रीवा: रीवा जिले की गुढ़ तहसील स्थित ग्राम बेला में पिछले कुछ दिनों से जारी किसान का अनोखा ‘जल सत्याग्रह’ शनिवार देर रात समाप्त हो गया। अपनी कृषि भूमि पर बिना उचित मुआवजे के हाईटेंशन टावर लगाए जाने के विरोध में किसान देशराज मिश्रा पानी से भरे गड्ढे में बैठकर अनशन कर रहे थे। प्रशासन के ठोस आश्वासन के बाद किसान ने अपना अनशन खत्म किया।
क्या है पूरा मामला और किसान का आरोप?
किसान देशराज मिश्रा का आरोप है कि उनकी निजी कृषि भूमि पर अडानी कंपनी द्वारा हाईटेंशन बिजली के तार और टावर बिछाए जा रहे हैं। किसान का मुख्य विवाद जमीन के मुआवजे को लेकर है। उनका कहना है कि कंपनी द्वारा काम तो शुरू कर दिया गया, लेकिन जमीन का उचित मुआवजा अभी तक तय नहीं किया गया है। जब उन्होंने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई, तो उनकी सुनवाई नहीं हुई, जिसके चलते मजबूरन उन्हें विरोध का यह कड़ा रास्ता चुनना पड़ा और वे पानी में आधा डूबकर सत्याग्रह पर बैठ गए।
रात 11 बजे अनशन स्थल पर पहुँचे प्रशासनिक अधिकारी
मामले ने तूल तब पकड़ा जब किसान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी शनिवार रात करीब 11 बजे गुढ़ एसडीएम, तहसीलदार और थाना प्रभारी के साथ सीधे अनशन स्थल पर पहुँचे। अधिकारियों ने मौके पर पहुँचकर किसान से उनकी समस्या सुनी और भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों की जाँच की जाएगी और जो भी नियमानुसार उचित होगा, उस पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन के इस आश्वासन के बाद अनशन समाप्त कर दिया गया। इसके तुरंत बाद, पुलिस और प्रशासनिक टीम ने एहतियातन किसान को मेडिकल परीक्षण के लिए अस्पताल पहुँचाया, जहाँ डॉक्टरों ने उनके स्वास्थ्य की जाँच की।
राजनीतिक हस्तक्षेप: जीतू पटवारी ने फोन पर की बात
इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। किसान के अनशन की जानकारी मिलने पर मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने देशराज मिश्रा से फोन पर सीधे बात की। पटवारी ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए सरकार और उद्योगपति के मिलीभगत का आरोप लगाया और किसान के साथ पूर्ण समर्थन की बात कही। कांग्रेस ने सरकार से माँग की है कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए किसान की शिकायतों को सुना जाए और मुआवजे का पारदर्शी निर्धारण सुनिश्चित किया जाए।
प्रशासन की अगली रणनीति पर टिकीं नजरें
फिलहाल, 48 घंटे बाद अनशन समाप्त होने से क्षेत्र में चल रहा गतिरोध तो खत्म हो गया है, लेकिन किसान और कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोपों पर अडानी कंपनी और प्रशासन का आधिकारिक पक्ष आना अभी शेष है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन अपनी जाँच में किसान की माँगों को किस प्रकार हल करता है।




