History Of Deur-Kothar: रीवा जिले में स्थित देउर कोठार का इतिहास अत्यंत रोचक है। यहाँ करीब 2300 साल पुराने बौद्ध स्तूपों के साथ ही पांच हजार साल पुराने शैलचित्र भी मिलते हैं। आइए जानते हैं देउर-कोठार का सम्पूर्ण इतिहास।
प्राचीन व्यापारिक मार्ग के मध्य स्थित था देउर-कोठार
प्राचीन समय में जब महाजनपदों का उदय हुआ और नगर बसे, तो उनके मध्य सांस्कृतिक और व्यापरिक यात्राएं होना स्वाभाविक था, तो वत्स से अवन्ती महाजनपद की यात्रा इन्हीं क्षेत्रों से ही होकर की जाती थी। कल्पना करिए उस दौर में जब संसाधन विहीन मनुष्य पैदल ही लंबी-लंबी यात्राएं करता था, तब उसके पास कोई नक्शा तो होता नहीं था, इसीलिए रास्ते में पड़ने वाले नदी, तालाब, पहाड़ और घास के बड़े-बड़े मैदान ही रास्तों के मार्गदर्शक और पहचान हुआ करते थे। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार दक्षिण एशिया के प्राचीनतम व्यापारिक मार्गों का निर्माण ऐसे ही हुआ। इन मार्गों से केवल व्यापार ही बस नहीं होता था, बल्कि ज्ञान और संस्कृति का आवागमन भी होता था। मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों से पता चलता है, इन मार्गों को समय-समय पर और बेहतरीन बनाया जाता था, जिससे यात्रियों, व्यापारियों और सेनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने में कोई दिक्कत ना हो। बौद्धभिक्षु भी गांव-गांव में भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने लगे। माना जाता है जब किसी इलाके में व्यापरिक गतिविधियां ज्यादा होती थीं, तो उसके साथ ही धार्मिक गतिविधियां भी बढ़ जाती थीं, परिणामस्वरूप धीरे-धीरे इन मार्गों के निकट स्तूपों का निर्माण होने लगा।
देउर-कोठार का इतिहास | History Of Deur-Kothar
इसी व्यापारिक सिलसिले की एक अद्भुत कड़ी है देउर-कोठार का महास्तूप, सोहागी घाटी के ऊपर, समतल जमीन से 11 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह स्तूप, महज मिट्टी की ईंटों और पत्थरों का ढांचा मात्र नहीं है, बल्कि उस समय की यात्राओं और आस्थाओं का प्रत्यक्ष गवाह है। दरसल दक्षिणापथ का जो मार्ग विंध्य के वनों से गुजरता था, उसका नाम कांतारपथ था, मौर्यकाल में सांस्कृतिक और व्यापारिक यात्राओं के कारण ही, इस मार्ग के मध्य ख़तिलवार, अमिलकोनी, देउर-कोठार, केउटी, इटहा और भरहुत आदि प्रमुख स्थल विकसित हो गए। इसकी पुष्टि वासुदेव शरण अग्रवाल की किताब “पाणिनिकालीन भारत” से भी होती है।
कहाँ है देउर-कोठार | Where is Deur-Kothar
देउर-कोठार रीवा जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर, रीवा-प्रयाग राष्ट्रीय राजमार्ग में स्थित कटरा से करीब 5 किलोमीटर दूर, एक राष्ट्रीय महत्व का बौद्ध स्थल है। यहाँ मौर्यकालीन सम्राट अशोक के समय में निर्मित बौद्ध स्तूप पाए गए हैं। और साथ ही यहाँ के शैलाश्रयों में पांच हजार वर्ष पुराने शैलचित्र भी मिलते हैं। इन स्तूपों की खोज भारतीय पुरातत्व के अधिकारी पी. के. मिश्रा ने 1982 में बरहट के सरपंच अजीत सिंह के सहयोग से की थी। 1988 में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर दिया।
कैसे हुई देउर-कोठार की खोज | How Was Deur-Kothar Discovered
दरसल देउर-कोठार दो शब्दों के मेल से बना है देउर और कोठार, कुछ स्थानीय भाषाविद मानते हैं देउर शब्द देवघर का अपभ्रंश होगा और कोठार का अर्थ होता है भंडार। पहले इस गांव के लोगों के लिए, यह स्थान ईंट के भट्ठे के अतिरिक्त कुछ नहीं था, इसीलिए बहुत से ग्रामीणजन यहाँ की ईंटों को अपना घर बनाने के लिए उठा ले जाते थे, लेकिन बरहट गांव के सरपंच अजीत सिंह को यह सामान्य ईंट का भट्ठा नहीं लगता था। इसी बीच भोपाल पुरातत्व से 26 साल के युवा पुरातत्ववेत्ता फणिकांत मिश्रा को रीवा पोस्टेड किया गया, रीवा में वह त्यौंथर तहसील में अपनी खोजें किया करते थे, उन्होंने इस दौरान कई मूर्तियाँ और ध्वस्त गढ़ी वगैरह के अवशेष खोजे, लेकिन उन्हें अब तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली थी।
