MP: प्रदेश में आसान होगी हाईराइज बिल्डिंग की राह, 20 मंजिल तक निर्माण का रास्ता होगा साफ

MP Land Development Rules 2026: मध्य प्रदेश में भूमि विकास नियम 2026 (Land Development Rules 2026) लागू करने की तैयारी है। करीब 14 साल पुराने नियमों में प्रस्तावित बदलावों के बाद प्रदेश में 15 से 20 मंजिल तक की हाईराइज इमारतों (High-rise Buildings) का निर्माण आसान हो सकता है। नए प्रावधानों के तहत ऊंची इमारतों के लिए मौजूदा अनुमतियों और स्वीकृति की जटिल प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव है, जिससे बिल्डरों और भवन निर्माताओं को राहत मिलने की उम्मीद है।

MP Land Development Rules 2026: मध्य प्रदेश में अब हाईराइज बिल्डिंग (High-rise Building) के निर्माण को लेकर नियमों में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राज्य सरकार करीब 14 साल पुराने भूमि विकास नियम 2012 (Land Development Rules 2012) में बदलाव कर नए भूमि विकास नियम 2026 (Land Development Rules 2026) लागू करने की तैयारी में है। प्रस्तावित ड्राफ्ट में भवन की ऊंचाई, फ्लोर एरिया रेशो (FAR) और प्लॉट पर निर्माण से जुड़े कई प्रावधानों को आसान बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।

नए नियम लागू होने के बाद प्रदेश के बड़े शहरों में 15 से 20 मंजिल तक की इमारतों के निर्माण की प्रक्रिया पहले के मुकाबले काफी सरल हो सकती है। हालांकि, किस क्षेत्र में कितनी ऊंचाई और किस तरह का निर्माण होगा, इसका निर्धारण संबंधित शहर के मास्टर प्लान (Master Plan) के प्रावधानों के आधार पर किया जाएगा।

30 मीटर की सीमा बढ़ाकर 45 से 60 मीटर करने का प्रस्ताव

मौजूदा व्यवस्था में 30 मीटर यानी करीब 10 मंजिल से अधिक ऊंची इमारतों के प्रस्ताव को विशेष अनुमति की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके लिए नगर निगम स्तर पर गठित कमेटी से मंजूरी लेने की जरूरत होती है।

नए ड्राफ्ट में इस सीमा को बढ़ाकर 45 से 60 मीटर (Building Height Limit) करने का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि निर्धारित सीमा तक की ऊंची इमारतों के लिए विशेष अनुमति की मौजूदा प्रक्रिया में कमी आ सकती है। इससे 15 से 20 मंजिल तक के प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान होने की उम्मीद है।

FAR 3 से बढ़कर 4 करने की तैयारी

नए नियमों में फ्लोर एरिया रेशो (Floor Area Ratio) को भी बढ़ाने का प्रस्ताव है। वर्तमान व्यवस्था में प्लॉट के आकार और श्रेणी के अनुसार अधिकतम FAR करीब 3 तक निर्धारित है। प्रस्तावित नियमों में इसे बढ़ाकर 4 किया जा सकता है।

इसमें बेस FAR (Base FAR) के तौर पर 2 तक निर्माण की अनुमति होगी। इसके अलावा अतिरिक्त 2 FAR को प्रीमियम FAR (Premium FAR) के रूप में प्राप्त किया जा सकेगा। इसके लिए बिल्डर या भू-स्वामी को कलेक्टर गाइडलाइन के आधार पर निर्धारित बिल्ट-अप एरिया की राशि का भुगतान करना होगा। इस बदलाव का सीधा असर यह होगा कि सीमित भूखंड पर नियमानुसार पहले की तुलना में अधिक निर्माण क्षेत्र उपलब्ध हो सकेगा।

MOS के बाद बची जमीन पर निर्माण की राह होगी आसान

प्रस्तावित नियमों में मार्जिनल ओपन स्पेस (Marginal Open Space-MOS) को लेकर भी अहम बदलाव किया गया है। वर्तमान व्यवस्था में MOS छोड़ने के बाद भी प्लॉट के निर्माण क्षेत्र पर अलग-अलग श्रेणियों के अनुसार सीलिंग लागू रहती है। आवासीय भवनों के लिए यह सीमा 30 प्रतिशत, कमर्शियल प्रोजेक्ट के लिए 40 प्रतिशत, औद्योगिक उपयोग के लिए 50 प्रतिशत और कुछ व्यक्तिगत प्लॉट के मामलों में 60 प्रतिशत तक रहती है। नए प्रस्ताव में MOS की अनिवार्य जगह छोड़ने के बाद बची हुई जमीन पर निर्माण की अधिक स्वतंत्रता देने की बात कही गई है। इससे प्लॉट के ग्राउंड कवरेज (Ground Coverage) और उपलब्ध निर्माण क्षेत्र का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।

