West Bengal Result 2026 : क्या पश्चिम बंगाल में 15 साल पुराना किला ढहने वाला है? एग्जिट पोल्स ने सियासी पारा हाई कर दिया है। कहीं भाजपा को प्रचंड बहुमत, तो कहीं टीएमसी की वापसी- लेकिन बड़ा सवाल, अगर नतीजे एग्जिट पोल जैसे आए तो आखिर दीदी की ‘लंका’ में आग किसने लगाई?
बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने के संकेत
ज्यादातर सर्वे में भारतीय जनता पार्टी को 140 से 170 सीटों तक पहुंचते दिखाया गया है। वहीं तृणमूल कांग्रेस 110 से 140 सीटों के बीच सिमटती नजर आ रही है। कुछ सर्वे तो बीजेपी को 200 पार तक ले जाते दिख रहे हैं। यानी मुकाबला नहीं, सीधा सत्ता परिवर्तन!
यहां बात ये भी करनी होगी कि क्या टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी की रणनीति फेल हो गई। क्योंकि टीएमसी के नंबर 2 नेता अभिषेक बनर्जी, इस बार पूरी चुनावी कमान उनके ही हाथ में थी। क्या ममता बनर्जी ने युवा चेहरे को आगे लाने लाकर बड़ी गलती कर दी। माना जा रहा है कि ममता बनर्जी की इस ‘नई राजनीति’ ने पुराने कार्यकर्ताओं को नाराज़ कर दिया, जिससे ममता बनर्जी के ग्राउंड कैडर कमजोर पड़ गए और बीजेपी का बूथ स्तर का नेटवर्क भारी पड़ गया।
क्या कहते हैं एग्जिट पोल?
बात करें, एग्जिट पोल की तो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के एग्जिट पोल्स ने सियासत में जबरदस्त हलचल मचा दी है। 294 सीटों वाले इस राज्य में बहुमत का आंकड़ा 148 है, लेकिन ज्यादातर एग्जिट पोल्स भारतीय जनता पार्टी को 140 से 170 सीटों के साथ सत्ता के करीब दिखा रहे हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस 110 से 140 सीटों के बीच सिमटती नजर आ रही है। कुछ सर्वे तो बीजेपी को 200 पार तक पहुंचाते दिख रहे हैं, जिससे 15 साल से सत्ता में काबिज सरकार के सामने बड़ा खतरा खड़ा हो गया है।
ममता बनर्जी के हार के क्या कारण हो सकते है?
पहला – ममता बनर्जी की हार के पीछे बॉबी हकीम के बयान भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने केंद्रीय बलों पर टिप्पणी की और उसके बाद सियासी ध्रुवीकरण को भी हवा दी। यह हो सकता है कि इसी कारण शहरी वोटर टीएमसी से खिसककर बीजेपी की तरफ चले गए हों।
दूसरा- क्या यह अभिषेक बनर्जी की रणनीति की नाकामी है, जिन्होंने इस बार चुनावी कमान संभाली और युवा चेहरों को आगे बढ़ाया, लेकिन इससे पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा हुई? या फिर फिरहाद हकीम के विवादित बयानों ने बीजेपी को ध्रुवीकरण का मौका दिया, जिससे शहरी वोट बैंक खिसक गया?
तीसरा – हुमांयु कबीर की बगावत भी टीएमसी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है, क्योंकि इससे खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटों का बंटवारा हुआ, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलता दिख रहा है।
चौथा – इस बार चुनाव आयोग की सख्ती भी बड़ा फैक्टर मानी जा रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में रिकॉर्ड संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती, ड्रोन निगरानी और वेबकास्टिंग ने चुनावी प्रक्रिया को काफी सख्त बना दिया, जिससे पुराने ‘बूथ मैनेजमेंट’ के तरीके कमजोर पड़ते नजर आए।
4 मई को तैय होगा किसे मिलेगी कुर्सी
वहीं मुकाबला अब सीधे ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है, जहां नंदीग्राम से लेकर भवानीपुर तक हर सीट पर नजरें टिकी हैं। ये सभी एग्जिट पोल बंगाल में इस बार बदलाव की बात कर रहे हैं। अगर बीजेपी को बहुमत मिलता है तो खुद टीएमसी- 200 पार का दावा कर रही है। सच्चाई क्या है, ये 4 मई को सामने आएगा तो क्या दीदी का किला ढहने वाला है? या फिर एक बार फिर “खेला होबे” एग्जिट पोल्स को गलत साबित करेगा? 4 मई, सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति का फैसला करने वाला दिन है।

