उर्दू अदब और शायरी की दुनिया का एक बड़ा चराग हमेशा के लिए बुझ गया है। देश के मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन भोपाल में गुरुवार को हो गया, वह 91 वर्ष के थे। उनके जाने से साहित्य जगत में एक गहरा शून्य पैदा हो गया है। बशीर बद्र केवल मुशायरों के मंच तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनकी शायरी ने राजनीति के गलियारों और भारत-पाकिस्तान की सरहदों को भी कई बार छुआ। आम इंसान के सुख-दुख को बेहद सादगी से बयां करने वाले बशीर साहब की गजलें हमेशा अमर रहेंगी।
उर्दू अदब का एक सुनहरा अध्याय समाप्त
बशीर बद्र का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि यह उर्दू शायरी के एक शानदार दौर का अंत है। उन्होंने शायरी को भारी-भरकम शब्दों से बाहर निकाला और उसे आम बोलचाल की भाषा दी। यही वजह थी कि उनका लिखा हर एक शेर सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाता था। भोपाल के एक निजी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली, जहां उनका इलाज चल रहा था। पिछले कुछ समय से वे बढ़ती उम्र की बीमारियों और विस्मृति (डिमेंशिया) से जूझ रहे थे।
दंगों की आग से निकला बशीर बद्र का दर्द
बशीर बद्र का जीवन केवल वाह-वाही और तालियों तक सीमित नहीं था, उन्होंने जीवन के सबसे क्रूर दौर को भी करीब से देखा था। साल 1989 में मेरठ के सांप्रदायिक दंगों में उनका घर पूरी तरह जलकर खाक हो गया था। उस घर के साथ उनकी उम्र भर की कमाई, डिग्रियां और अनमोल पांडुलिपियां भी जल गईं। इस हादसे ने उन्हें अंदर तक हिला दिया था, जिसके बाद उन्होंने मेरठ छोड़ दिया और भोपाल आकर बस गए।
“मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।” — यह शेर उनके जीवन के इसी भटकाव और दर्शन को बखूबी दर्शाता है।
जब संसद में गूंजा बशीर साहब का शेर
बशीर बद्र की लेखनी की ताकत ऐसी थी कि देश के बड़े से बड़े राजनेता उनकी शायरी के मुरीद थे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने भाषणों के दौरान बशीर बद्र के शेरों का कई बार इस्तेमाल किया। राजनीति की तीखी बहसबाजी के बीच जब भी माहौल को थोड़ा गंभीर या संवेदनशील बनाना होता, राजनेता अक्सर बशीर साहब के कलाम का सहारा लेते थे। उनकी रचनाएं किसी एक दल या विचारधारा की बंधक नहीं थीं, बल्कि वे हर वर्ग को जोड़ती थीं।
भारत-पाकिस्तान सीमा के पार भी रही दीवानगी
उनकी शायरी का जादू सिर्फ हिंदुस्तान तक सीमित नहीं था, बल्कि सरहद पार पाकिस्तान में भी उनके चाहने वालों की तादाद लाखों में थी। पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो भी उनकी गजलों की बड़ी प्रशंसक थीं। उन्होंने भी अंतरराष्ट्रीय मंचों और राजनीतिक बैठकों में बशीर बद्र के शेरों को उद्धृत किया था। यह इस बात का प्रमाण है कि बशीर साहब की शायरी ने हमेशा दोनों देशों के बीच नफरत की दीवारों को गिराकर मोहब्बत के पुल बनाने का काम किया।
‘दुश्मनी जमकर करो’ और बशीर बद्र का निधन
बशीर बद्र के कई ऐसे शेर हैं जो लोगों की जुबान पर हर वक्त रहते हैं, लेकिन उनका एक शेर कालजयी बन चुका है। बशीर बद्र का निधन भले ही हो गया हो, पर उनका यह शेर हमेशा जिंदा रहेगा:
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”
यह दो पंक्तियां आज के दौर की राजनीति और समाज के लिए सबसे बड़ा सबक हैं। यह शेर सिखाता है कि मतभेदों के बीच भी इंसानियत और मर्यादा की गुंजाइश हमेशा बची रहनी चाहिए।
सादगी और मोहब्बत के कवि का सफर
15 फरवरी 1935 को जन्मे बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की थी। उन्होंने वहां से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और बाद में कॉलेज में पढ़ाया भी। उन्हें पद्मश्री और साहित्य अकादमी जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया था। उनकी गजलों में जो अकेलापन, दर्द और मोहब्बत दिखती है, वह उनके अपने जीवन के अनुभवों से उपजी थी। उन्होंने उर्दू को एक नया मिजाज दिया, जो हमेशा जिंदा रहेगा।
FAQs
प्रश्न 1: बशीर बद्र का निधन कब और कहां हुआ?
उत्तर: मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन 91 वर्ष की आयु में, गुरुवार को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के एक निजी अस्पताल में हुआ। वे पिछले कुछ समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे।
प्रश्न 2: बशीर बद्र का कौन सा शेर सबसे ज्यादा लोकप्रिय है जिसे राजनीतिक गलियारों में कोट किया जाता है?
उत्तर: उनका यह शेर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और संसद में सबसे ज्यादा पढ़ा गया है:
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”
प्रश्न 3: किन बड़े राजनेताओं ने बशीर बद्र की शायरी को अपने भाषणों में शामिल किया?
उत्तर: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो तक, दोनों देशों के कई शीर्ष नेता अलग-अलग महत्वपूर्ण मंचों और संसदीय बहसों के दौरान उनके शेरों का उद्धरण दे चुके हैं।
प्रश्न 4: बशीर बद्र को किन प्रमुख सम्मानों से नवाजा गया था?
उत्तर: उर्दू अदब और साहित्य में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित ‘पद्मश्री’ पुरस्कार और ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।
प्रश्न 5: बशीर बद्र मेरठ छोड़कर भोपाल क्यों बस गए थे?
उत्तर: साल 1989 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान बशीर बद्र का घर पूरी तरह जल गया था, जिसमें उनकी जीवनभर की कमाई और अनमोल पांडुलिपियां नष्ट हो गई थीं। इस हादसे के बाद उन्होंने मेरठ छोड़ दिया और स्थायी रूप से भोपाल आ गए।
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