गणना का प्रमुख केंद्र रहा है, प्राचीन भारतीय खगोलविदों जैसे ब्रह्मगुप्त ने उज्जैन को ही शून्य देशांतर मानकर अपनी खगोलीय गणनाएं की थीं। आर्यभट्ट और वाराहमिहिर की भी परंपरा यही से जुड़ी हुई थी।
प्राचीन भारत का खगोलीय केंद्र था उज्जैन
दरसल प्राचीन भारतीय खगोलविद सूर्य की छाया से समय निकालते थे। प्राचीन ग्रंथ ‘सूर्य सिद्धांत’ में उज्जैन को ‘मध्य देश’ कहा गया है, और प्राचीन भारतीय विद्वानों ने समय गणना के भूमध्य रेखा का केंद्र उज्जैन को ही माना। और इसे लंका-उज्जयिनी मेरिडियन लाइन कहा गया है। स्कन्दपुराण और नारद पुराण जैसे ग्रंथों में यहाँ के महत्व को बताया गया है। उज्जैन भौगोलिक रूप से कर्क रेखा के नजदीक स्थित है, जो इसे खगोलीय गणनाओं के लिए एक सटीक स्थान बनाता है। 18वीं शताब्दी में भी 1725 ईस्वी से 1734 ई के बीच कभी जयपुर के राजा सवाई जयसिंह ने, यहाँ खगोलविद्या के अध्ययन के लिए एक वेधशाला का निर्माण करवाया था। हालांकि धर्मेन्द्र प्रधान का यह कथन यहाँ कर्क रेखा और भूमध्य रेखा एक-दूसरे से मिलती हैं फैक्टफुल नहीं है। पर चूंकि प्राचीन समय में भारतीय विद्वानों ने समय गणना के लिए ज़ीरो देशांतर का प्रारंभ मध्यदेश में स्थित होने के कारण उज्जैन को ही माना। शायद इस आधार पर धर्मेन्द्र प्रधान ने अपनी बात कही होगी।
GMT कैसे बना विश्व का मानक समय
पर आज दुनियाभर में समय गणना ग्रीनविच मीन टाइम के आधार पर होती है, दरसल 1884 में वाशिंगटन में हुए इंटरनेशनल मेरिडियन कॉन्फ्रेंस के बाद लंदन के ग्रीनविच स्थान को अंतर्राष्ट्रीय मानक समय के रूप में स्वीकार किया गया था। इसीलिए इसे ग्रीनविच मीन टाइम अर्थात GMT बोला जाता है। भारत में भी समय गणना इसी जीएमटी के आधार पर ही होती है, जिसे यहाँ IST अर्थात इंडियन स्टैन्डर्ड टाइम कहा जाता है।
दुनिया का टाइम ज़ोन सिस्टम कैसे काम करता है
पृथ्वी अपने धुरी पर 24 घंटे में पूरा 360° घूमती है। यानी हर एक घंटे में वह 15° घूमती है। इसी आधार पर दुनिया को 24 टाइम ज़ोन में बाँटा गया है। अब समय तय करने के लिए 0° देशांतर को आधार माना गया है, जो इंग्लैंड के लंदन के ग्रीनविच से होकर गुजरता है। इसे ग्रीनविच मीन टाइम कहते हैं। और आसान भाषा में कहें तो, इस रेखा से पूर्व की ओर जाने पर समय बढ़ता जाता है और पश्चिम की ओर जाने पर समय कम होता जाता है। यानी दुनिया का पूरा समय इसी एक शुरुआती रेखा से गिनकर तय किया जाता है।
क्या उज्जैन बनेगा दुनिया का टाइम सेंटर | Ujjain Become World’s Time Center
ऐसे में इसे बदलकर उज्जैन को केंद्र बनाकर महाकाल टाइम का प्रस्ताव एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए दुनिया के 195 देशों और ITU अर्थात अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ जैसे वैश्विक संगठनों की सर्वसम्मति की भी आवश्यकता होगी, जो व्यावहारिक रूप से होना कठिन कार्य है। इसके साथ ही इसमें कई तकनीकी कठिनाइओं का सामना करना पड़ेगा। जैसे आज का पूरा वैश्विक तंत्र, चाहे वह GPS हो, इंटरनेट हो, या एविएशन सिस्टम हो, सब UTC अर्थात यूनिवर्सल टाइम कॉर्डिनेटेड पर आधारित है। इसे बदलने का अर्थ है पूरी दुनिया के डिजिटल डेटाबेस और नक्शों को फिर से बनाना, जो तकनीकी रूप से अत्यधिक कठिन कार्य है और संभव नहीं है।
क्या भारत को चाहिए दो टाइम ज़ोन
लेकिन इसके साथ ही सोशल मीडिया में एक और बहस शुरू हो गई है, क्या भारत को एक से अधिक टाइम ज़ोन की आवश्यकता है? दरसल भारत पूर्व में अरुणाचलप्रदेश से लेकर पश्चिम में गुजरात तक लगभग 29 डिग्री देशांतर में फैला हुआ है। इसे आसान भाषा में समझे तों, इसका मतलब है कि अरुणाचल प्रदेश और गुजरात के बीच सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में लगभग 2 घंटे का अंतर होता है। आजादी से पूर्व 19वीं शताब्दी में भारत में तीन टाइम ज़ोन मुंबई, कलकत्ता और मद्रास हुआ करते थे। लेकिन 1905 में कर्जन के शासनकाल में यह निर्णय लिया गया कि, पूरे ब्रिटिश भारत के लिए एक स्टैन्डर्ड टाइम तय किया जाए, इसी प्रक्रिया से आगे चलकर बना इंडियन स्टैन्डर्ड टाइम, हालांकि IST आधिकारिक रूप से 1906 में लागू हुआ और इसे मिर्जापुर के पास ग्रीनविच से 82.5 डिग्री पूर्व में मेरिडियन चुना गया और भारत को एक टाइम पर लाने की प्रक्रिया शुरू की।
