हिमालय की विशाल चोटियां और सदियों पुराने ग्लेशियर न केवल एशिया की प्रमुख नदियों के स्रोत हैं, बल्कि वैश्विक जलवायु संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में ग्लेशियर का पिघलना एक गंभीर वैश्विक समस्या बन गया है। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का ढहना (Glacier Collapse) कितना घातक साबित हो सकता है। जहाँ एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग और जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के अत्यधिक उपयोग को ग्लेशियरों के घटने का मुख्य कारण माना जाता है, वहीं माउंट एवरेस्ट ग्लेशियर अध्ययन से एक नया और चौंकाने वाला सच सामने आया है। नेपाली और अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में पाया गया है कि माउंट एवरेस्ट पर पर्वतारोहियों द्वारा किया जाने वाला इंसानी पेशाब और बेस कैंप की व्यावसायिक गतिविधियां स्थानीय स्तर पर ग्लेशियरों को तेजी से पिघला रही हैं।
नेपाल में विनाशकारी बाढ़ और ग्लेशियर ढहने का अंतर्संबंध
हाल ही में नेपाल के काठमांडू और आसपास के इलाकों में आई आकस्मिक बाढ़ और तबाही के पीछे वैज्ञानिकों ने हिमालय में ग्लेशियरों के ढहने और हिमझीलों (Glacial Lakes) के फटने को मुख्य कारण बताया है। जब उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर पिघलते हैं, तो वे अस्थायी झीलों का निर्माण करते हैं। इन झीलों में पानी का दबाव बढ़ने पर ये अचानक फट जाती हैं, जिससे निचले इलाकों में नेपाल में बाढ़ की खबर जैसी तबाही देखने को मिलती है।
इस प्राकृतिक असंतुलन के पीछे केवल वैश्विक तापमान वृद्धि ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि मानव जनित स्थानीय कारक (Anthropogenic Factors) भी स्थिति को और बदतर बना रहे हैं।
रीजनल एनवायर्नमेंटल चेंज जर्नल की रिपोर्ट: क्या है पूरा मामला?
‘रीजनल एनवायर्नमेंटल चेंज’ (Regional Environmental Change) जर्नल में प्रकाशित एक ग्लेशियर के अध्ययन ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। इस शोध के अनुसार, माउंट एवरेस्ट के चढ़ाई सीजन (Climbing Season) के दौरान पर्वतारोहियों की उपस्थिति से खुम्बु ग्लेशियर पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
खुम्बु ग्लेशियर पर बेस कैंप का व्यावसायिक ढांचा
माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई का मुख्य केंद्र ‘एवरेस्ट बेस कैंप’ है, जो सीधे खुम्बु ग्लेशियर (Khumbu Glacier) के ऊपर स्थापित किया जाता है। हर साल मार्च से मई के बीच यहां एक अस्थायी शहर बस जाता है।
- 1,600 से अधिक टेंट: बेस कैंप में पर्वतारोहियों, गाइडों और सहयोगी स्टाफ के लिए 1,600 से ज्यादा टेंट लगाए जाते हैं।
- आधुनिक सुविधाएं: इन टेंटों में केवल रहने की जगह ही नहीं होती, बल्कि कमर्शियल किचन, शॉवर टेंट, डीजल जनरेटर, वाई-फाई राउटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल होते हैं।
1,600 टेंट, जनरेटर और वाई-फाई से बढ़ता स्थानीय तापमान