किसने की देउर-कोठार की खोज
अपनी इन्हीं खोजी यात्राओं के दौरान वे एक रात बरहट के सरपंच अजीत सिंह के यहाँ रुके थे, अपनी पुरातत्व जर्नी के दौरान कुछ विशेष सफलता ना मिलने के कारण वह थोड़े अपसेट थे, उन्होंने सरपंच साहब से कहा मैं अब रीवा में नहीं रहूँगा, दूसरी जगह अपना ट्रांसफर करवा लूँगा, क्योंकि यहाँ खोजने के लिए कुछ है नहीं। तो अजीत सिंह ने पूछा सर आप क्या खोज कर रहे हैं, मिश्रा जी ने जवाब दिया पुरातात्विक स्थल। अजीत सिंह ने कहा आप मेरे साथ जंगल की तरफ चल सकते हैं, वहाँ एक बहुत प्राचीन ईंटा का भट्ठा है। पीके मिश्रा, अजीत सिंह के साथ जब ट्रैक्टर में सवार होकर, अंधेरे में नौ बजे रात जंगल पहुंचे, तो उन्हें यह एहसास हो गया था, यह कोई साधारण ईंट का भट्ठा नहीं है, बल्कि भारत के इतिहास और बौद्ध संस्कृति का छुपा हुआ खजाना है, क्योंकि वहाँ पर उन्हें कुछ नॉर्थ ब्लैक पॉलिशड मृदभांड मिले, जो इस स्थल को मौर्यकाल का साबित करते थे। पी. के. मिश्रा बताते हैं, वह रात भर सो नहीं पाए और सुबह ही जिला मुख्यालय रीवा की लाइब्रेरी पहुंचे, उनसे पहले कनिंघम, मार्शल और आर. डी. बनर्जी जैसे खोजी पुरातत्ववेत्ताओं ने विंध्य क्षेत्र की यात्रा की थी, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी क्योंकि उनमें से कोई भी इस स्थल तक नहीं पहुँच पाया था।
देउर-कोठार का पुरातात्विक महत्व
बाद में पी.के. मिश्रा और उनकी टीम ने 1999 से 2001 के बीच जब यहाँ उत्खनन कार्य करवाए, तो उन्हें बहुत ही महत्व की वस्तुएं मिली थीं। यहां से लगभग 3 बड़े और 46 छोटे स्तूप प्राप्त हुए हैं। इन प्राप्त स्तूपों में से, तीन बड़े स्तूप पक्की ईंटों से बने हैं, जो संभवतः मौर्यकाल के होंगे, जबकि बाकि पत्थरों द्वारा निर्मित हैं, जो संभवतः कुछ बाद के होंगे। पक्की ईंटों से निर्मित यह मौर्यकालीन स्तूप भारतीय स्तूप-निर्माण परंपरा के प्रारंभिक चरण का उत्कृष्ट उदाहरण है। यद्यपि इसके द्वार-स्तंभ भरहुत और साँची के स्तूपों की भाँति अत्यधिक अलंकृत नहीं हैं। लेकिन यहाँ पत्थरों से निर्मित परिक्रमा पथ प्राप्त हुआ है जिसे पत्थर की रेलिंग से घेरा गया है। विद्वान मानते हैं के ये स्तूप संभवतः भरहुत और साँची जैसे ही विशाल रहे होंगे और उनसे भी ज्यादा प्राचीन।
देउर-कोठार से क्या-क्या प्राप्त हुआ | What was recovered from Deur-Kothar
पुरातात्विक सर्वेक्षण में यहाँ से बड़ी संख्या में पत्थर की सुचिकाएँ तथा खंडित स्तंभ प्राप्त हुए हैं। साथ ही, उत्खनन में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के अनेक तांबे के सिक्के भी मिले हैं, जिन पर पर्वत के ऊपर चंद्रमा का अंकन तथा रेलिंग से घिरे वृक्ष के प्रतीक चित्रित हैं, जो इस काल की धार्मिक प्रतीकात्मकता को दर्शाते हैं। