हिंदी दिवस। हिंदी भाषा की शुरुआत संस्कृत से हुई है, जो समय के साथ प्राकृत, अपभ्रंश और फिर पुरानी हिंदी के रूप में विकसित हुई। हिन्दी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है। मध्ययुग में भक्ति आन्दोलन में हिन्दी खूब फली फूली। पूरे देश के भक्त कवियों ने अपनी वाणी को जन-जन तक पहुंचाने के लिये हिन्दी का सहारा लिया। हिन्दी भाषा के विकास में सन् 1800 में अंग्रेजों द्वारा कलकत्ता में स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज का अहम योगदान है। कॉलेज के हिंदुस्तानी विभाग में पहली बार हिन्दी में अच्छे अनुवाद किये गए, जिससे हिन्दी गद्य का स्वरूप बनने लगा। इसके बाद हिंदी के प्रेमियों में अपने देश के लिए एक उच्च कोटि की भावना जगी।
इंटरनेट युग में हिन्दी
हिंदी भाषा की जितनी मांग है, इंटरनेट पर उतनी उपलब्धता नहीं है, लेकिन जिस रफ़्तार से भारत में इंटरनेट का विकास हुआ है, उसी तरह से हिंदी भी इंटरनेट पर छा रही है। समाचारपत्र से लेकर हिंदी ब्लॉग तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। साधुवाद तो गूगल को भी जाता है जिसने हिंदी में खोज करने की जगह उपलब्ध कराई। इतना ही नहीं विकिपीडिया ने भी हिंदी की महत्ता को समझते हुए कई सारी सामग्री का सॉफ्टवेयर अनुवाद हिंदी में प्रदान करना शुरू कर दिया, जिससे हिंदी भाषी को किसी भी विषय की जानकरी सुलभ हुई। आजकल हिंदी भी इंटरनेट की एक अहम् लोकप्रिय भाषा बन कर उभरी है।
हिंदी का करे ज्यादा उपयोग
ऐसा मानना है जब लोग अपने विचार और लेखन हिंदी भाषा में इंटरनेट पर ज्यादा करेंगे तो वह दिन दूर नहीं की सारी सामग्री हिंदी में भी इंटरनेट पर मिलने लगेगी। इंटरनेट के युग में साहित्य की नई विधा ब्लॉग का अभ्युदय हुआ जिसके द्वारा काव्य एवं गद्य लेखन का प्रचलन बढ़ रहा हैं। 1921 से जो काव्यपाठ जनता के बीच मंच पर होना शुरू हुआ था अब काव्य यूट्यूब के माध्यम से जनता के बीच प्रचलित हो रहा है।
14 सिंतबर को हिंदी के लिए ऐसा है कनेक्शन
14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को देश की आधिकारिक राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को याद रखने और हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए साल 1953 से हर साल इस तारीख को राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
राजभाषा का दर्जा
संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को संघ की राजभाषा बनाया गया था। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंद दास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किये।




