Bagheli Lok Katha Hindi Mein: विंध्यक्षेत्र और बघेलखंड में ऐतिहासिक लोककथाओं की एक समृद्ध परंपरा रही है। ये कहानियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों द्वारा सुनी और सुनाई जाती रही हैं। इन कहानियों में सच और कल्पना का अद्भुत संगम होता है, यानी आधा हकीकत और आधा फ़साना। फिर भी लोगों के मन में इनका स्थान किसी प्रामाणिक इतिहास से कम नहीं होता और कई बार इन्हें ही सत्य मान लिया जाता है।
बघेलखंड में प्रचलित लोककथा | Bagheli Lok Katha
कथा के अनुसार एक राजा राज्य किया करता था, जो बेहद विलासी प्रवृत्ति का का था। उसने अपने यहाँ एक नियम बना रखा था, जिस किसी घर में शादी होती, उस घर की नववधू की डोली पहली रात के लिए गढ़ी में रुकवाई जाती थी उसके बाद ही वह गंतव्य को जाती थी। पर राजा के भय से कोई बोल नहीं पाता था। एक बार निकट गाँव के एक नाई की शादी हुई और नियमानुसार उसकी पत्नी को पहले राजा की गढ़ी में जाना था, लेकिन नाई ने तरकीब निकाली और योजना बनाकर अपनी पत्नी की जगह स्वयं स्त्री का वेश धारण कर डोली में बैठकर गढ़ी चला गया। कहते हैं नियमानुसार जैसे ही राजा उसके पास आया, मौका देखकर स्त्री के वेश में बैठे नाई ने अपने कपड़ों में छुपाई कटार निकाल ली और राजा के सीने में भोंक दी, इस तरह राजा की मृत्यु हो गई। इस कहानी का एक दूसरा रूप भी लोक में प्रचलित है जिसके अनुसार राजा के इस कृत्य से दुखी एक माली ने बदला लेने की ठानी और उसने राजा के लिए फूलों की एक सुगंधित माला भेजी, जिसके भीतर चुपके से एक विषैला सांप छिपा दिया था। जैसे ही राजा ने माला अपने गले में डाली, सांप ने उसे डस लिया और राजा मार गया। लोककथाओं में यह कहानी मुख्यतः क्योटी की बताई जाती है, लेकिन इसके कई संस्करण ऐसे भी मिलते हैं जिनमें इसे अलग-अलग स्थानों और क्षेत्रों से जोड़कर भी सुना और सुनाया जाता है। जब हमने इस कहानी की पड़ताल की, तो इसके क्योटी से जुड़े होने के संकेत अवश्य मिलते हैं, लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक शोध और प्रमाण इसे पूरी तरह प्रामाणिक इतिहास के रूप में स्थापित नहीं करते। फिर भी जो जानकारियाँ सामने आईं, वे इस लोककथा के पीछे छिपे इतिहास को बहुत हद तक सत्य सिद्ध जरूर करते हैं।
क्योटी का इतिहास | History of Keoti
पंद्रहवीं शताब्दी में गहोरा के बघेला शासक वीरसिंह देव ने अपने छोटे भाई नागमल देव को क्योंटी का इलाका जागीर के रूप में प्रदान किया। नागमल देव ने महाना नदी के तट पर, भव्य जलप्रपात के ठीक ऊपर एक सुदृढ़ गढ़ी का निर्माण करवाया और वहीं निवास करने लगे। हालांकि कुछ ऐतिहासिक स्त्रोतों के अनुसार क्योटी गढ़ी के प्रारंभिक निर्माण की नींव संभवतः चौदहवीं शताब्दी में चंदेल नरेश हम्मीरवर्मन के समय रखी गई थी। समय बीतता गया और नागमल देव की आठवीं पीढ़ी में क्योंटी के ठाकुर लक्ष्मण सिंह हुए। जनश्रुतियों में उनका व्यक्तित्व अत्याचारी और क्रूर शासक के रूप में वर्णित है। कहा जाता है कि उनके शासनकाल में एक अमानवीय प्रथा इलाके में प्रचलित थी, क्षेत्र में किसी भी घर में विवाह होने पर दुल्हन का डोला गढ़ी में रुकवाया जाता था और एक रात के बाद ही उसे वापस भेजा जाता था। इसकि स्मृति की याद आज भी क्योटी जलप्रपात के ऊपर उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित दो गाँव दुलहरा और बलहरा के रूप में जीवंत है। कहा जाता है जहाँ दूल्हे को रोका जाता था वह स्थान दुलहरा और जहाँ बारात ठहरती थी वह स्थान बलहरा कहलाया।