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि यहाँ से अशोककालीन ब्राह्मी लिपि में लिखित अभिलेखीय स्तंभ भी प्राप्त हुए हैं। इन पर भरहुत के समान ही दानदाताओं के नाम अंकित हैं, जो उस समय की लोक-श्रद्धा और दान परंपरा को उजागर करते हैं। विद्वानों के अनुसार मुख्य स्तूप के पश्चिमी क्षेत्र से बलुआ पत्थरों से निर्मित, छः पंक्तियों वाला ब्राम्ही लिपि का एक एक खंडित अभिलेख मिला था, जिसे भगवान बुद्ध से सबंधित सर्वप्रथम साक्ष्य माना जाता है। शिलालेख की पहली पंक्ति में ही “भगवतो बुध” लिखा हुआ है। विद्वानों के अनुसार शिलालेख का सार यह है, यहाँ रहने वाले आचार्य धर्मदेव और उसके तीन शिष्यों उत्तरमित्र, भद्र और उपासक ने, इस स्तंभ का निर्माण कर उसे भगवान बुद्ध की स्मृति में समर्पित किया था। एक खंडित अभिलेख तो मुख्य स्तूप के एकदम बीच पत्थरों के मार्ग में ही था, जिसे अब कुछ दूर किनारे में रख दिया गया है। लेकिन इस अभिलेख को देखकर हमारे टीम को निराशा हुई, क्योंकि अभिलेख उचित रख-रखाव के अभाव में, यह धीरे-धीरे जीर्ण-शीर्ण हो रहा है।
गुहाओं के कुछ ऊपर पत्थरों द्वारा निर्मित सीढ़ियाँ बनी हैं, जो ऊपर एक चबूतरे तक जाती हैं, बहुत संभव है यहाँ बैठकर प्रवचन, गोष्ठियाँ और विद्वानों के मध्य वाद-विवाद होते रहे होंगे। इसके साथ ही यहाँ पर मिट्टी के बर्तन, मनके, पंचमार्क सिक्के और तोरणद्वार के खंडित हिस्से भी प्राप्त हुए हैं।
5000 साल पुराने शैलचित्र
लेकिन यहाँ पर केवल बौद्ध स्तूपों के अवशेष ही प्राप्त नहीं होते हैं, बल्कि प्राचीन प्राकृतिक गुहाएँ भी प्राप्त होती हैं, जिनमें शैलचित्र बने हुए हैं। विद्वान इन्हें अनुमानतः पांच हजार वर्ष पुराना मानते हैं, ये चित्र लाल गेरुए पत्थर से निर्मित हैं, हालांकि हमारी टीम को उन गुहाओं को ढूँढने में काफी मशक्कत करनी पड़ी, लेकिन एक स्थानीय व्यक्ति की मदद से हम शैलचित्रों तक पहुँच ही गए, लेकिन हमें सजावटी चित्रों के अतिरिक्त कुछ ज्यादा नहीं मिला, लेकिन अनुसंधान करने वाले पुरातत्ववेत्ताओं की रिपोर्ट बताती हैं, यहाँ विविध प्रकार के शैलचित्र हैं, जिनमें शिकार इत्यादि के दृश्य का भी अंकन है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रहा जानकारी के आभाव या भूलवश हमारी नजर उन चित्रों पर नहीं पड़ी।
यहाँ पर्यटन विकास की असीम संभावनाएं
दरसल शासन और प्रशासन द्वारा उचित व्यवस्था ना होने के कारण ऐसा हो रहा है, यहाँ पर्यटन विकास की असीम संभवानाएं हैं, क्योंकि सोहागी पहाड़ से तराई की घाटी से लेकर सुदूर प्रयागराज तक मनोहारी दृश्य दिखते हैं, बरसात के महीने में तो यहाँ की खूबसूरती में और भी चार-चांद लग जाते हैं, जब कई पहाड़ी झरने यहाँ बहने लगते हैं, शायद इसीलिए हजारों वर्षों पहले यह पथिकों के विश्राम और वर्षावास की पसंदीदा जगह रही होगी।
कैसे हुआ देउर-कोठार का पतन
लेकिन आश्चर्य करने वाली बात है, इतना समृद्ध रहे देउर-कोठार का पतन क्यों और कैसे हुआ होगा, यह अभी विस्तृत अनुसंधान के आभाव में सटीक तौर पर तो नहीं बताया जा सकता, लेकिन फिर भी यह अनुमान लगाया जाता है, शुंगकाल में आकर देउर-कोठार में आवाजाही सीमित हो गई हो गई होगी और इसका महत्व घटने लगा होगा। इसका एक प्रमुख कारण संभवतः भरहुत का उभार होगा। भरहुत के उदय का कारण क्या था, यह बहुत स्पष्टः तो बताया नहीं जा सकता है, पर अनुमानतः सोहागी की कठिन चढ़ाई के स्थान पर, पठार क्षेत्र में स्थित भरहुत वाणिज्य का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा होगा, जिसके कारण उसे राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ, जैसा कि भरहुत से प्राप्त शुंग सामंतों के अभिलेखों से भी यह बात पता चलती है। हालांकि देउर-कोठार में गतिविधियां पूर्णतः बंद नहीं हुई होंगी, बल्कि सीमित हुई होंगी ऐसा भी अनुमान शोधकर्ताओं द्वारा लगाया जाता है। और इसीलिए फिर धीरे-धीरे यह स्थान महत्वहीन हो गया होगा। हालांकि रीवा के सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ अजय सिंह के अनुसार इसके नष्ट होने का कुछ कारण प्राकृतिक आपदा भी हो सकती है।



