नई दिल्ली। दवाओं की कीमतों और उनकी अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) के बीच बड़े अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किए हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने पूछा कि जब कई दवाएं रिटेलर को काफी कम कीमत पर मिलती हैं, तो मरीजों को उनके लिए कई गुना ज्यादा कीमत क्यों चुकानी पड़ती है।
अदालत ने दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के मौजूदा सिस्टम पर सवाल उठाते हुए पूछा कि सरकार सभी दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी पर नियंत्रण के लिए व्यापक व्यवस्था क्यों नहीं बना सकती। यह मामला दवाओं की कीमतों, जेनेरिक दवाएं लिखने और मेडिकल उपकरणों की MRP को नियंत्रित करने से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान उठा।
₹2,700 की दवा पर ₹27,000 MRP का मामला
29 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया था। अदालत के सामने बताया गया कि जिस दवा की कीमत रिटेलर के लिए करीब ₹2,700 है, उसकी MRP ₹27,000 तक है। इस अंतर पर अदालत ने गंभीर चिंता जताई और सवाल किया कि मरीजों पर इतना आर्थिक बोझ क्यों डाला जा रहा है।
अदालत ने सुझाव दिया था कि दवाओं की रिटेलर कीमत और MRP के बीच अंतर को सीमित करने के लिए 16 प्रतिशत का एक समान मानदंड लागू करने पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता।
12 अक्टूबर को कैंसर की दवाओं के मार्जिन पर भी सवाल
12 अक्टूबर की सुनवाई में केंद्र सरकार ने अदालत को बताया था कि उसने चुनिंदा कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को MRP के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला किया है। सरकार के मुताबिक, इस कदम से मरीजों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होने की उम्मीद है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब दूसरी दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतों में भी बड़ा अंतर है, तो नियंत्रण केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित क्यों रखा जाए। अदालत ने सरकार से दवाओं की कीमतों को लेकर व्यापक व्यवस्था पर विचार करने को कहा था।
बाद में केंद्र सरकार ने 17 अक्टूबर को 137 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने की अधिसूचना जारी की। सरकार के अनुसार, इन दवाओं की MRP में मौजूदा कीमतों के आधार पर 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होनी हैं।
दवाओं की कीमतें तय करने में NPPA की क्या भूमिका है?
नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) केंद्र सरकार के अधीन दवाओं की कीमतों की निगरानी और नियंत्रण का काम करती है। मौजूदा व्यवस्था में निर्धारित सूची में शामिल दवाओं की कीमतों पर सीमा लागू होती है। वहीं, सूची से बाहर की कई दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है, हालांकि उनकी कीमतों में सालाना बढ़ोतरी पर नियम लागू होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल इसी व्यवस्था को लेकर हैं कि क्या दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि मरीजों को इलाज के लिए ज्यादा कीमत न चुकानी पड़े।
इलाज के खर्च में दवाओं की बड़ी हिस्सेदारी
दवाओं की कीमतों का मुद्दा इसलिए भी अहम है, क्योंकि इलाज का खर्च आम परिवारों के बजट पर भारी पड़ सकता है। स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (National Health Accounts) के 2019-20 के आंकड़ों के मुताबिक, कुल स्वास्थ्य खर्च में निर्धारित दवाओं पर करीब 18.50 प्रतिशत और बिना डॉक्टर के पर्चे के खरीदी जाने वाली दवाओं (OTC) पर करीब 3.47 प्रतिशत खर्च दर्ज किया गया था। ये आंकड़े कुल स्वास्थ्य खर्च के हिस्से को दर्शाते हैं, न कि हर मरीज के इलाज में दवाओं की हिस्सेदारी को।




