Crowd of devotees in the court of Maa Kotamhin in Sidhi: सीधी जिले के कुसमी वनांचल में स्थित संजय टाइगर रिजर्व के बीच कोटमा पहाड़ पर विराजमान मां कोटमहिन का दरबार इन दिनों चैत्र नवरात्र के अवसर पर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। दुर्गम पहाड़ी रास्तों और घने जंगलों के बावजूद नवमी के मौके पर हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। कठिन सफर के बावजूद भक्तों का उत्साह उनकी अटूट आस्था को दर्शाता है।
मां कोटमहिन से जुड़ी एक अनोखी परंपरा ‘बीमारी विदाई’ इन दिनों विशेष चर्चा का विषय बनी हुई है। स्थानीय आदिवासी मान्यताओं के अनुसार, जब गांव में कोई बीमारी फैलती है, तो विशेष पूजा-अर्चना के बाद मुर्गी या बकरे के माध्यम से उस बीमारी को एक गांव से दूसरे गांव स्थानांतरित किया जाता है और अंततः उसे जंगल की ओर विदा कर दिया जाता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस परंपरा के पालन से बीमारी गांव से समाप्त हो जाती है।
बताया जाता है कि पहले माता की प्रतिमा गुफा के भीतर स्थापित थी, लेकिन लगभग 30 वर्ष पहले गुफा के अंदर भारी पत्थर गिरने से मार्ग बंद हो गया। इसके बाद से श्रद्धालु गुफा के द्वार से ही पूजा-अर्चना कर दर्शन करते हैं।
मां कोटमहिन को क्षेत्र के करीब 15-16 गांवों की कुलदेवी माना जाता है। नवरात्रि के दौरान हर घर में माता की स्थापना कर नौ दिनों तक विधि-विधान से पूजा की जाती है। यह परंपरा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखे हुए है।
