विश्व चाय दिवसः भारत में कैस शुरू हुई चाय की चुस्की, आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश

विश्व चाय दिवस। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है। हम भारतीय अपने दिन की शुरुआत अपनी पसंदीदा चाय की चुस्की लिए बिना सोच भी नहीं सकते, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि चाय भारत में कैसे आई? यह कब लोकप्रिय हुई?

19वी सदी में चाय की हुई शुरूआत

भारत में चाय की शुरुआत 19वीं सदी में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुई, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने चीन पर चाय के एकाधिकार को तोड़ने के लिए असम में चाय के पौधे लगाने शुरू किए। 1830 के दशक में, रोबर्ट ब्रूस ने असम में जंगली चाय के पौधे खोजे, और 1840 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ। 1841 में, डॉ. आर्थर कैंपबेल ने दार्जिलिंग में चाय की खेती की शुरुआत की थी। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है।

चीन से शुरू हुई थी चाय की शुरूआत

जो इतिहास बताते है उसके तहत 2737 ईसा पूर्व चाय का इतिहास चीनी सम्राट शेन नोंग से शुरू होता है, जिन्होंने लगभग 2737 ईसा पूर्व में गलती से चाय का आविष्कार किया था। विभिन्न स्रोतों से मिली कहानियों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि पास में उगने वाले कैमेलिया साइनेंसिस के पत्ते गलती से खुली आग पर रखे उबलते पानी के बर्तन में गिर गए। जिससे चाय की शुरूआत हुई और चाय ने दुनिया भर में अपनी मजबूत पकड़ बना लिया।

असम की जनजाति सदियों से पी रही थी चाय

असम की सिंफो जनजाति सदियों से जंगली चाय की पत्तियों का उपयोग कर रही है और यह भारत में चाय पीने की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक है। वे न केवल चाय पीते थे, बल्कि इसका उपयोग औषधीय रूप से भी करते थे। इस पारंपरिक चाय को श्फलापश् कहा जाता है। वे जंगली चाय के पेड़ों से पत्तियां तोड़ते थे, उन्हें सुखाते थे और फिर बांस की नली में पैक करके चूल्हे के ऊपर धुएं में सुखाते थे। यह एक गहरे रंग की, स्मोकी (धुएँदार) स्वाद वाली चाय होती है, जिसे अक्सर बिना दूध-चीनी के पिया जाता है। सिंगफो जनजाति 12वीं शताब्दी से ही चाय का सेवन कर रही है, जो अंग्रेजों के असम में चाय उद्योग शुरू करने से बहुत पहले की बात है। 1820 के दशक में, जब ब्रिटिश अधिकारी रॉबर्ट ब्रूस असम आए थे, तब सिंगफो समुदाय के नेताओं ने ही उन्हें जंगली चाय के पौधों के बारे में बताया था। इस जनजाति ने न केवल चाय की खोज की, बल्कि इसे एक अनोखे तरीके से संरक्षित और तैयार करने की कला भी विकसित की, जिसे आज भी जीवित रखा जा रहा है।

व्यावसायिक शुरुआत- 1837 में, अंग्रेजों ने असम के चबुआ में अपना पहला टी गार्डन शुरू किया।
लोकप्रियता- 1920 के दशक तक, चाय सिर्फ अंग्रेजों और उच्च वर्ग तक सीमित थी, लेकिन बाद में चाय बोर्ड ने ष्चाय-वालाष् और विज्ञापनों के जरिए इसे आम भारतीयों तक पहुंचाया।
भारतीय अंदाज- भारतीयों ने चाय को दूध, चीनी और अदरक-मसालों के साथ मिलाकर अपने स्वाद के अनुसार बदल दिया, जिससे यह संस्कृति का अहम हिस्सा बन गई।

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