क्योटी की प्रचलित लोककथा
इसी प्रथा से जुड़ी एक कथा लोक में अत्यंत प्रसिद्ध है। बताया जाता है एक बार गंगाराम नामक व्यक्ति अपनी नवविवाहिता बहू को विदा कराकर उसी मार्ग से गुजर रहा था। ठाकुर के सिपाहियों ने उन्हें पकड़ा और ठाकुर के समक्ष गढ़ी में ले गए। गंगाराम और उसकी बहू ने विरोध किया, परंतु सैनिकों के सामने उनकी एक न चली। अपने अपमान और अनिष्ट की आशंका से व्याकुल होकर बहू ने आत्मरक्षा में स्वयं को कटार मार ली और वहीं प्राण त्याग दिए। अपनी बहू की मृत्यु से क्रोधित गंगाराम ने गढ़ी और शासक वंश के विनाश का श्राप देते हुए स्वयं भी कटार भोंककर प्राण त्याग दिए।
लोकमान्यता है कि इसके बाद क्योंटी गढ़ी पर विपत्तियों का सिलसिला शुरू हो गया। ठाकुर के बच्चे एक-एक कर असामान्य रोगों से मरने लगे। शोक और भय से व्याकुल ठाकुर लक्ष्मण सिंह मानसिक संतुलन खो बैठे और अंततः जलप्रपात में कूदकर उन्होंने भी जीवन समाप्त कर लिया। माना गया कि यह गंगाराम के श्राप के कारण हुआ है और उनकी आत्मा गढ़ी में रहती है। जिसके बाद भय के कारण धीरे-धीरे लोग गढ़ी छोड़ने लगे। कहा जाता है कि गंगाराम की आत्मा के प्रकोप को शांत करने के लिए ही उन्हें देवता के रूप में मान्यता दी गई और भैरव बाबा मंदिर के पास उनका चबूतरा बनवाया गया।
राजा के परिजनों ने विनाश के डर से छोड़ी गढ़ी
राजा के कोई जीवित वंशज शेष नहीं बचे। वंश विनाश के भय से उनके भाई-बंधुओं ने गढ़ी छोड़कर पास के मसीद टोला में बसना उचित समझा, जहाँ उनके वंशज आज भी आबाद हैं। इसके अलावा खैर-मझियार और लालगाँव के बघेल ठाकुर भी इसी क्योटी से संबंध रखते हैं। खैर समय के साथ यह गढ़ी रीवा महाराज के अधिकार में आ गई, क्योंकि इतिहास की कई किताबों में जिक्र मिलता है ठाकुर लक्ष्मण सिंह की विधवा ठकुराइन ने सन् 1811 में रीवा के युवराज बाबू साहब विश्वनाथ सिंह को अपना पुत्र मानकर गोद ले लिया और अपनी गढ़ी व जागीर उन्हें सौंपकर तीर्थयात्रा पर चली गईं। बाद में रीवा नरेशों ने इस गढ़ी और क्षेत्र को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। कुछ ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि तत्कालीन रीवा नरेश अजीत सिंह ने ठाकुर को देश निकाला दे दिया था।
इतिहास नहीं जनश्रुति
इस कहानी का उल्लेख इतिहास की किताबों में बहुत कम मिलता है, और जहाँ कहीं इसका जिक्र मिलता भी है, वहाँ इसे प्रमाणित इतिहास नहीं बल्कि जनश्रुति के रूप में ही स्वीकार किया गया है। “डोला” जैसी अमानवीय प्रथा का उल्लेख भोजपुरी और पूर्वांचल के कुछ क्षेत्रों की लोककथाओं में भी मिलता है, इसलिए सम्भव है कि समय के साथ ऐसी कथाएँ इस क्षेत्र में भी गढ़ ली गईं और प्रचलित हो गईं। हालांकि क्योटी के इलाकेदार का रीवा राज्य से बागी होना और स्वभाव से क्रूर बताया जाना इस लोककथा को कुछ हद तक विश्वसनीय बनाता तो है, परन्तु इसे पूरी तरह ऐतिहासिक सत्य मानना संभव नहीं है। क्योंकि ऐतिहासिक लोककथाओं में आधा हकीकत और आधा फ़साना होता है। और इसी बीच में कहीं इस कहानी की सच्चाई भी छिपी हो सकती है।




