Tere Ishq Mein controversy In Bombay High Court : आनंद एल राय की फ़िल्म “तेरे इश्क़ में” विवादों के घेरे में जानें,क्यों-दर्ज़ हुआ-फिल्म “तेरे इश्क़ में” बनाम “रांझणा” विवाद और सिनेमा की भावनात्मक दुनिया का सवाल आनंद एल राय पर 84 करोड़ का मुकदमा-तेरे इश्क़ में और “रांझणा” विवाद से सिनेमा में कॉपीराइट की नई बहस-बॉलीवुड में रचनात्मक स्वतंत्रता और कानूनी अधिकारों के बीच चल रहा टकराव एक बार फिर केंद्र में आ गया है। इस बार विवाद निर्देशक आनंद एल राय की 2025 में रिलीज़ हुई फिल्म “तेरे इश्क़ में” को लेकर है, जिसे 2013 की सुपरहिट फिल्म “रांझणा” का “स्पिरिचुअल सीक्वल” बताए जाने पर निर्माता कंपनी इरॉस इंटरनेशनल मीडिया लिमिटेड ने चुनौती दी है। इरॉस ने इस मामले में 84 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। यह मुकदमा सिर्फ दो फिल्मों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इससे भारतीय सिनेमा में कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, पात्रों के अधिकार और “स्पिरिचुअल सीक्वल’ की अवधारणा पर निर्णायक प्रभाव पड़ सकता है। निर्देशक आनंद एल राय और उनकी फिल्म “तेरे इश्क़ में” पर इरॉस ने 84 करोड़ का कॉपीराइट मुकदमा दायर किया है। बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचे इस मामले से “स्पिरिचुअल सीक्वल” रचनात्मक स्वामित्व और बौद्धिक संपदा अधिकारों पर दूरगामी असर पड़ सकता है।
आइए पहले जाने कि आख़िर क्या है पूरा मामला ?
दरअसल इरॉस इंटरनेशनल का आरोप है कि निर्देशक आनंद एल राय और उनकी प्रोडक्शन कंपनी कलर येलो मीडिया एंटरटेनमेंट LLP ने, जानबूझकर फिल्म “तेरे इश्क़ में” को फिल्म “रांझणा” की भावनात्मक और रचनात्मक दुनिया से जोड़कर प्रचारित किया, जबकि इसके लिए उन्होंने न तो उपयोगिता में इस बात को स्पष्ट किया न ही ही इसके लिए किसी से भी कोई औपचारिक अनुमति नहीं ली गई थी। जबकि कंपनी का दावा है कि फिल्म “रांझणा” के कॉपीराइट टाइटल का ट्रेडमार्क,पात्रों (Characters),संवाद और सीक्वल-प्रीक्वल-रीमेक के अधिकार सभी पर उसका एकमात्र और विशिष्ट कानूनी स्वामित्व है अतः इस दृष्टि से उन पर कॉपीराइट का मुकदमा लाजमी है।
किन-किन को बनाया गया है प्रतिवादी ?
इस पुरे मामले में जानने योग्य बात यह है कि यह मुकदमा केवल आनंद एल राय तक सीमित नहीं है। बल्कि इरॉस ने इसे एक बहुपक्षीय कानूनी लड़ाई का रूप देते हुए उन सभी को प्रतिवादी बनाया है जो उक्त क्षेत्र में न सिर्फ सफल है बल्कि अच्छा नाम और डैम भी कमा रहे हैं जिनमें – कलर येलो मीडिया एंटरटेनमेंट LLP,टी-सीरीज़,लेखक हिमांशु शर्मा,ओटीटी,प्लेटफॉर्म,नेटफ्लिक्स आदि को नोटिस तमिल किए गए हैं। इससे साफ है कि विवाद का दायरा फिल्म निर्माण से लेकर वितरण और डिजिटल स्ट्रीमिंग तक फैल चुका है जो न सिर्फ कॉपीराइट को हलके में लेने वालों को सचेत और सजग बनाने वाला है।

प्रचार सामग्री पर गंभीर आरोप
इरॉस की शिकायत में जुलाई 2025 में जारी “तेरे इश्क़ में” के टीज़र का विशेष उल्लेख किया गया है। कंपनी का कहना है कि टीज़र में इस्तेमाल किए गए वाक्यांश- “From the world of Raanjhanaa” और हैशटैग WorldOfRaanjhanaa-दर्शकों को यह विश्वास दिलाने के लिए काफी थे कि यह फिल्म “रांझणा’ की आधिकारिक अगली कड़ी है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह साबित हुआ कि ऐसा जान बूझकर किया गया तो ,यह मामला भ्रामक विपणन (Misleading Marketing) और ट्रेडमार्क उल्लंघन के अंतर्गत आ सकता है।
पात्रों की समानता सबसे संवेदनशील बिंदु
इस मुकदमे का सबसे नाज़ुक पहलू पात्रों की समानता को माना जा रहा है। इरॉस ने विशेष रूप से अभिनेता मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब द्वारा निभाए गए किरदारों का उल्लेख किया है और दावा किया है कि दोनों फिल्मों के पात्रों में भावनात्मक, वैचारिक और संरचनात्मक समानताएं हैं, जो कॉपीराइट उल्लंघन की श्रेणी में आ सकती हैं।
फैसले के संभावित दूरगामी असर
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि अदालत इरॉस के पक्ष में फैसला देती है, तो इसके परिणाम दूरगामी होंगे-“स्पिरिचुअल सीक्वल” जैसी अवधारणा पर कड़ी कानूनी निगरानी,निर्माता-निर्देशक अनुबंधों में अधिकारों की स्पष्ट और सख्त परिभाषा
पात्रों, थीम्स और सिनेमैटिक यूनिवर्स के उपयोग के लिए नए कानूनी मानक-यह फैसला भविष्य में रचनात्मक प्रयोगों की सीमाएं भी तय कर सकता है।
“शोले” का उदाहरण और ऐतिहासिक संदर्भ
इस विषय को लेकर सोशल मिडिया पर चल रही गॉसिप के अनुसार-इस मुकदमे में जीपी सिप्पी की फिल्म “शोले” और उसके पात्रों के कॉपीराइट को लेकर चली लंबी कानूनी लड़ाई का भी उल्लेख किया जाएगा। “शोले” केस पहले ही यह सवाल खड़ा कर चुका है कि किसी फिल्म की लोकप्रियता और उसके पात्रों पर अंतिम अधिकार किसका होता है।
निष्कर्ष (Conclusion)- अब देखने की या इंतज़ार करने की बात है की यह विवाद केवल “तेरे इश्क़ में” बनाम “रांझणा’ तक सीमित नहीं है। बॉम्बे हाई कोर्ट से आने वाला फैसला यह तय करेगा कि किसी सफल फिल्म की “भावनात्मक दुनिया” पर अंतिम अधिकार किसका है-निर्माता का, निर्देशक का या दर्शकों की सामूहिक स्मृति का ? यह मुकदमा भारतीय सिनेमा के लिए एक न्यायिक मील का पत्थर साबित हो सकता है, जो रचनात्मक स्वतंत्रता और बौद्धिक संपदा अधिकारों के बीच संतुलन की नई परिभाषा गढ़ेगा।
