विक्रम संवत का 2080 वर्ष पुराना है इतिहास, एमपी के उज्जैन से हुई थी इसकी शुरूआत

विक्रम संवत। न्याय प्रिय विक्रमादित्य उज्जैन के सम्राट थें। इतिहास कार एवं जानकार बताते है कि सम्राट विक्रमादित्य विक्रम संवत की शुरूआत किए थें। उन्होंने गुड़ी पड़वा से नए हिन्दू वर्ष की घोषणा की थी, इसलिए हर साल गुड़ी पड़वा उज्जैन में धूमधाम से मनाया जाता है। उज्जैन में कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। शिप्रा नदी के तट पर सूर्य को अर्ध्य देकर और शंख बजाकर नव वर्ष का स्वागत किया जाता है और महाकाल का भी विशेष श्रृंगार होता है।
सिंहासन की होती है पूजा
उज्जैन में राजा विक्रमादित्य का सिंहासन उनकी कुलदेवी हरसिद्धि माता के सामने स्थित था। यहां हर दिन पूजा होती है। विक्रम टीले को सिंहासन स्थल माना जाता है। 32 मुखों वाला सिंहासन न्याय का प्रतीक था, जिस पर राजा भोज बैठना चाहते थे, लेकिन सफल नहीं हुए।
राजा भोज की इच्छा को रोकती रही सिंहासन की पुतलियां
सिंहासन बत्तीसी के बारे में यह मान्यता है कि सम्राट विक्रमादित्य उस सिंहासन पर बैठकर न्याय करते थे और उस पर बने 32 मुख इसमें उनकी सहायता किया करते थे। विक्रमादित्य का राज समाप्त होने के बाद सिंहासन गायब हो गया तो सालों बाद राजा भोज ने इसकी वापस खोज करवाई और उस पर बैठना चाहा, लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई। सिंहासन की 32 पुतलियों ने राजा विक्रमादित्य की महानता का बखान करते हुए राजा भोज को सिंहासन पर बैठने नहीं दिया।

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