Rewa Holi | बघेलखण्ड में कैसे मनाई जाती थी होली

Rewa Holi In Hindi: होली भारत की सांस्कृतिक चेतना का एक अतिप्राचीन और उल्लासपूर्ण पर्व है, जो अनादिकाल से ही सम्पूर्ण भारतवर्ष में बड़े उत्साह और लोकआस्था के साथ मनाई जाती है। होली का पर्व रीवा और विंध्यक्षेत्र में भी बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। वैसे तो फगुआरों द्वारा होली के फाग गीत गाने महीने भर गाए जाते हैं, लेकिन फिर भी होली का पर्व मूलतः फाल्गुन पूर्णिमा से लेकर 5-7 दिन बुढ़वा मंगल तक मनाया जाता है। दरसल बुढ़वा मंगल मुख्य रूप से होली के बाद आने वाले पहले मंगलवार को कहा जाता है।

कैसे की जाती थी होलिका की तैयारी

सबसे पहले होलिका दहन का दिन होता है, इस दिन सूखी लकड़ियाँ और घाँस-फूस को एक जगह इकट्ठा किया जाता है, जिस जगह होली जलाई जानी होती है, वहाँ पहले रेंड़ा के पेड़ की कोई शाखा गाड़ दी जाती है, जिसे डाँड कहते हैं और उसके चारों तरफ सूखी लकड़ियाँ और घाँस-फूस को एक जगह इकट्ठा करके रख दिया जाता है, और फिर रात को जब गाँव-मुहल्ले के सब लोग खाना खा लेते हैं, उसके बाद ही होली जलाई जाती है, क्योंकि मान्यता है होली जलने के बाद सूतक लग जाता है और दूसरे दिन स्नान करने के बाद ही हटता है और सूतककाल में भोजन वर्जित होता है। घरों से लोग होली को तापने जाते हैं, जिसमें गोबर से बने छोटे-छोटे उपले, जिन्हें बल्ला कहा जाता है, उन्हें होलिका में समर्पित किया जाता है, यह घरों में बनाए जाते हैं। इसके साथ ही राई, नमक और चोकरा जो गेहूं के आटे को छानने के बाद निकलता है, उसको अपने पूरे शरीर से सात बार उतार के, होलिका की परिक्रमा करते हुए, उसमें डाल दिया जाता है और होलिका को देवी मानकर उससे अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है। कई लोग गेहूं के बाल और चने के पौधों को भी होलिका को तपाते हैं, पहले के समय में लोगों द्वारा अपने घर के अस्त्र-शस्त्र को भी होली तपवाया जाता है। बाद में होली जल जाने के बाद, डाँड उखाड़ा जाता है और उसके राख का टीका भी लगाया जाता है।

फगुआ के दिन भगवान जगन्नाथ को लगता था भोग

धुरेड़ी का दिन होली दहन के दूसरे दिन होता है, जिसे स्थानीय भाषा में फगुआ भी बोला जाता है, उस दिन बघेलखंड के ज्यादातर घरों में भगवान जगन्नाथ को गुड़वाले रोट का प्रसाद चढ़ाया जाता है, यह परंपरा संभवतः रीवा राजपरिवार के कारण ही विंध्यक्षेत्र के गाँवों में प्रचलित हुआ है। दरसल रीवा के शासक वैष्णव परंपरा से दीक्षित होते थे, 17 वीं शताब्दी में यहाँ के महाराज भाव सिंह जी थे, वह भगवान जगन्नाथ के परमभक्त थे, उन्होंने पुरी की यात्रा की थी और वहाँ से भगवान जगन्नाथ के विग्रह लाकर रीवा किला परिसर, मुकुंदपुर और कोटर में स्थापित करवाए थे। चूंकि भगवान जगन्नाथ को होली के दिन महाप्रसाद का भोग लगता है, फलस्वरूप इसीलिए यहाँ पर भी भगवान को प्रत्येक वर्ष होली उत्सव के समय महाप्रसाद चढ़ाया जाने लगा। और संभवतः इसीलिए यह इस धीरे-धीरे पूरे विंध्य क्षेत्र में भी प्रचलित हो गया। इस दिन घरों में बहुत सारी मिठाइयां और पकवान बनते हैं, जिनमें कुशली पपरी, मौहरी इत्यादि प्रमुख हैं। इसीलिए पहले के समय में विंध्य के कई गाँवों में धुरेड़ी के दिन फगुआ नहीं खेला जाता था, बल्कि उसके अगले दिन होली खेली जाती थी।

बघेलखण्ड में कैसे मनाई जाती थी होली | Rewa Holi

होली खेलने के रंग तब प्राकृतिक ही हुआ करते थे, घरों में ही छिउला के फूलों से रंग बनाया जाता था, इसके अलावा रामरज से गेहुआँ पीलारंग और जानकीरज से सुर्ख लाल रंग बनता था, दरसल रामरज और जानकीरज मिट्टियों के दो प्रकार होते हैं जो क्रमशः पीले और लाल रंग के होते हैं, एक दम शुद्ध और प्राकृतिक, आज के तरह केमिकल युक्त नहीं। इसके साथ ही शुद्ध अबीर जिसे कुमकुमा में भरकर खेला जाता था। दरसल पहले के समय में कुमकुमा एक गोल-खोखला गोला होता था, जिसे लाख से बनाया जाता था और उसमें अबीर-गुलाल भरकर एक-दूसरे के ऊपर फेंका जाता था। हालांकि अब ना ये रंग और अबीर हैं और ना ही इन्हें बनाने वाले। यदा-कदा सम्पन्न लोगों के यहाँ भांग भी छनती थी, जिसका सेवन स्त्री-पुरुष दोनों करते थे।

