“Jhanpi Ma Sayan” Bagheli Lokkatha: हम सबने अपने बघेलखंड -रीवा क्षेत्र में “झाँपी मा सयान” वाली कहावत और एक किस्सा जरूर सुना होगा। इस कहावत को लोग अक्सर हंसी-मजाक या किसी पर व्यंग्य कसने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह कहावत इस किस्से के बाद ही चलन में आई।
“झाँपी माँ सयान” बघेली किस्सा
कुछ पुरानी बात है, एक बार सीधी के चौहानों की बेटी का विवाह खड्डी के बघेलों के लड़के के साथ पक्का हो गया। दोनों पक्ष के लोग साथ बैठे थे कि बातों-बातों में युवा लड़कों के बीच हंसी-मजाक होते-होते बतबढ़ी हो गई। लड़की पक्ष वाले बोले, क्या स्वागत करते हैं आप लोग, रिकमज-इंदरहर (पारंपरिक व्यंजन) बनवा देंगे, और इसे ही बहुत बड़ा कहते हैं। चौहानों के यहाँ तो छोटी-मोटी बात पर भी सीधे बकरा कटता है। चौहानों की यह डींग सुनकर बघेल भला कैसे चुप रहते? वे बोल पड़े, “जानते हैं तुम्हारी खानदानी रईसी! फलाने की बारात में गए थे, तो कितने बकरे खिलाए थे? अब ज्यादा मत बताओ।”
अब चौहान तो चौहान ही थे, वे कहाँ चुप बैठने वाले थे। बोले, “कब नहीं मिला था तुम्हें बकरा? इस बारात में आओ, खूब खिलाएंगे। सौ बकरे कटवाएंगे, तुम लोग खूब लुत्फ उठाना।” अब बघेल तो रीवा राज्य वाले थे, वे ऐसी बातें कैसे सुन लेते। कहने लगे, “तुम्हारी हैसियत है सौ बकरे कटवाने की? घर-बगीचा सब बिक जाएगा।” इस पर लड़की वाले बोले, “और तुम्हारी हैसियत है सौ बकरे पचाने की? आँतें बाहर निकल आएंगी।” लड़के वालों ने कहा, “अगर तुम्हारी सौ बकरे कटवाने की हैसियत है, तो हमारी भी उन्हें खाने की हैसियत है।” बात इतनी बढ़ गई कि खानदान की आन-बान पर आ गई। दोनों तरफ के बुजुर्ग भी युवाओं की ‘हाँ में हाँ’ मिलाने लगे। लड़के वालों ने शर्त रखी, “अब वर आँगन में तभी जाएगा जब सौ बकरे कटेंगे।” बेटी वालों ने जवाब दिया, “मंजूर है, पर विदाई तभी होगी जब तुम सब मिलकर सौ बकरे खा लोगे।”
बेटी पक्ष के जो मुखिया थे, वे बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने सोचा कि यह लड़कों की बचकानी बहस है, बात ज्यादा क्यों बढ़ाई जाए, सब हंसी-खुशी संपन्न हो जाए। उन्होंने एक शर्त रखी- “बकरे तो हम सौ खिलाएंगे, पर बारात में कोई भी बुजुर्ग (सयान) नहीं आना चाहिए, तभी ऐसा होगा।” उन्होंने सोचा कि यह तो असंभव है, बारात में बुजुर्ग न आएं ऐसा भला कैसे हो सकता है? लड़के वाले मानेंगे नहीं और बात हंसी-मजाक में टल जाएगी।
पर लड़के वाले यह शर्त मान गए। जब लड़के वालों के बुजुर्ग इकट्ठा हुए, तो उन्होंने आपस में सलाह की। उन्होंने कहा, “बाकी सब तो ठीक है, पर चौहानों ने शर्त रखी है कि सब आएं पर कोई बुजुर्ग न आए। सिर्फ लड़के ही जाएंगे तो हुड़दंग करेंगे और बात संभाल नहीं पाएंगे, जिससे बघेलों की बदनामी होगी। इसलिए किसी न किसी बुजुर्ग को साथ जाना ही चाहिए, पर कैसे?”
