भदोही का नाम अब संत रविदास नगर! सीएम योगी ने ऐसा क्यों किया?

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजनीति में एक बार फिर जिले के नाम को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने घोषणा की है कि भदोही (Bhadohi) जिले का नाम बदलकर फिर से संत रविदास नगर (Sant Ravidas Nagar) किया जाएगा। यह फैसला संत गुरु रविदास (Sant Guru Ravidas) की 650वीं जयंती के अवसर पर लागू किया जाएगा।

योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी (Varanasi) में आयोजित ‘समरसता संकल्प अभियान’ के दौरान इसकी घोषणा करते हुए समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार ने संत रविदास (Sant Ravidas) के नाम पर बने जिले का नाम बदलकर गलती की थी, जिसे अब उनकी सरकार सुधार रही है।

तीसरी बार बदलेगा जिले का नाम

भदोही (Bhadohi) जिले का नाम पिछले तीन दशकों में कई बार बदला जा चुका है।

  • 30 जून 1994 को मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) सरकार ने वाराणसी (Varanasi) से अलग कर भदोही (Bhadohi) जिले का गठन किया।
  • 4 दिसंबर 1997 को मायावती (Mayawati) सरकार ने इसका नाम बदलकर संत रविदास नगर (Sant Ravidas Nagar) कर दिया।
  • 6 दिसंबर 2014 को अखिलेश यादव सरकार ने फिर से इसका नाम भदोही (Bhadohi) कर दिया।
  • अब योगी आदित्यनाथ सरकार एक बार फिर इसे संत रविदास नगर (Sant Ravidas Nagar) बनाने जा रही है। यानी करीब 32 वर्षों में यह तीसरी बार होगा जब जिले का नाम बदला जाएगा।

योगी ने सपा पर साधा निशाना

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि समाजवादी पार्टी ने संत रविदास के नाम को हटाकर सामाजिक सम्मान को ठेस पहुंचाई थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने डॉ. भीमराव आंबेडकर (B. R. Ambedkar) के नाम पर बने संस्थानों के नाम भी बदले थे, जिन्हें उनकी सरकार ने दोबारा बहाल किया।

क्यों अहम है संत रविदास नगर

संत रविदास दलित समाज के सबसे सम्मानित संतों में गिने जाते हैं। उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में रविदास समाज की बड़ी आबादी है। ऐसे में जिले का नाम उनके नाम पर होना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।

दलित वोट बैंक पर बीजेपी की नजर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) में भारतीय जनता पार्टी को अनुसूचित जाति वर्ग की कई सीटों पर अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टीने दलित वोटों में अच्छी पैठ बनाई थी।

उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत मानी जाती है। राज्य की 403 विधानसभा सीटों में 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, इसलिए यह वर्ग चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है।

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