आनंदीबाई बनी थी भारत की पहली महिला डॉक्टर, रूढ़िवादी बेढ़ियों को तोड़कर विदेश में की थी पढ़ाई

विशेष। मेडिकल चिकित्सा आज बड़ा मुकाम हासिल कर रहा है और इसमें महिला डॉक्टरों की भूमिका काफी अंहम है, लेकिन क्या आप जानते है कि भारत की पहली महिला डॉक्टर कौन थी। 19वीं सदी के रूढ़िवादी दौर में डॉ. आनंदीबाई गोपालराव जोशी ने इस बेढ़ी को तोड़ते हुए 31 मार्च 1865 से 26 फरवरी 1887 के बीच पश्चिमी चिकित्सा में डिग्री प्राप्त करने वाली भारत की पहली महिला चिकित्सक थीं। उन्होंने कई सामाजिक बाधाओं को पार कर अमेरिका के वुमेन्स मेडिकल कॉलेज ऑफ पेंसिलवेनिया से एम.डी. की उपाधि हासिल की थी।

बेटे की बीमारी से मौत ने आनंदी को झकझोर दिया

आनंदीबाई जोशी का जन्म पुणे शहर में हुआ था। उनका विवाह नौ साल की अल्‍पायु में उनसे करीब 20 साल बड़े गोपालराव से हो गया था। जब 14 साल की उम्र में वे माँ बनीं और उनकी एकमात्र संतान की मृत्‍यु 10 दिनों में ही गई तो उन्‍हें बहुत बड़ा आघात लगा। अपनी संतान को खो देने के बाद उन्‍होंने यह प्रण किया कि वह एक दिन डॉक्‍टर बनेंगी और ऐसी असमय मौत को रोकने का प्रयास करेंगी। उनके पति गोपालराव ने भी उनको भरपूर सहयोग दिया और उनकी हौसला अफजाई की।

महिलाओं के लिए प्रेरणास्‍त्रोत

आनंदीबाई जोशी का व्‍यक्तित्‍व महिलाओं के लिए प्रेरणास्‍त्रोत है। उन्‍होंने सन् 1886 में अपने सपने को साकार रूप दिया। जब उन्‍होंने यह निर्णय लिया था, उनकी समाज में काफी आलोचना हुई थी कि एक शादीशुदा हिंदू स्‍त्री विदेश (पेनिसिल्‍वेनिया) जाकर डॉक्‍टरी की पढ़ाई करे। लेकिन आनंदीबाई एक दृढ़निश्‍चयी महिला थीं और उन्‍होंने आलोचनाओं की तनिक भी परवाह नहीं की। यही वजह है कि उन्‍हें पहली भारतीय महिला डॉक्‍टर होने का गौरव प्राप्‍त हुआ। डिग्री पूरी करने के बाद जब आनंदीबाई भारत वापस लौटीं तो उनका स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ने लगा और बाईस वर्ष की अल्‍पायु में ही उनकी मृत्‍यु हो गई। यह सच है कि आनंदीबाई ने जिस उद्देश्‍य से डॉक्‍टरी की डिग्री ली थी, उसमें वे पूरी तरह सफल नहीं हो पाईं, परन्तु उन्‍होंने समाज में वह स्थान प्राप्त किया, जो आज भी एक मिसाल है और महिलाओं के लिए बेहतर अप्सन दी।

प्ररेणा का कारण

9 वर्ष की उम्र में उनका विवाह उनसे काफी बड़े गोपालराव जोशी से हुआ था। 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन उचित चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में केवल 10 दिन में ही उसकी मृत्यु हो गई। इस दुखद घटना ने उन्हें महिलाओं के लिए डॉक्टर बनने का दृढ़ संकल्प दिलाया। उस समय भारत में महिलाओं के लिए चिकित्सा शिक्षा के अवसर नगण्य थे। इसके बावजूद, उनके पति ने उनका पूरा सहयोग दिया और आनंदीबाई ने विदेश जाकर पढ़ाई करने का साहसिक कदम उठाया। 1886 में, 21 वर्ष की आयु में, उन्होंने आर्य हिंदुओं में प्रसूति विज्ञान विषय पर शोध कर एम.डी. की डिग्री पूरी की। स्नातक होने पर तत्कालीन ब्रिटिश महारानी क्वीन विक्टोरिया ने भी उन्हें बधाई दी थी। भारत लौटने के बाद, कोल्हापुर के अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल में उन्हें महिला वार्ड का प्रभार सौंपा गया, लेकिन टीबी (तपेदिक) से पीड़ित होने के कारण 26 फरवरी 1887 को मात्र 22 वर्ष की आयु में उनका दुखद निधन हो गया।

100 रूपए मिलती थी सैलरी

डॉक्टर बनने के बाद जब आनंदीबाई भारत लौटीं, तब उन्हें कोल्हापुर के एक अस्पताल में महिला वार्ड की जिम्मेदारी दी गई। उस समय उनकी तनख्वाह लगभग 100 रुपये प्रतिमाह के आसपास बताई जाती है। आज के समय में यह रकम भले कम लगे, लेकिन उस दौर में यह एक सम्मानजनक वेतन था।

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