IST लागू होने के पीछे राष्ट्रीय कारण
आजादी के बाद राष्ट्रीय एकता, अखंडता और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए केवल एक ही टाइम स्टैन्डर्ड यूटीसी प्लस साढ़े पांच घंटे को पूरे देश में लागू कर दिया गया । लेकिन यह व्यवहारिक नहीं है क्योंकि भारत के पूर्व और पश्चिम में समय का अंतर है। देश में समय, माप और मानकों को तय करने वाली प्रमुख वैज्ञानिक संस्था CSIR-NPL के सुझाव के अनुसार, यदि भारत को दो टाइम ज़ोन IST-1 और IST-2 में बांटा जाए, तो हर साल लगभग 2.7 अरब यूनिट बिजली की बचत भी हो सकती है। और सिर्फ बिजली ही नहीं बल्कि उत्पादकता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, कैसे आइए समझते हैं।
दो टाइम ज़ोन से कई फायदे
दरअसल उत्तर-पूर्वी राज्यों उदाहरण स्वरूप हम अरुणाचल को ही लेते हैं, जहाँ सूर्योदय जल्दी हो जाता है, लेकिन स्टैन्डर्ड टाइम पूरे देश का एक ही होने के कारण, वहाँ की घड़ी उतनी देर वही समय दिखाती है, जो देश के बाकि हिस्सों में दिखाती है। इसीलिए उजाला जल्दी होने के बाद भी, वहाँ कामकाज देर से प्रारंभ होता है, मतलब कार्यालय देरी से खुलते हैं। क्योंकि भले ही अरुणाचल में सूरज जल्दी निकले पर टाइम देश के अन्य हिस्सों की ही तरह वही माना जाएगा। तो इस अनियमियता की वजह से पूर्वोत्तर में दिन के उजाले का सही उपयोग नहीं हो पाता और इससे कहीं ना कहीं प्रोडक्टविटी भी प्रभावित होती है। और जैसे हमने पहले ही एनपीएल के अनुसार बताया सबसे बड़ा फायदा होगा ऊर्जा की बचत, कैसे आइए समझते हैं।
अब मान लीजिए पूरे देश की ही तरह अरुणाचल में दफ्तर सुबह 10 बजे खुलता है और रात 8 बजे बंद होता है। लेकिन वहाँ सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही जल्दी होते हैं। ऐसे में स्थिति यह बनती है जब वहाँ दफ्तर खुलता है तो आधा दिन बीत चुका होता है और शाम को अंधेरा जल्दी हो जाता है। अब यदि उसी स्थान के सूर्योदय और सूर्यास्त के हिसाब से समय को तय किया जाए तो, लगभग दोपहर 12 बजे से रात 10 बजे जैसा समय प्रतीत होगा, क्योंकि सूर्य तो मशीन के हिसाब से नहीं चलेगा। खैर अगर अंधेरा 6 बजे हो जाएगा, तो दफ्तरों में करीब चार घंटे लाइट और बिजली उपकरणों का प्रयोग किया जाएगा और ऊर्जा की खपत ज्यादा होगी।
भारत के लिए क्या बेहतर- एक या दो टाइम ज़ोन?
लेकिन इसके विपक्ष में तर्क देने वाले लोग चीन का उदाहरण देते हैं, जो भौगोलिक रूप से पांच टाइम ज़ोन में बंटा हुआ है। लेकिन चीन ‘वन नेशन, वन टाइम’ मॉडल का उपयोग करते हुए एक ही ‘बीजिंग टाइम’ का पालन करता है। इसी तरह भारत को भी केवल एक ही टाइम ज़ोन का प्रयोग करना चाहिए, विशेषज्ञ इसे राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के एक राजनीतिक प्रयोग के रूप में देखते हैं। लेकिन फिर भी कुछ लोगों का मानना है कि यदि व्यावहारिक रूप से अपनाया जाए, तो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए, दो टाइम ज़ोन का मॉडल अधिक प्रभावी हो सकता है।
खैर महाकाल स्टैंडर्ड टाइम का प्रस्ताव भारत की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत को वैश्विक जगत में प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन तरीका है। लेकिन वैश्विक मानकों को बदलना बहुत कठिन है। हाँ यह जरूर किया यह जा सकता है कि सरकार योग की ही तरह यूनेस्को के माध्यम से, उज्जैन को एक प्राचीन खगोलशास्त्रीय केंद्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास करे यह व्यावहारिक रूप से एक अधिक प्रभावी कदम हो सकता है।