इन 1,600 टेंटों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाली ऊष्मा (Heat Energy) सीधे बर्फ की सतह को प्रभावित करती है। जनरेटर का धुंआ और काली राख (Black Carbon) बर्फ पर जम जाती है, जिससे बर्फ की सूर्य की किरणों को परावर्तित करने की क्षमता (Albedo Effect) कम हो जाती है। परिणामस्वरूप, बर्फ तेजी से सौर ऊर्जा अवशोषित करने लगती है और पिघलाव शुरू हो जाता है।

इंसानी पेशाब और बर्फ का पिघलना: वैज्ञानिक गणित और आंकड़े
इंसानी पेशाब पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि क्या मानव शरीर का जैविक कचरा भी ग्लेशियर को नुकसान पहुंचा सकता है। इस अध्ययन के नतीजे काफी आंखें खोलने वाले हैं।
ऊंचाई पर निर्जलीकरण (Dehydration) और मूत्र उत्सर्जन की दर
माउंट एवरेस्ट जैसी अत्यधिक ऊंचाई पर मानव शरीर को डिहाइड्रेशन (निर्जलीकरण) और एल्टीट्यूड सिकनेस से बचाने के लिए पर्वतारोहियों को प्रतिदिन 4 से 5 लीटर पानी पीने की सलाह दी जाती है।
- अधिक तरल पदार्थ के सेवन के कारण पर्वतारोही बार-बार मूत्र विसर्जन करते हैं।
- 2023 के क्लाइम्बिंग सीजन के आंकड़ों के मुताबिक, बेस कैंप में प्रतिदिन औसतन 6,766 लीटर पेशाब बर्फ पर बहाया गया।
37°C का शारीरिक तापमान और थर्मल ट्रांसफर की सच्चाई
मानव शरीर का सामान्य तापमान 37°C (98.6°F) होता है। जब यह गर्म तरल शून्य से नीचे के तापमान वाली बर्फ पर गिरता है, तो इसमें मौजूद थर्मल एनर्जी (ऊष्मीय ऊर्जा) बर्फ को पिघलाने का काम करती है।
वैज्ञानिक गणना के अनुसार:
- कुल वार्षिक बर्फ का पिघलाव: पर्वतारोहियों की गतिविधियों और कुल ऊष्मा के कारण हर साल लगभग 2,500 टन बर्फ पानी में बदल जाती है।
- पेशाब की सीधी भूमिका: हालांकि पेशाब से निकलने वाली पूरी गर्मी बर्फ तक नहीं पहुंचती (क्योंकि कुछ गर्मी हवा और आसपास की चट्टानों में अवशोषित हो जाती है), फिर भी केवल इंसानी पेशाब की गर्मी से एक सीजन में लगभग 154 टन बर्फ सीधे पिघल जाती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यद्यपि 154 टन का आंकड़ा कुल ग्लेशियर के आकार की तुलना में छोटा लग सकता है, लेकिन यह सूक्ष्म स्तर पर ग्लेशियर के आंतरिक ढांचे को कमजोर करने के लिए काफी है।
हिमालय में तेजी से बढ़ता तापमान: एक वैश्विक चेतावनी
यह ग्लेशियर का अध्ययन केवल एक स्थानीय समस्या की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि यह हिमालयी क्षेत्र में आ रहे बड़े जलवायु परिवर्तन का संकेतक है।
| मीट्रिक / कारक | आंकड़े / प्रभाव |
| वार्षिक बर्फ पिघलाव (कुल) | ~2,500 टन प्रति वर्ष |
| पेशाब से पिघलने वाली बर्फ | ~154 टन प्रति सीजन |
| दैनिक पेशाब का प्रवाह (2023) | 6,766 लीटर प्रति दिन |
| बेस कैंप सतह तापमान वृद्धि | +0.28°C प्रति वर्ष |
| पिघलाव दर में वृद्धि (2000 के बाद) | पिछली तिमाही की तुलना में 2x (दोगुनी) |
खुम्बु ग्लेशियर पर 0.28°C प्रतिवर्ष की चिंताजनक वृद्धि
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है।
- वर्ष 2000 के बाद से हिमालय में बर्फ पिघलने की गति पिछली शताब्दी की अंतिम तिमाही की तुलना में दोगुनी हो चुकी है।
- सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि एवरेस्ट बेस कैंप की सतह का तापमान खुम्बु ग्लेशियर के अन्य हिस्सों की तुलना में 0.28 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है।
यह अनियंत्रित तापमान वृद्धि आने वाले समय में भीषण जल संकट, अप्रत्याशित बाढ़ और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश का कारण बन सकती है।
हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के संभावित उपाय
माउंट एवरेस्ट को एक कचरा डिपो और पर्यावरण संकट से बचाने के लिए कड़े कदम उठाना अनिवार्य हो गया है:
- पोर्टेबल वेस्ट बैग्स (WAG Bags) का अनिवार्य उपयोग: नेपाल सरकार को सभी पर्वतारोहियों के लिए मानव मल और मूत्र को बेस कैंप से वापस नीचे लाने का नियम सख्ती से लागू करना चाहिए।
- बेस कैंप का स्थानांतरण: खुम्बु ग्लेशियर के नाजुक ढांचे को बचाने के लिए बेस कैंप को ग्लेशियर की बर्फ से हटाकर निचली चट्टानी सतह पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
- कमर्शियल गतिविधियों पर सीमा: एवरेस्ट पर जाने वाले पर्वतारोहियों की वार्षिक संख्या और बेस कैंप में जनरेटर/लक्जरी टेंटों के इस्तेमाल पर कड़ा नियंत्रण होना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: क्या इंसान का पेशाब वास्तव में ग्लेशियरों को पिघला सकता है?
उत्तर: हां, मानव शरीर से लगभग 37°C तापमान पर निकलने वाला पेशाब बर्फ के संपर्क में आते ही अपनी ऊष्मीय ऊर्जा से बर्फ को पिघलाता है। अध्ययन के अनुसार, एवरेस्ट पर हर सीजन में केवल पेशाब की गर्मी से लगभग 154 टन बर्फ पिघल जाती है।
Q2: खुम्बु ग्लेशियर क्यों महत्वपूर्ण है और इस पर क्या खतरा है?
उत्तर: खुम्बु ग्लेशियर माउंट एवरेस्ट का मुख्य मार्ग है। इस पर हर साल 1,600 से अधिक टेंट और इंसानी गतिविधियों का दबाव रहता है। इसका सतह तापमान 0.28°C प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है, जिससे इसके ढहने का खतरा बना हुआ है।
Q3: नेपाल में आई हालिया बाढ़ का ग्लेशियरों से क्या संबंध है?
उत्तर: तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं और अस्थायी हिमझीलें (Glacial Lakes) बनाते हैं। जब ये झीलें फटती हैं, तो अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods) नीचे बसे गांवों और शहरों में तबाही मचाती है, जैसा कि नेपाल में देखा गया।
Q4: एवरेस्ट बेस कैंप में बर्फ पिघलने के मुख्य मानव-जनित कारण क्या हैं?
उत्तर: बेस कैंप में रसोई, शॉवर, डीजल जनरेटर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाली गर्मी, जनरेटर का कार्बन उत्सर्जन, और हजारों लीटर इंसानी मल-मूत्र का बर्फ पर जमा होना बर्फ पिघलने के प्रमुख मानव-जनित कारण हैं।
निष्कर्ष
माउंट एवरेस्ट पर ग्लेशियर का पिघलना केवल प्राकृतिक ग्लोबल वार्मिंग का परिणाम नहीं है, बल्कि यह इंसानी हस्तक्षेप और अनियंत्रित पर्वतारोहण का भी प्रत्यक्ष परिणाम है। हालिया इंसानी पेशाब पर अध्ययन और नेपाल में आई बाढ़ की घटनाएं यह स्पष्ट संदेश देती हैं कि यदि हमने हिमालय के नाजुक पर्यावरण के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया, तो इसके परिणाम भयावह होंगे। माउंट एवरेस्ट को बचाने के लिए कड़े नियम, वेस्ट मैनेजमेंट और टिकाऊ पर्यटन (Sustainable Tourism) को तुरंत लागू करने की आवश्यकता है, ताकि ‘दुनिया की छत’ का अस्तित्व बना रहे।
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