रेखा भारद्वाज की आवाज़ का नमक हर गाने को कर देता है नमकीन !

REKHA (6)

Happy Birthday Rekha Bhardwaj :आपको नहीं लगता “नमक इश्क़ का” गाना आज भी फिल्म जगत के इतने गानों के बीच आज भी अपनी अलग जगह बनाए हुए है और उसे भूलना हर संगीत प्रेमी के लिए नामुमकिन है तो आइये जानते इस गाने की खासियत और उसे गाने वाली सिंगर रेखा भारद्वाज के बारे में जिन्होंने इसमें नमक घोलते हुए एक अलग अंदाज़ दिया है

क्यों मिला ‘नमक इश्क़ का’ गाना :-

ये गाना है साल 2006 में आई फिल्म ‘ओमकारा’ फिल्म का जो रेखा को गाने के लिए ऐसे मिल गया कि उनके पति यानी फिल्ममेकर और म्यूज़िक कम्पोज़र विशाल भरद्वाज इस गाने को संगीतबद्ध कर रहे थे और वो अपने हर गीत की धुन बनाने के बाद हमेशा रेखा से गवा कर ज़रूर सुनते थे ताकि उन्हें पता चल सके कि कोई गाना गाने में कैसा लगेगा क्योंकि वो हमसे बहोत पहले से रेखा के इस हुनर से वाक़िफ़ थे और दीवाने भी थे तो इसलिए इस दफा भी उन्होंने ऐसा ही किया और रेखा ने उनकी धुन पे शब्द बिठाए और उन्हें गाना गाके सुनाया पर इस गाने के मूड को देखते हुए और अन्तरे को मुखड़े से जोड़ने के लिए रेखा ने इसमें अपनी तरफ से “हाए” शब्द जोड़ते हुए दूसरी लाइन को बड़ी खूबसूरती से मिला लिया जो विशाल को इतना अच्छा लगा कि उन्होंने तय कर लिया कि ये गाना अब रेखा ही गाएँगी क्योंकि जो वो नहीं कर पाए वो रेखा ने कर दिया। ये है रेखा भारद्वाज की गायिकी का मुख्तलिफ अंदाज़।

कैसे हुईं पारंगत :-

हालाँकि रेखा भारद्वाज ने ‘नमक इश्क़ का. …’ गाने से पहले ज़्यादा गाने नहीं गाए थे फिर भी इस गाने को उन्होंने बड़ी बेबाकी और अल्हड़ पन के साथ शोख़ अंदाज़ में गाया। जनवरी 1964 को दिल्ली में जन्मीं रेखा ने संगीत की शिक्षा अपनी बड़ी बहन से ली, उसके बाद रवायती संगीत की तालीम पंडित अमरनाथ से हासिल की। उनकी माँ भी संगीत की अच्छी जानकार थीं। इसलिए संगीत की बेसिक समझ उनमें बचपन से थी तलफ़्फ़ुज़ की बात करें तो वो हिंदी उर्दू दोनों में अच्छी पकड़ रखती हैं जिसके बारे में उन्होंने बताया था कि वो बचपन से हिंदी साहित्य खूब पढ़ा करती थीं और पिता जी उर्दू जानते थे इसलिए उनसे भी कुछ न कुछ सीखती रहती थीं और जल्दी ही उन्हें हरुफ और नुक्ते की समझ हो गई और वो महज़ 3 साल की थीं जब उन्होंने गाना शुरू कर दिया था. इसके अलावा वो बड़े – बड़े कलाकारों को सुनकर भी शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को समझने की कोशिश करती थीं।

संगीत लाया दो कलाकारों को पास :-

 संगीत में इतनी पारंगत होने की वजह से ही वो विशाल भारद्वाज के नज़दीक आईं उनसे मुतासिर हुईं और दोनों में प्यार हुआ एक आप दोनों की पहली मुलाक़ात साल 1984 में हिन्दू कॉलेज के एनुअल फंक्शन में हुई थी हालाँकि उस वक़्त उन्होंने कोई नाम नहीं कमाया था लेकिन रेखा के मन में उनकी प्रतिभा के लिए सम्मान और भरोसा बहोत था इस तरह दोनों का प्यार परवान चढ़ा और 1991 में आप दोनों ने शादी कर ली।

आइटम सॉन्ग में भी गरिमा को बनाना जानती हैं :

यूँ तो आइटम सॉन्ग में अक्सर अश्लीलता ही नज़र आती है थोड़े मादक या उत्तेजक भी लगते हैं लेकिन रेखा उन गायिकाओं में से हैं जो इसे भी सौंदर्यपूर्ण बना देती हैं ,भले ही इसका पिक्चराइज़ेशन थोड़ा फीका हो लेकिन वो सुनने में संगीत प्रेमियों को ज़रूर आकर्षित कर लेता है। रेखा की गायकी में हमें मौसिक़ी के मुख्तलिफ रंग देखने को मिलते हैं, जिसमें कहीं फोक हैं कहीं ठुमरी ,शास्त्रीयता तो कहीं ग़ज़ल का दिलनशीं लुत्फ़ ,जैसे हमारे पसंदीदा हर रंग को वो अपनी आवाज़ में पिरो लेने का हुनर जानती हों फिर उनकी खनकदार आवाज़ और अंदाज़ भी दुनिया से जुदा है जो उन्हें ख़ास बनाता है। कु छ गाने हम आपको याद दिलाए देते हैं जो आपके भी फेवरेट होंगे जैसे – ‘नमक इश्क़ का’ , ‘हमरी अटरिया पे’, ‘मोरा जिया लागे ना’, ‘कबीरा’,’फिर ले आया दिल’ और ‘गेंदा फूल’ इन गीतों से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वो लिरिक्स और संगीत पर बहोत ग़ौर करने के बाद अपने गानों का चुनाव करती हैं शायद इसीलिए उन्होंने गुलज़ार साहब के लिखे गाने खूब गाए हैं।

 तब से अब तक :-

रेखा भरद्वाज का पहला एल्बम ‘इश्क़ -इश्क़ ‘ साल 2002 रिलीज़ हुआ था और तब से लेकर अब तक उनका ये सुरीला सफर जारी है ,उन्होंने हिंदी के अलावा बंगाली, मराठी, पंजाबी और मलयालम भाषाओं में भी गीत गाए हैं ,उन्हें दो फिल्मफेयर और एक राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है। हालही के गानों की बात करें तो उनका गाया गीत ‘कह दो ना, कुछ तो बोलो ना’ रिलीज़ हुआ है जिसे हिमांशु शेखर ने लिखा है ,ये गाना पंचायत फेम जितेंद्र कुमार और मनप्रीत कौर पर फिल्माया गया है।

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