विंध्य की देवर-भाभी की होली

वैसे तो स्त्री-पुरुष, बच्चे, वृद्ध सभी होली हर्षोल्लास के साथ खेलते हैं, पर बघेलखंड में देवर-भाभी की होली बड़ी प्रसिद्ध रही है, जिसमें भाभियाँ अपने देवरों पर रंग डालते हुए चुटीले ताने कसती थीं, जबकि देवर भी हंसी मजाक में उत्तर देते हैं। इस संवाद में मर्यादा और अपनापन दोनों होता था, बाद में रंग-अबीर खेलने के बाद भाभी देवरों को पान खिलाती थीं और देवर भी उनके पाँव छूकर आशीर्वाद लेते थे।

सप्ताह भर होता था फगुआ जोहार

होली खत्म हो जाने के बाद भी सप्ताह भर लोग एक-दूसरे के यहाँ फगुआ जोहारने जाते थे। फगुआ जोहारने की मंडली स्त्री और पुरुषों की अलग-अलग जमती थी, और फगुआ स्त्री और पुरुषों दोनों द्वारा गाया जाता है, स्त्री और पुरुष फगुए में अंतर केवल सुर का होता है। बघेली फाग गीत की बहुत ज्यादा साम्यता अवधी गीतों से है, इसे लोकसंस्कृति के तीन रागों बुन्देली, बघेली और बैसवारा में गया जाता है। फगुआ के गीत गाते समय मृदंग, ढोलक और नगरिया इत्यादि वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। यहाँ के फाग गीतों में सीता-राम, राधा-कृष्ण और शिव-पार्वती का जिक्र आता है, नायक और नायिका का प्रेम और विरह का भी वर्णन आता है, इसके अलावा हंसी-मजाक, चुहलबाजी और मनुहार भी इन गीतों में प्राप्त होता है।

बघेलखण्ड का सुप्रसिद्ध फाग गीत

लेकिन विंध्यक्षेत्र के फगुआ गीत केवल भक्ति, शृंगार और हास्य-विनोद तक ही सीमित नहीं हैं, इनमें तत्कालीन राजा महाराजाओं के व्यक्तित्व और पराक्रम का भी वर्णन मिलता है। विशेष रूप से बांधवेश महाराज गुलाब सिंह का तो बार-बार जिक्र मिलता है। एक उदाहरण देखिए – “बांधवपति महाराजा गुलाब सिंह चौकस गोली मारंय” अर्थात बांधवपति महाराज गुलाब सिंह चौकन्ना होकर गोली चलाते हैं। इस गीत की पंक्ति बताती है महाराज की निशानेबाजी इतनी सटीक थी और वह अपना अपना लक्ष्य भेद सकते थे।

फगुआ में महाराज गुलाब सिंह का जिक्र

महाराज गुलाब सिंह अपनी प्रजा में बेहद लोकप्रिय थे, इसीलिए तो जब ब्रिटिश सरकार ने साजिश के तहत उन्हें गद्दी से हटा दिया और रीवा आने का निषेध कर दिया था, बाद में निर्वासनकाल में ही मुंबई में एक दुर्घटनावश उनका देहांत हो गया। दरसल महाराज ने रीवा राज्य में कई सारे सामाजिक सुधार के कार्य किए थे, एक लोकप्रिय महाराज को उनकी प्रजा ने लोकगीतों के माध्यम से याद किया। फगुआ का एक और उदाहरण देखिए-

“बांधवपति महाराज गुलाब सिंह रीमा वीराना कई गें…… हाथी रोबै हथिखाने मा, घोड़ा रोबै घुड़सारे,…….अऊ पिंजरा मा उया तोंता रोबै, के देई चना कइ दार, गुलाब सिंह रीमा वीराना कई गें।”

इस फगुआ गीत में हाथियों, घोड़ों और पिंजरे के तोते तक का रोना एक प्रतीक है, मानो सम्पूर्ण राज्य मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी तक अपने स्वामी के वियोग में शोकाकुल होकर रो रहे हैं। “रीमा वीराना कई गें” पंक्ति उसी भाव को व्यक्त करती है, जिसे यहाँ की जनता ने अनुभव किया था। इन गीतों में राजा का उल्लेख यह दर्शाता है कि शासक और प्रजा के बीच एक सांस्कृतिक संबंध भी होता था। रीवा के कई राजा स्वयं फाग गीत गाते थे, महाराज विश्वनाथ सिंह तो प्रखर मृदंग वादक थे, कहा जाता है वह फाग गीत गाने वाले लोगों के साथ बैठकर मृदंग बजाते और ताल मिलाकर फगुआ गाने लगते थे।

रीवा राजपरिवार की होली

दरसल यहाँ होली उत्सव रीवा राजपरिवार द्वारा भी बड़े-बड़े धूमधाम से मनाया जाता था, जैसा कि हमने पहले ही बताया था कि रीवा के राजा परम वैष्णव थे और भगवान जगन्नाथ के भक्त, इसीलिए यहाँ होली के दिन भगवान की भव्य पूजा बड़े धूम-धाम से की जाती थी, रियासत के सैनिक भगवान जगन्नाथ को तोपों की सलामी देते थे और उन्हें महाआटिका का भोग लगता था, महाआटिका में कढ़ी-भात का प्रसाद होता था, यह महाप्रसाद राज-परिवार के साथ नगर-वासियों को भी प्रसाद वितरित किया जाता था। हालांकि महाप्रसाद का भोग और उसके वितरण की यह परंपरा अभी भी चल रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *