Vindhyas Role In Indian’s Constitution: देश को गणराज्य बने हुए 76 वर्ष होने जा रहे हैं। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और इसी स्मृति में हर वर्ष गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय संविधान के निर्माण में कप्तान अवधेश प्रताप सिंह सहित विंध्य क्षेत्र के भी चार प्रतिनिधियों ने सक्रिय भूमिका निभाई थी? इतना ही नहीं, उन्होंने विंध्य के प्रतिनिधि के रूप में संविधान की मूल प्रति पर अपने हस्ताक्षर भी किए थे।
संविधान निर्माण की प्रक्रिया
स्वतंत्रता के बाद देश के संचालन के लिए संविधान निर्माण की प्रक्रिया आज़ादी के पहले से ही शुरू हो चुकी थी। 16 मई 1946 को कैबिनेट मिशन ने संविधान सभा की रूपरेखा तय की थी। 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के बाद संविधान सभा के सदस्यों की 299 थी। संविधान पारित और लागू होने के बाद भी संविधान सभा 1952 तक प्रोविजनल संसद के तौर पर भी कार्य करती रही। इस संविधान सभा में उस समय के भारत के प्रत्येक प्रांत के सदस्यों को प्रतिनिधित्व दिया गया था, अब चूंकि उस समय हमारे विंध्यप्रदेश का भी अस्तित्व था, इसीलिए विंध्य से चार सदस्यों को संविधान सभा के लिए राजप्रमुख द्वारा मनोनीत किया गया था।
भारतीय संविधान में विंध्य की भूमिका | Vindhyas role in Indian’s Constitution
केंद्र सरकार द्वारा विंध्यप्रदेश के लिए सदस्य संख्या चार निर्धारित की गई थी और इसके लिए संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा, विंध्यप्रदेश के तत्कालीन राजप्रमुख महाराज मार्तंड सिंह से चार सदस्यों को नामित करने के लिए कहा था, चूंकि विंध्यप्रदेश दो भिन्न क्षेत्रों बघेलखंड और बुंदेलखंड को मिलाकर बना था, इसीलिए यह जरूरी था कि दोनों क्षेत्रों को बराबर प्रतिनिधित्व मिले। तो इसी प्रक्रिया के फलस्वरूप कप्तान अवधेश प्रताप सिंह और पं. शंभूनाथ शुक्ल विंध्यप्रदेश के बघेलखंड क्षेत्र से तथा पं. रामसहाय तिवारी और मन्नूलाल द्विवेदी विंध्य के बुंदेलखंड से मनोनीत किए गए थे।
सदस्यों के निर्वाचन में देरी
दरअसल विंध्यप्रदेश के गठन के बाद भी संविधान सभा में उसे अभी तक समुचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हो पाया था। इस स्थिति को लेकर सेंट्रल प्रोविंसेज़ से संविधान सभा के सदस्य एच. वी. कामथ विशेष रूप से चिंतित थे। उनका मानना था कि विंध्यप्रदेश जैसे नवगठित राज्य का संविधान निर्माण की प्रक्रिया से बाहर रहना उचित नहीं है। इसी चिंता के चलते उन्होंने सभा में एक प्रस्ताव रखा कि यदि विंध्यप्रदेश राज्य की ओर से प्रतिनिधियों के नामांकन में विलंब हो रहा है, तो संविधान सभा का सचिवालय स्वयं वहाँ से सदस्यों के निर्वाचन की प्रक्रिया आरंभ करे। इस प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए सभापति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने गुरुवार, 1 सितंबर 1949 को खेद प्रकट किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सचिवालय अपनी ओर से जो भी संभव था, वह कर चुका है। राज्य सरकार की ओर से यह आश्वासन दिया गया है कि वह शीघ्र ही अपने सदस्यों को नामित करेगी। साथ ही, राज्य मामलों का मंत्रालय भी इस विषय में सक्रिय रुचि ले रहा है। इसलिए हमें पूरा विश्वास है कि जल्द ही संविधान सभा में विंध्यप्रदेश का भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो जाएगा।
सदस्यों को मनोनीत करने की प्रक्रिया
दरअसल प्रारंभ में विंध्यप्रदेश के चार सदस्यों का चयन निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना प्रस्तावित था। इसके लिए निर्वाचक मंडल के गठन का प्रयास भी किया गया, लेकिन कुछ कारणों से यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप विंध्यप्रदेश के सदस्यों को मनोनीत किए जाने का प्रस्ताव संविधान सभा के समक्ष रखा गया, जिसे सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने संविधान सभा को भी इसके लिए सूचित कर दिया कि विंध्यप्रदेश के सदस्यों का निर्वाचन 20 नवंबर 1949 को किया जाएगा।
विंध्य के प्रतिनिधि संविधान सभा में
किंतु निर्धारित तिथि को निर्वाचन नहीं हो सका। इस स्थिति को लेकर 22 नवंबर 1949, मंगलवार को संविधान सभा के कुछ सदस्यों, एच. वी. कामथ, जयनारायण व्यास और एच. जे. खांडेकर ने अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद से इस बावत प्रश्न किया कि विंध्यप्रदेश के प्रतिनिधि अब तक सभा में उपस्थित क्यों नहीं हुए हैं। हालांकि कुछ तकनीकी कारणों के चलते यह प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाई थी। अंततः 24 नवंबर 1949, गुरुवार को विंध्यप्रदेश के चारों प्रतिनिधियों ने संविधान सभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस अवसर पर सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें शपथ दिलवाई। रजिस्टर में हस्ताक्षर करने के पश्चात वे चारों महानुभाव औपचारिक रूप से विंध्यप्रदेश के प्रतिनिधियों के रूप में संविधान सभा के सदस्य बने।
कौन थे कप्तान अवधेश प्रताप सिंह
विंध्य से संविधान सभा में शामिल होने वाले पहले व्यक्ति थे कप्तान अवधेश प्रताप सिंह, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और रीवा राज्य में कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे। वह विंध्यप्रदेश के प्रथम प्रधानमंत्री भी थे और दो बार राज्यसभा के सदस्य भी बने थे। रीवा में उनके नाम से एक विश्वविद्यालय भी स्थापित है।
कौन थे पं. शंभूनाथ शुक्ल
जबकि दूसरे सदस्य थे पं. शंभूनाथ शुक्ल, वह भी विंध्य में कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ ही वह रीवा महाराज के विधिक अर्थात कानूनी सलाहकार भी थे। आगे चलकर शुक्ल जी 1951-52 में विंध्यप्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने और 1967 में वह रीवा से सांसद भी निर्वाचित हुए थे। मध्यप्रदेश सरकार ने इनके नाम से शहडोल में विश्वविद्यालय की स्थापना की है।
पं. रामसहाय तिवारी कौन थे
लेकिन विंध्य की तरफ से संविधान सभा के लिए नामित दो सदस्य बुंदेलखंड से थे, इनमें से प्रथम थे पं. रामसहाय तिवारी जो बुंदेलखंड के छत्तरपुर से संबंध रखते थे, वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, चंद्रशेखर आजाद से प्रभावित होकर वह उनके सहयोगी बन गए थे और उन्हें रिवॉल्वर उन्होंने ही उपलब्ध करवाई थी, लेकिन बाद में महात्मा गांधी के प्रभाव में आकर सत्याग्रही हो गए, वह छत्तरपुर रियासत के मंत्री भी थे, वह दो बार 1952 और 1957 में खजुराहो लोकसभा से सांसद बने।
कौन थे मन्नूलाल द्विवेदी
जबकि विंध्य प्रदेश से संविधान सभा में शामिल होने वाले चौथे सदस्य थे मन्नूलाल द्विवेदी, जो विंध्यप्रदेश के चरखारी से संबंध रखते थे, वह भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और कांग्रेस नेता थे, जो विंध्य के प्रतिनिधि के तौर पर नामित हुए थे, लेकिन 25 जनवरी 1950 को चरखारी रियासत विंध्यप्रदेश से अलग होकर यूनाइटेड प्राविंस अर्थात उत्तरप्रदेश में मिल गया और द्विवेदी जी कार्यक्षेत्र भी उत्तरप्रदेश ही बन गया वह प्रथम लोकसभा चुनावों में उत्तरप्रदेश के हमीरपुर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।