‘फ्लैट FAR’ से अतिरिक्त निर्माण की गणना होगी पारदर्शी

नए नियमों में फ्लैट FAR (Flat FAR) की व्यवस्था को भी शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य FAR की गणना को अधिक पारदर्शी और स्पष्ट बनाना है।
मौजूदा व्यवस्था में कुछ मामलों में लिफ्ट, कॉरिडोर और कॉमन स्पेस जैसी जगहों को आधार बनाकर अतिरिक्त निर्माण क्षेत्र की छूट हासिल करने की गुंजाइश रहती थी। प्रस्तावित व्यवस्था में इस तरह की अतिरिक्त छूट को सीमित करने का प्रयास किया गया है। नए सिस्टम में ग्राउंड कवरेज के आधार पर FAR की गणना अधिक स्पष्ट तरीके से की जाएगी और स्वीकृति के बाद इसमें मनमाने तरीके से बदलाव की गुंजाइश कम होगी।

पर्यावरण संरक्षण पर मिलेगा ‘ग्रीन TDR’ का फायदा

नए नियमों में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए ग्रीन ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स (Green TDR) का प्रावधान प्रस्तावित है। इसके तहत जल स्रोतों और पर्यावरणीय क्षेत्रों के संरक्षण में योगदान देने वाले भू-स्वामियों को अतिरिक्त FAR Benefit दिए जाने की व्यवस्था की जा सकती है। इसका उद्देश्य संरक्षण योग्य जमीन पर अनधिकृत निर्माण को रोकने के साथ भू-स्वामियों को संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करना है।

मेट्रो और रेलवे स्टेशन के आसपास बढ़ेगा अतिरिक्त FAR

नए नियमों में ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (Transit Oriented Development-TOD) को भी बढ़ावा देने का प्रस्ताव है। इसके तहत मेट्रो स्टेशन, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जैसे प्रमुख सार्वजनिक परिवहन केंद्रों के आसपास अधिक घनत्व वाले निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाएगा। ऐसे क्षेत्रों में मिक्स्ड यूज डेवलपमेंट (Mixed-use Development) और अतिरिक्त FAR की अनुमति मिलने से आवासीय, व्यावसायिक और अन्य उपयोगों को एक ही क्षेत्र में विकसित करने का रास्ता आसान हो सकता है। सरकार की इस व्यवस्था का उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन की पहुंच वाले इलाकों में योजनाबद्ध विकास को बढ़ावा देना और निजी वाहनों पर निर्भरता कम करना है।

मास्टर प्लान तय करेगा कहां कितनी छूट मिलेगी

नए नियम पूरे प्रदेश में एक समान तरीके से निर्माण की अनुमति देने के बजाय शहर के मास्टर प्लान (City Master Plan) को महत्वपूर्ण भूमिका देंगे। किसी शहर में किस क्षेत्र में कितनी ऊंचाई तक निर्माण हो सकेगा, कहां मिक्स्ड लैंड यूज की अनुमति होगी और किन क्षेत्रों में विशेष प्रतिबंध रहेंगे, यह स्थानीय मास्टर प्लान के प्रावधानों पर निर्भर करेगा। इससे शहरों के नियोजित विकास और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जाएगी।

110 से ज्यादा प्रावधानों को किया जाएगा सरल

राज्य सरकार पुराने भूमि विकास नियमों को अधिक सरल और व्यावहारिक बनाने की दिशा में काम कर रही है। ड्राफ्ट में करीब 110 प्रावधानों (Rules & Sections) को सरल और स्पष्ट करने का प्रस्ताव है। करीब 200 पन्नों की नई नियम-पुस्तिका का ड्राफ्ट तैयार किया गया है। इसे उच्च स्तरीय बैठक में अंतिम रूप दिए जाने के बाद लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

बड़े शहरों में बदल सकता है निर्माण का स्वरूप

यदि प्रस्तावित भूमि विकास नियम 2026 लागू होते हैं, तो मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में ऊंची इमारतों के निर्माण से जुड़े कई नियम पहले की तुलना में सरल हो सकते हैं। अधिक ऊंचाई की सीमा, FAR में बढ़ोतरी, MOS के बाद निर्माण की स्वतंत्रता और TOD जैसे प्रावधान शहरी क्षेत्रों में Vertical Development को बढ़ावा दे सकते हैं। हालांकि, इन बदलावों का वास्तविक असर नियमों के अंतिम स्वरूप और प्रत्येक शहर के मास्टर प्लान पर निर्भर करेगा। ड्राफ्ट को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कौन से प्रावधान किस रूप में लागू किए जाएंगे।

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