रीवा। रीवा के प्रसिद्ध लक्ष्मणबाग मंदिर में भगवान जगन्नाथ स्वामी के बीमार पड़ने की सदियों पुरानी मान्यता है। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा पर 108 कलशों से महास्नान के बाद अत्यधिक जल के संपर्क में आने से प्रभु को सर्दी-बुखार हो जाता है। ठीक होने तक वे 15 दिनों के एकांतवास में रहते है। जब 15 दिन बाद भगवान पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाते हैं, तब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और भव्य रथयात्रा व नगर भ्रमण की शोभायात्रा निकाली जाती है।
स्नान का प्रभाव
मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा पर 108 घड़ों के पवित्र जल से स्नान करने के कारण भगवान को ठंड लग जाती है और वे अस्वस्थ हो जाते हैं। भक्तों के बीच मान्यता है कि भगवान को स्वस्थ करने के लिए इस अवधि में राजवैद्य (पारंपरिक वैद्य) उनकी एकांत में सेवा करते हैं। उन्हें आयुर्वेदिक काढ़े, फलों का रस व जड़ी-बूटियां अर्पित की जाती हैं। इस दौरान 15 दिनों तक मंदिर के कपाट पूरी तरह से बंद रहते हैं ताकि प्रभु को पूर्ण विश्राम मिल सके। इस समय उन्हें 56 भोग नहीं लगता, बल्कि केवल औषधीय काढ़ा और फलों का ही भोग लगाया जाता है।
इस अनूठी परंपरा के पीछे दो मुख्य मान्यताएं हैं
- भक्त की पीड़ा का स्वयं पर लेना
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माधवदास नाम के एक परम भक्त बहुत गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी पीड़ा देखकर स्वयं भगवान जगन्नाथ ने एक मनुष्य का रूप लिया और उनकी दिन-रात सेवा की, जब भक्त स्वस्थ हुआ, तो उसे प्रभु की लीला समझ आई, मान्यता है कि भगवान अपने भक्तों के कष्ट और बीमारियाँ हर साल अपने ऊपर ले लेते हैं।
- अत्यधिक स्नान से शारीरिक विकार
दूसरी मान्यता के अनुसार, अत्यधिक ठंडे जल से 108 कलशों के स्नान के कारण देवताओं को बुखार या सर्दी हो जाती है। इसके पीछे यह भाव जुड़ा है कि भगवान स्वयं को भी एक सामान्य मानव रूप में ढाल लेते हैं, जिन्हें आराम और उपचार की आवश्यकता होती है।
इस 15 दिन की बीमारी के दौरान भक्तों को भगवान के साक्षात दर्शन नहीं होते, बल्कि उनके प्रतिनिधि के रूप में पट चित्र (कपड़े पर बनी तस्वीरों) की पूजा की जाती है। भगवान के पूर्ण स्वस्थ होने के बाद ही वे भक्तों को दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण करते है।
भक्त वात्सल्य की कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के परम भक्त माधवदास गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। तब प्रभु ने एक छोटे बालक के रूप में स्वयं उनकी सेवा की थी। जब भक्त स्वस्थ हुआ, तो उसे पता चला कि उसके प्रभु ने उसकी पीड़ा और बीमारी अपने ऊपर ले ली थी। उसी घटना के स्मरण में भगवान हर साल 15 दिनों के लिए बीमार पड़ते हैं।




