Masik Shivratri And Pradosh Vrat : शिव कृपा की शुभ तिथि-महत्व,पूजा विधि और दुर्लभ संयोग का महत्व

Masik Shivratri And Pradosh Vrat : शिव कृपा की शुभ तिथि-महत्व,पूजा विधि और दुर्लभ संयोग का महत्व-हिंदू धर्म में भगवान शिव को भोलेनाथ कहा गया है-जो सच्चे मन से की गई भक्ति से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। शिव उपासना के अनेक व्रतों में प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि का विशेष स्थान है। ये दोनों ही व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित हैं और मन की शुद्धि, संकट निवारण, सुख-समृद्धि, वैवाहिक सौभाग्य और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जहां प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को प्रदोष काल में किया जाता है, वहीं मासिक शिवरात्रि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। कई बार ये दोनों तिथियां एक ही दिन पड़ जाती हैं, जिससे शिव-भक्ति का फल कई गुना बढ़ जाता है।प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि दोनों भगवान शिव को समर्पित अत्यंत शुभ व्रत हैं। जानिए इनकी तिथि, महत्व, पूजा विधि, अंतर और जब दोनों एक ही दिन पड़ें तो मिलने वाले विशेष फल।

प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat)-कब रखा जाता है ?

प्रदोष व्रत हर महीने शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (तेरस) को सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में रखा जाता है।

धार्मिक महत्व-माघ माह की तेरस को यह पयफल देने वाला व्रत रखा जाता है जो जीवन के कष्ट और बाधाओं का नाश करता है ,मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है ,धन-वैभव, वैवाहिक सुख और स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है और इसे करने से शिव कृपा की की प्राप्ति होती है व से आध्यात्मिक उन्नति होती है।

प्रदोष व्रत व माघ संक्रांति की पूजा विधि

इस व्रत को धारण करने के लिए प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें और संध्या समय प्रदोष काल में शिवलिंग पूजन
जल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर से पंचामृत अभिषेक करना चाहिए। इस दिन बेलपत्र, धतूरा, भांग अर्पित करें और काम से काम एक माला मंत्र जाप: “ॐ नमः शिवाय” कहते हुआ करना चाहिए फिर पूजन के अंत में शिव आरती करें और दान करना न भूलें।

मासिक शिवरात्रि (Masik Shivratri)-कब मनाई जाती है ?

हर माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है जिसमें माघ माह में पढ़ने वाली शिवसंक्रान्ति का विशेष महत्व मन जाता है ।

जानें इसका धार्मिक महत्व-पापों का नाश और आत्मशुद्धि,इच्छित फल की प्राप्ति,मोक्ष की ओर अग्रसर होने का अवसर,शिव-पार्वती दोनों की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है।

शिवसंक्रान्ति की पूजा विधि-व्रत रखकर दिनभर संयम,शिवलिंग पर अभिषेक और मंत्र जाप,रात्रि में विशेष पूजा का महत्व
गरीबों, ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान करने सी भगवन शिवा और माता पारवती अति प्रसन्ना होते है इसलिए व्रत पूजन के बाद दान ज़रूर करना चाहिए।

प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि का संयोग (Rare Combination)

कभी-कभी त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथि एक ही दिन पड़ती हैं। ऐसे में प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि एक साथ मनाई जाती हैं। यह संयोग अत्यंत दुर्लभ और फलदायी माना जाता है।

इस दिन पूजा करने के लाभ-शिव-पार्वती दोनों का संयुक्त आशीर्वाद,तीनों लोकों में सुख-शांति की प्राप्ति,लंबित मनोकामनाओं की पूर्ति तथा आध्यात्मिक शक्ति और सकारात्मकता में वृद्धि होती है।

प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि में मुख्य अंतर के बिंदु-

प्रदोष व्रत – मासिक शिवरात्रि ,तिथि त्रयोदशी-चतुर्दशी,पूजा समय-प्रदोष काल अनिवार्य पूरे दिन/रात्रि,प्रमुख उद्देश्य संकट निवारण मोक्ष व आत्मशुद्धि का पुण्य अवसर।

निष्कर्ष (Conclusion)-प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि-दोनों ही भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के श्रेष्ठ साधन हैं। इन व्रतों से न केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि आत्मिक शांति और मोक्ष का मार्ग भी खुलता है। यदि सौभाग्य से दोनों व्रत एक ही दिन पड़ जाएं तो उस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई शिव-पूजा जीवन को सकारात्मक दिशा देने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है। सच्ची भक्ति, शुद्ध मन और निस्वार्थ भाव-यही शिव उपासना का सार है।

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