संसद में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने भारतीय रुपये की सेहत को लेकर कई महत्वपूर्ण खुलासे किए हैं। साल 2025 में एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने के बाद, अब रुपया 92 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। सर्वे के मुताबिक, Rupee Depreciation 2025 केवल बाजार के उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति (geopolitics) और रणनीतिक बदलावों का असर है।
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट से ठीक पहले पटल पर रखा। इस रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि भारतीय रुपया इस वक्त विदेशी निवेश (foreign inflows) की कमी और बढ़ते व्यापार घाटे के दोहरे दबाव से जूझ रहा है।
विदेशी निवेश में कमी और ट्रेड डेफिसिट का दबाव
सर्वे के अनुसार, भारत वस्तुओं के व्यापार में लगातार घाटे (Trade Deficit) का सामना कर रहा है। हालांकि, देश को सेवाओं के निर्यात और विदेश से आने वाली रकम (Remittances) से अच्छी आय होती है, लेकिन यह आय व्यापार घाटे की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं है। भारत अपनी ‘बैलेंस ऑफ पेमेंट’ (BoP) स्थिति को स्थिर रखने के लिए विदेशी पूंजी निवेश पर निर्भर है। जब यह निवेश धीमा पड़ता है, तो रुपये की स्थिरता पर सीधा प्रहार होता है।

Rupee Depreciation 2025 के पीछे जियोपॉलिटिकल कारण
आर्थिक सर्वे ने इस गिरावट को ‘रणनीतिक शक्ति के अंतर’ (Strategic Power Gap) से जोड़कर देखा है। अमेरिका के साथ चल रही ट्रेड डील की अनिश्चितता और वैश्विक बाजारों में बढ़ती अस्थिरता ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है। इसी अनिश्चितता के कारण भारत से पूंजी बाहर जा रही है, जिससे डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता जा रहा है। 1 अप्रैल 2025 से 22 जनवरी 2026 के बीच रुपये की कीमत में लगभग 6.5% की गिरावट दर्ज की गई है।
क्या यह गिरावट चिंताजनक है?
सरकार और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की यह चाल ‘व्यवस्थित’ (Orderly) है। सर्वे में स्पष्ट किया गया है कि लंबी अवधि में रुपये की स्थिति देश के बुनियादी आर्थिक ढांचे पर निर्भर करेगी। यदि भारत अपनी उत्पादकता बढ़ाता है, निर्यात में विविधता लाता है और ग्लोबल वैल्यू चेन्स (GVCs) में अपनी पैठ मजबूत करता है, तो भविष्य में स्थिरता की उम्मीद की जा सकती है।
व्यापारिक अनिश्चितता का गहरा प्रभाव
अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर बाजार में जो कयास लगाए जा रहे हैं, उसका सीधा असर मुद्रा बाजार पर दिख रहा है। जब तक किसी ठोस समझौते की रूपरेखा तैयार नहीं होती, तब तक डॉलर की मांग और आपूर्ति का संतुलन रुपये के पक्ष में आना मुश्किल लग रहा है। वहीं, घरेलू मोर्चे पर बढ़ती महंगाई और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के भरोसे को प्रभावित किया है।

भविष्य की राह और सुधार के संकेत
आर्थिक सर्वे केवल समस्याओं पर बात नहीं करता, बल्कि समाधान की ओर भी इशारा करता है। रिपोर्ट के अनुसार, मध्यम से लंबी अवधि में एक्सचेंज रेट की गतिशीलता को संरचनात्मक सुधारों के जरिए संभाला जा सकता है। उच्च मूल्य वाली वस्तुओं का निर्यात बढ़ाना और एक स्थिर नीतिगत वातावरण तैयार करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि अल्पकालिक झटकों का मुकाबला किया जा सके।
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