TRS College Rewa Event : टीआरएस में वार्षिक राष्ट्रीय संगोष्ठी का रीवा में भव्य समापन

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TRS College Rewa Event : टीआरएस में वार्षिक राष्ट्रीय संगोष्ठी का रीवा में भव्य समापन-रीवा स्थित शासकीय ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय में आयोजित मध्यांचल सोशियोलॉजिकल सोसायटी की दो दिवसीय वार्षिक राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन समारोह अत्यंत गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से आए समाजशास्त्र के विद्वानों, शोधकर्ताओं एवं शिक्षाविदों ने सामाजिक परिवर्तन, भारतीय समाजशास्त्र की दिशा-दशा तथा समकालीन सामाजिक चुनौतियों पर गंभीर मंथन किया। समापन समारोह के मुख्य अतिथि प्रोफेसर मनीष वर्मा, डीन, बाबा साहेब अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अर्पिता अवस्थी, प्राचार्य ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रोफेसर प्रमोद कुमार, विभागाध्यक्ष समाजशास्त्र, लखनऊ विश्वविद्यालय एवं डॉ. राकेश तिवारी, कन्वीनर,सोशियोलॉजी ऑफ स्पोर्ट, इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी उपस्थित रहे। रीवा में आयोजित मध्यांचल सोशियोलॉजिकल सोसायटी की राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य समापन, प्रो. मनीष वर्मा ने कहा-समाजशास्त्र समाज का छाता है,पढ़ें पूरा विस्तृत समाचार।

समाजशास्त्र समाज का छाता है-प्रो. मनीष वर्मा का विचार

Sociology as an Umbrella of Society-Views of Prof. Manish Verma

मुख्य अतिथि प्रो. मनीष वर्मा ने अपने उद्बोधन में भारतीय समाजशास्त्र की ऐतिहासिक यात्रा, वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की दिशा पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “समाजशास्त्र समाज का छाता है, जो समाज की सभी विधाओं को समेटे हुए है।” आज आवश्यकता है कि समाजशास्त्र को स्थानीय संदर्भों और भारतीय सामाजिक यथार्थ के अनुरूप पुनर्परिभाषित किया जाए। उन्होंने ब्रिटिश काल से लेकर वर्तमान समय तक समाजशास्त्र के विविध स्वरूपों का विवेचन करते हुए भारतीय समाजशास्त्रियों के चिंतन को रेखांकित किया। उन्होंने लिटिल रिपब्लिक (छोटे गणराज्य) की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय गांव सामाजिक लोकतंत्र की आधारशिला रहे हैं, लेकिन आज गांवों से पारंपरिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है, जिसे संभालना अत्यंत आवश्यक है। डॉ. वर्मा ने स्थानीय संघर्षों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सामाजिक संघर्षों का भी विश्लेषण करते हुए कहा कि समाजशास्त्र को भारतीय परिवेश में समझना और व्याख्यायित करना समय की मांग है।

समाज की नब्ज पहचानने वाला विज्ञान है समाजशास्त्र-डॉ. अर्पिता अवस्थी

Sociology as the Science of Understanding Social Pulse-Dr. Arpita Awasthi

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं डॉ. अर्पिता अवस्थी ने समाजशास्त्र को समाज की नब्ज टटोलने वाला विज्ञान बताया। उन्होंने कहा कि समाजशास्त्रीय चिंतन के बिना किसी भी समाज का समग्र विकास संभव नहीं है। विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर प्रमोद कुमार ने समाजशास्त्र को उत्पादक (प्रोडक्टिव) बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए विभिन्न सामाजिक मॉडल्स पर चर्चा की। वहीं, डॉ. राकेश तिवारी ने समाजशास्त्र को खेल के समाजशास्त्र से जोड़ते हुए कहा कि यह विज्ञान खेलों के सामाजिक आयामों को गहराई से समझने का प्रभावी माध्यम है।

देशभर से 170 से अधिक प्रतिभागियों की सहभागिता

शोध सत्र और युवा समाज वैज्ञानिक अवार्ड

Research Sessions & Young Sociologist Awards

  • समापन से पूर्व प्रातःकालीन दो अकादमिक सत्र आयोजित किए गए, जिनकी अध्यक्षता डॉ. सुशमा मिश्रा (लखनऊ) एवं डॉ. राकेश तिवारी (गोरखपुर) ने की। विषय विशेषज्ञ के रूप में डॉ. अपर्णा मालवीय एवं डॉ. वासुदेव जादौन उपस्थित रहे। इन सत्रों में कुल 29 शोध पत्रों का वाचन किया गया। युवा शोधकर्ताओं को प्रोत्साहित करने हेतु युवा समाज वैज्ञानिक अवार्ड प्रदान किए गए।
  • हिंदी माध्यम-डॉ. अर्पणा एक्का (अम्बिकापुर) / डॉ. सतीष द्विवेदी (रीवा)
  • अंग्रेजी माध्यम-डॉ. मल्लिका गौर (ग्वालियर) / साक्षी अग्रहरि (सतना)

नई कार्यकारिणी की घोषणा

Announcement of New Executive Committee

  • दो दिवसीय संगोष्ठी का प्रतिवेदन सोसायटी के सचिव डॉ. ध्रुव दीक्षित ने प्रस्तुत किया तथा नई कार्यकारिणी की घोषणा की गई।
  • नई कार्यकारिणी इस प्रकार है-
  • अध्यक्ष-डॉ. महेश शुक्ला (रीवा)
  • सचिव-डॉ. ध्रुव दीक्षित (जबलपुर)
  • उपाध्यक्ष-डॉ. यशपाल व्यास (इंदौर), डॉ. विनोद रस्तोगी (सतना), डॉ. शशांक ठाकुर (भोपाल), डॉ. संजय जोशी (नीमच)
  • कोषाध्यक्ष-डॉ. अमित साहू (जबलपुर)
  • सह सचिव-डॉ. स्वाती शुक्ला (रीवा), डॉ. वासुदेव जादौन (ग्वालियर), डॉ. प्रदीप कुमार (महू)
  • कार्यकारिणी सदस्य-डॉ. रश्मि दुबे (सागर), डॉ.अनिल उपाध्याय (शहडोल),डॉ. दीप चिले (जबलपुर),डॉ.अखिलेश शुक्ला (रीवा)

देशभर से 170 से अधिक प्रतिभागियों की सहभागिता

Participation of Over 170 Delegates from Across India

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों से 170 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के सफल संचालन में डॉ. अखिलेश शुक्ल, डॉ. शाहेदा सिद्दीकी, डॉ. मधुलिका श्रीवास्तव, डॉ. रचना श्रीवास्तव, डॉ. मुकेश येंगल, डॉ. मोहम्मद परवेज, डॉ. मोहम्मद शरीफ, डॉ. वरुण शुक्ला, डॉ. निशा सिंह एवं अन्य शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

निष्कर्ष-(Conclusion)-मध्यांचल सोशियोलॉजिकल सोसायटी की यह दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी समाजशास्त्रीय चिंतन को नई दिशा देने वाली सिद्ध हुई। भारतीय समाज की जमीनी वास्तविकताओं, पारंपरिक मूल्यों एवं आधुनिक सामाजिक चुनौतियों पर हुए विचार-विमर्श से यह स्पष्ट हुआ कि समाजशास्त्र न केवल समाज को समझने का माध्यम है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा भी तय करता है। यह आयोजन अकादमिक जगत के लिए प्रेरणास्रोत और शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा।

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