वहीं परिवार के एक बुजुर्ग काका बैठे थे, जो बहुत चतुर और समझदार थे। काका ने सुझाव दिया, “जो बुजुर्ग जाए, उसे एक झाँपी (बांस का बड़ा पिटारा) के अंदर बंद कर दिया जाए और बारात में भेज दिया जाए।” घर के मालिक ने कहा, “काका ने स्वयं यह राय दी है और उनसे ज्यादा चतुर कौन है? क्यों न काका ही चलें।” सबने हाँ में हाँ मिलाई और काका तैयार हो गए। तैयारी पूरी हुई। हाथी, घोड़ों, बैलगाड़ियों और पालकियों के साथ बारात चली। एक पालकी में बड़ी सी झाँपी रखी गई, जिसमें बुजुर्ग काका बैठकर चले। जब बारात जनवासे पहुँची और कन्या पक्ष ने देखा कि बारात में सिर्फ युवक ही हैं, तो वे खुश हो गए।
जब द्वारचार का समय आया, तो उन्होंने फिर से एक शर्त रख दी- “गाँव में जो सोन नदी बहती है, उसमें जब आप लोग दूध की धार बहाएंगे, तभी बारात द्वारचार के लिए आएगी।” अब सब बाराती घबरा गए, किसी का दिमाग काम नहीं कर रहा था कि नदी में दूध की धार कैसे बहाएं।
काफी देर हो गई तो झाँपी में बंद बुजुर्ग ने पालकी का पर्दा उठाकर देखा और पूछा, “क्या बात है? आगे का काम क्यों रुका है? बारात द्वारचार के लिए क्यों नहीं जा रही?” तब उन्हें बारातियों ने शर्त के बारे में बताया। बुजुर्ग ने लड़कों को डांटते हुए कहा, “मुझे क्या सिर्फ बंद करने के लिए लाए थे? बताया क्यों नहीं अब तक? उस दिन तो तुम सब खूब बढ़-चढ़कर बोल रहे थे और अब इतने में घबरा गए? उनसे जाकर कहो कि पहले सोन नदी का पानी खाली कराओ, तब हम उसमें दूध बहाएंगे।” जब बारातियों ने कन्या पक्ष से यह बात कही, तो वे दंग रह गए। अब बाजी लड़के वालों के हाथ में थी।
बारात के दूसरे दिन फिर से कन्या पक्ष के ठाकुर आए और बोले, “शर्त के अनुसार सौ बकरे कटने हैं और बाराती भी सौ ही हैं। हिसाब से हर बाराती को एक-एक बकरा दिया जाएगा और उसे पूरा खाकर खत्म करना होगा, तभी हम तुम्हें असली ठाकुर मानेंगे और विदाई करेंगे।” यह सुनकर बाराती फिर सोच में पड़ गए कि भला एक आदमी एक पूरा बकरा कैसे खा सकता है? वे फिर काका के पास पहुँचे। झाँपी वाले बुजुर्ग ने कहा, “तुम सब गिनती के हिसाब से बकरे ले लो। फिर ऐसा करो कि पहले एक बकरा काटो, उसे पकाओ और सब मिलकर थोड़ा-थोड़ा खा लो। फिर दूसरा, फिर तीसरा। ऐसे एक-एक करके बनाओगे तो सब खत्म हो जाएंगे।” बारातियों ने वैसा ही किया। पहले एक बकरा पकाते, तो सौ बारातियों में एक-एक बोटी आती। इस तरह करते-करते उन्होंने सौ बकरे खा लिए। जब सारे बकरे खत्म हो गए, तो कन्या पक्ष वाले समझ गए कि दाल में कुछ काला है। जरूर बीच में कोई बुजुर्ग छिपा है जो इन लड़कों को अक्ल दे रहा है, वरना इन उद्दंड लड़कों में इतनी बुद्धि कहाँ!
अंत में विवाह संपन्न हुआ और विदाई की तैयारी होने लगी। जब शिष्टाचार (नेग-दस्तूर) का समय आया, तो कन्या पक्ष के बुजुर्ग आए और बोले, “भैया, शर्त तो तुम जीत गए, ब्याह भी हो गया। पर सच-सच बताओ, कोई न कोई बुजुर्ग तुम्हारे साथ जरूर है।” अब बात खुल चुकी थी, तो सब कुछ बता दिया गया। कन्या पक्ष वाले लड़के वालों की बुद्धिमानी के कायल हो गए और बोले, “जब काका यहाँ मौजूद हैं, तो उन्हें झाँपी से बाहर निकालिए, हम शिष्टाचार उन्हीं के साथ करेंगे।” काका अपनी मूँछों पर ताव देते हुए झाँपी से बाहर निकले। सारा आदर-सत्कार हुआ और काका शान से बारात विदा करवाकर लाए। तभी से यह कहावत चल पड़ी- “सयान का झाँपी मा बंद कइके लइ जाय”। इस कहानी को लोग अपने-अपने ढंग से नाम और जगह बदलकर आज भी सुनाते हैं।




