मध्यप्रदेश पहला राज्य जंहा हिंदी से मेडिकल की पढ़ाई, अब क्या धूल फाक रही 10 करोड़ की किताबें?

एमपी। आज हिंदी दिवस है और हर कोई हिंदी को लेकर बात कर रहा है, तो ऐसे अवसर पर मध्यप्रदेश सरकार की एक ऐसी महत्वाकांक्षी योजना, जिसने देश भर के लोगो का ध्यान अपनी ओर खीच लिया था। वह थी मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य। यहां मेडिकल की पढ़ाई हिंदी से होगी, लेकिन यह योजना और करोड़ रूपए खर्च करके तैयार 50 हजार किताबों का क्या उपयोग नही हो पा रहा है। तीन साल पहले जो योजना अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ने के लिए लाई गई थी। क्या वह अब सिस्टम की उदासीनता और छात्रों के मन में बैठे डर के कारण उपेक्षा का शिकार हो रही है।

रिपोर्ट चौंकाने वाली

मीडिया खबरों के तहत जिस मेडिकल की पढ़ाई हिंदी में करवाने के लिए मध्य प्रदेश में व्यापक तैयारी की गई और पिछले तीन सालों में सरकार ने इस योजना पर 10 करोड़ रुपये खर्च करके 50 हजार किताबें भी छाप दीं, उसका एक पहलू यह सामने आ रहा है कि हिंदी माध्यम से एक भी छात्र परीक्षा देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

300 डॉक्टरों ने तैयार की थी किताबें

योजना की शुरूआत तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल की है। तब उन्होने मेडिकल की पढ़ाई हिंदी माध्यम से करवाने के लिए करीब 300 डॉक्टरों की टीम लगाए थें। जिन्होने 16 मेडिकल विषयों की किताबों का हिंदी में अनुवाद किया था। इस पूरी कवायद में अनुवाद पर 2 करोड़, किताबों की छपाई पर 5.5 करोड़ और कॉलेजों में स्थापित केंद्रों पर 3 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन मेडिकल छात्रों में शायद यह डर था कि हिंदी में जवाब लिखे, तो उन्हें कम नंबर मिलेगे। इसी खौफ का नतीजा है कि परीक्षाओं में अंग्रेजी के साथ ही हिंदी का प्रश्नपत्र मिलने के बाद भी किसी छात्र ने हिंदी में प्रश्नपत्र हल नही किया।

धूल फाक रही किताबें

हिंदी को बढ़ावा देने के लिए कॉलेजों में जो मंदार केंद्र स्थापित किए गए थे, उनका हाल बेहाल है। भोपाल के जीएमसी सहित कई जगहों पर इन केंद्रों में ताले लटक रहे हैं और पिछले एक साल से कार्यसमिति की कोई बैठक तक नहीं हुई है। यू कहा जाए कि मेडिकल की पढ़ाई हिंदी मीडियम से कराए जाने का अब यह उत्साह पूरी तरह ठंडा पड़ चुका है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *