Episode 37: कृषि आश्रित समाज के विलुप्त प्रायः लौह उपकरण

Babulal Dahiya

द्म श्री बाबूलाल दाहिया जी के संग्रहालय में संग्रहीत उपकरणों एवं बर्तनों की जानकारी की श्रृंखला में हम आज आपके लिए लेकर आए हैं,कल हमने निहान बसूला आरी आदि लौह उपकरणों की जानकारी दी थी आज उसी क्रम में अन्य लौह उपकरणों की जानकारी प्रस्तुत है।

पलउहा हँसिया


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दरअसल यह हँसिया खेत की कटीली झाड़ी काटने का एक लौह उपकरण है। यही कारण है कि इसका हँसिया अधिक मोटा और बड़ा तथा उसमें लगने वाला बेट भी लगभग डेढ़ हाथ लम्बा होता है। इससे दूर से ही हँसिए में फँसाकर कटीली झाड़ियों को काटा जा सकता है।
पलउहा हँसिया इसका नाम इसलिए पड़ा कि प्राचीन समय में जब भैंस को इस तरह चुनी चोकर खिलाकर दूध निकालने का ब्यावसायिक रूप गांव में नही आया था तब लोग पूस माघ में अधिक दूध प्राप्त करने के लिए झरबेरी की झाड़ियों को इसी हँसिए से काट कर एकत्र करते थे। फिर उन्हें लाठी से कूट उसकी पत्तियां भैंसों को खिलाते। उस पत्ती और समूची क्रिया को ” पाला कूट कर खिलाना ” कहा जाता था अस्तु उसमें उपयोगी उस हँसिये को भी पलउहा हँसिया कहा गया है। पर अब यह पूर्णतः चलन से बाहर है।

  आरा
    
यह लगभग 5-6 फीट लम्बा 9 इंच चौड़ा पतला दाँतेदार एक लोह उपकरण है जो किसानों के खेत में आँधी से गिरे य सूख गए पेड़ों के काटने चीरने आदि में उपयोगी था। इसमें दोनों ओर लकड़ी के बेंट लगते थे। और दो लोग इधर उधर पकड़कर चलाते थे। इसका उपयोग काष्ठ शिल्पी भी अपने काम में करते थे। किन्तु बैटरी चलित आरी आ जाने से यह अब धीरे- धीरे पुरावशेष बनता जा रहा है.

लौह अखैन

यूं तो किसानों के काम में एक लकड़ी की कुरैली य अखैनी प्राचीन समय से ही प्रचलित थी। परन्तु बाद में पचास के दशक से एक लोहे की अखैनी भी प्रचलन में आ गई थी। उसका बेंट तो लकड़ी का ही होता था पर उसमें ऊपर लौह की अखैनी लगादी जाती थी। अब यह चलन से बाहर है।

हँसिया


यह टेढ़े आकार का एक लौह उपकरण होता है जिससे धान गेहूं आदि की कटाई की जाती हैं। यदि खेत में अधिक खरपतवार हुआ तो जुताई के बाद वह भी इसी से निकाला जाता है। परन्तु इस बहु उद्देशीय औजार से सब्जी की कटाई भी हो सकती है। पर इसमें लगभग 9 इंच का बाँस अथवा किसी अन्य लकड़ी का बेंट लगना आवश्यक है।

आज के लिए बस इतना ही कल फिर मिलेंगे इस श्रृंखला की अगली कड़ी में

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