CM Rekha Gupta On Women Reservation Bill : दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मंगलवार को विधानसभा में महिला आरक्षण के मुद्दे पर बात की। दिल्ली विधानसभा ने लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल पास न कर पाने के लिए विपक्षी पार्टियों की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव भी पास किया। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने लोकसभा में संविधान संशोधन बिल पास न हो पाने को भारतीय लोकतंत्र का “काला अध्याय” बताया। अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कई ज़रूरी बातें कहीं। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टियां इस बिल को पास न होने देने पर अड़ी हुई हैं।
पुरुषों और महिलाओं के हालात बहुत अलग होते हैं।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा, “महिलाओं के लिए रिजर्वेशन की ज़रूरत क्यों पड़ी? यह एक बहुत बड़ा सवाल है जो हमारे समाज में बार-बार उठता है। हमारे देश में महिलाओं और पुरुषों के हालात बहुत अलग हैं। जब कोई महिला समाज की उम्मीदों को लेकर चलती है, तो वह पुरुषों की तरह तेज़ी से आगे नहीं बढ़ पाती। अगर वह घर से बाहर निकलती है, तो उसे सैकड़ों सवालों के जवाब देने पड़ते हैं। ऐसे में जब संविधान हमें ज़मीन देता है, पार्टी हमें मौका देती है, और जनता अपना आशीर्वाद देती है, तभी कोई इंसान पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव बनता है। तभी कोई इंसान पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव बनता है। पार्टी ने हमें संगठन में मौका दिया। संविधान ने हमें कॉर्पोरेशन में रिजर्वेशन की ज़मीन दी, और जनता ने हमें आशीर्वाद दिया। तब, दिल्ली के एक साधारण परिवार से मुझ जैसी बेटी ने पब्लिक सर्विस की इस दहलीज़ पर कदम रखा। इसमें हमें हमारे नेतृत्व और प्रधानमंत्री का बहुत आशीर्वाद मिला।”
सिर्फ़ 10% महिलाएं ही असेंबली पहुंचती हैं।
CM रेखा गुप्ता ने कहा, “पूरे देश में लगभग 1.5 मिलियन महिलाएं हैं जो पंचायत और म्युनिसिपल लेवल पर चुनी जाती हैं। लेकिन जब वे लेजिस्लेटिव असेंबली पहुंचती हैं, तो मैं आपको बताना चाहूंगी कि पूरे देश में 4,600 महिला सदस्य हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ़ 10% ही लेजिस्लेटिव असेंबली पहुंचती हैं। इसी तरह, जब वे लोकसभा पहुंचती हैं, तो यह संख्या कम रहती है। अभी की लोकसभा में 13 से 14% महिलाएं हैं, और राज्यसभा में भी इतनी ही महिलाएं हैं। जब संविधान बनाया गया था, तो कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली में 15 महिला सदस्य थीं। जब संविधान लिखा गया, तो उसने कई बराबरी के अधिकार दिए: वोट देने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार। उन्हें लगा कि सिर्फ़ इसी से आज़ाद भारत में महिलाएं आगे बढ़ पाएंगी, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि आज़ाद भारत की ये पॉलिटिकल पार्टियां महिलाओं को कभी आगे नहीं आने देंगी। वे उन्हें कभी आगे नहीं आने देंगी। सिर्फ़ बराबरी का अधिकार ही काफ़ी नहीं था। महिलाएं आज भी मौकों से दूर रहने की सच्चाई का सामना कर रही हैं।”




