कामदेव को शिव ने अपनी तीसरी नेत्र से क्यों कर दिया था भस्म, होली पर्व से जुड़ा है रिश्ता

होली। होली केवल सामाजिक उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संदेश भी देती है. कामदेव का अनंग रूप में जीवित होना यह दर्शाता है कि प्रेम कभी नष्ट नहीं होता, वह केवल स्वरूप बदलता है. इसलिए फाल्गुन पूर्णिमा की होली को प्रेम, त्याग, तपस्या और पुनर्जन्म की प्रतीक भी माना जाता है। कथा के अनुसार भगवान शिव ने अपनी तपस्या भंग होने से क्रोधित होकर कामदेव को तीसरे नेत्र से भस्म किया था, क्योकि माता पार्वती से विवाह के लिए कामदेव ने शिव पर पुष्प बाण चलाया था। यह पौराणिक घटना फाल्गुन पूर्णिमा (होलिका दहन) से जुड़ी है, जो काम,वासना पर संयम और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

कामदेव के भस्म होने की मुख्य वजह और होली से संबंध

कथा के अनुसार भगवान शिव गहरी तपस्या में लीन थे। पार्वती जी से विवाह के लिए देवताओं ने कामदेव (प्रेम के देवता) को शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा था। कामदेव ने शिवजी पर पुष्प बाण चलाया, जिससे शिवजी की समाधि टूट गई। इससे क्रोधित होकर शिव ने तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए।

पत्नी रति ने की याचना

कामदेव के भस्म होने के बाद, उनकी पत्नी रति विलाप कराने लगी और उन्होने भगवान शिव से प्रार्थना की, जिस पर शिव ने उन्हें फिर से जीवित करने का वरदान दिए। होलिका दहन के दिन कामदेव के भस्म होने की यह घटना कामदहन के रूप में याद की जाती है, जो वासना को अग्नि में समर्पित करने का प्रतीक है। अगले दिन रंगों की होली, कामदेव के पुनर्जीवित होने की खुशी और प्रेम के उत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह घटना काम पर योग (संयम) की जीत का संकेत है।

आखिर कामदेव ने शिव पर क्यू चलाया बाढ़

अब यहां सबसे अंहम बात यह है कि आखिरी कामदेव ने भगवान शिव पर क्यू पुष्पबाण चलाए थे। इसके पीछे जो पौराणिक कथा बताई गई है। वह यह है कि ताराकासुर को यह वरदान था कि उसकी मौत भगवान शिव के पुत्र से होगी। ताराकासुर का कहर दिनों दिन बढ़ रहा था, तो वही भगवान शिव सती को खोने के बाद अपने ध्यान में लीन थें। माता पार्वती भी शिव से विवाह की इच्छा लेकर उनकी भक्ति में लीन थी। ऐसी स्थित में भगवान शिव का ध्यान तोड़ना जरूरी हो गया, लेकिन शिव के ध्यान को तोड़ना आसान नही था। देवताओं ने कामदेव को इस काम के लिए भेजा था। कामदेव शिव पर पुष्पबाण चला दिए और शिव का ध्यान टूट गया। जिससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होने अपनी तीसरे नेत्र से कामदेव का भस्म कर दिए, चूकि कामदेव वासना के प्रतीक थें, ऐसे में माना जाता है कि इस दिन वासना का अंत होलिका दहन के रूप में हुआ तो वही कामदेव के नए जीवन का जो वरदान मिला वह होली पर्व के रूप में मनाया जाता है।

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