mental health: हाल ही में The Lancet में प्रकाशित एक बड़े ग्लोबल अध्ययन ने दुनिया की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति को लेकर एक गंभीर तस्वीर के बारे में जानकारी दी है। जानकारी के अनुसार 2023 में करीब 1.2 अब लोग किसी न किसी तरह से मानसिक बीमारी से ही जूझ रहे थे। यह संख्या 1990 की तुलना में अब लगभग दोगुनी हो चुकी है।
इसमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी बात क्या है?
जानकारी में सबसे जरूरी निष्कर्ष या निकल की मानसिक रोग अब सिर्फ एक व्यक्तिगत समस्या नहीं है बल्कि यह एक तरह से वैश्विक पब्लिक हेल्थ संकट की तरह हो चुके हैं। इस अध्ययन से हमें पता चलता है कि मानसिक बीमारियां अब दुनिया में डिसेबिलिटी यानी लंबे समय तक कामकाज और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने की सबसे बड़ी वजह बन चुका है। जिसका मतलब है कि कई सारे लोग इन बीमारियों से मरते नहीं है लेकिन उनका पढ़ाई, नौकरी, रिश्ते और सामान्य जीवन पूरी तरह से प्रभावित हो जाता है।
ये भी पढ़े: भारत में पुरुषों में तेजी से बढ़ रहा है Oral Cancer, ICMR स्टडी ने जताई चिंता
कौन-सी मानसिक बीमारियां सबसे ज्यादा बढ़ीं हुई है?
इस अध्ययन के अनुसार mental health के सबसे ज्यादा मामले एंजायटी डिसऑर्डर यानी चिंता विकार और मेजर डिप्रैशन के हुए हैं। खास तौर पर 15 से 19 साल की युवाओं में मानसिक दबाव तेजी से बढ़ता देखा जा रहा है हालांकि यह आंकड़ा सिर्फ मेडिकल ही नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव की कहानी भी बताता है।
क्या है इसके पीछे संभावित कारण
जानकारी के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने के पीछे कई सारी वजह होते हैं जैसे सोशल मीडिया का दबाव, अकेलापन महसूस होना, कैरियर और पढ़ाई का तनाव, आर्थिक असुरक्षा महसूस होना, युद्ध जलवायु संकट और सामाजिक दिक्कत आदि।
क्या वास्तव में mental health बढ़ी है या diagnosis है?
इन दिनों यह सवाल काफी चर्चा में देखा जा रहा है कई डॉक्टर और ऑनलाइन चर्चा में लोगों ने बताया कि पहले मानसिक बीमारियों की पहचान कम होती थी। अब अवेयरनेस और डायग्नोसिस बेहतर हुआ है इसलिए आंकड़ों के बारे में पता चलता है। हालांकि यह तर्क पूरी तरह से गलत नहीं है 1990 के मुकाबले आज मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात हो सकती है। अगर किसी व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य खराब है तो ज्यादा से ज्यादा लोग उसकी मदद करने की कोशिश करते हैं महिलाओं और बच्चों में स्क्रीनिंग इससे बेहतर हुईहै।
लेकिन इस मामले में बेहतर डायग्नोसिस से पूरी वृद्धि को समझाना मुश्किल होता है क्योंकि एंजायटी और डिप्रेशन के वास्तविक मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
ये भी पढ़े: अब खून की जांच से पकड़ में आएगा cancer, UCLA स्टडी में सामने आई जानकारी..
भारत के लिए ये रिपोर्ट का क्या मतलब?
हमारे देश भारत जैसे युवा आबादी वाले देश के लिए यह रिपोर्ट एक चेतावनी का विषय है यहां पहले से मानसिक स्वास्थ्य के डॉक्टरों की कमी है। गांव और छोटे-छोटे शहरों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की भी कमी है स्टिग्मा यानी शर्म या समाज के डर के कारण लोग मानसिक स्वास्थ्य पर बात नहीं करते हैं। पढ़ाई और नौकरी का बढ़ता दबाओगी मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का कारण है। अगर शुरुआती लेवल पर मानसिक स्वास्थ्य के लिए कौन सी लिंक मेंटल हेल्थ प्रोग्राम और अफोर्डेबल ट्रीटमेंट को बढ़ाया नहीं जाता है तो आने वाले सालों में या आर्थिक और सामाजिक संकट बन सकता है।
हालांकि है रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है बल्कि आधुनिक जीवन शैली की एक झलक भी प्रस्तुत करता है दुनिया पहले से ज्यादा कनेक्ट तो जरूर हुई है लेकिन मानसिक रूप से ज्यादातर लोग अकेले और दबाव महसूस करते हैं सबसे जरूरी बात है mental health अब कमजोरी नहीं बल्कि स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा मनाना चाहिए जैसे डायबिटीज और हृदय संबंधित रोगों को मानते हैं।

