Suchitra Sen: आख़री साँस तक क्यों नहीं छोड़ा तन्हाइयों का दामन ,क्या ग़म था सुचित्रा सेन को !

SUCHITRA (1)

Legendary Actress Suchitra Sen :50 के दशक में अपनी अदाकारी और बेमिसाल ख़ूबसूरती से सबको अपना दीवाना बना देने वाली हिंदी और बंगाली फिल्मों की जानी मानी अभिनेत्री सुचित्रा सेन, के बारे में अक्सर बहोत सी बातें होती रहती हैं शायद इसलिए कि सिर्फ एक फ्लॉप फिल्म से वो इतना टूट गईं कि खुद को गुमनामी की धुंध में धकेल दिया और अजीब आख़री ख्वाहिश भी ज़ाहिर की। एक अहम वजह ये भी है कि उन्होंने शोमैन राजकपूर के साथ काम करने से मना कर दिया था ये कहकर कि उन्हें उनका अंदाज़ पसंद नहीं है और तो और उन्होंने फिल्म जगत के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार को ठुकरा दिया था पर क्यों ? अगर नहीं जानते तो आइये आज आपको बताते हैं।

सुचित्रा सेन भारतीय सिनेमा की ऐसी लीजेंड एक्ट्रेस थीं जो दमदार एक्टिंग ही नहीं अपने बेबाक अंदाज़ के लिए भी जानी जाती थीं उन्होंने कई बेमिसाल फिल्मों जैसे ‘देवदास’ और ‘आंधी’ के ज़रिये अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी।

15 साल में ही क्यों हो गई थी शादी :-

6 अप्रैल 1931 को बंगाल के सिराजगंज में जन्मीं सुचित्रा सेन का बचपन का नाम रोमादास गुप्ता था और वो पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं और एक खुशहाल ज़िंदगी जी रहीं थीं लेकिन तभी भारत की आज़ादी के बाद भारत-पाकिस्तान के बँटवारे को लेकर दंगे शुरू हो गए, और सुचित्रा के घर वालों को जान बचाकर भागना पड़ा और आपका पूरा परिवार पश्चिम बंगाल में आकर बस गया। ये वो हालात थे जब किसी को ज़िंदगी और मौत का भरोसा नहीं रहा था हर कोई अपने लिए सहारा ढून्ढ रहा था इसलिए सुचित्रा जब महज़ 15 साल की थीं तब उनके पिता जी ने यहाँ आते ही अपनी बेटी के भविष्य की चिंता करते हुए सुचित्रा की शादी एक नामी बिज़नेसमैन के बेटे दीबानाथ से करा दी थी ,यहां हम आपको ये भी बताते चलें कि सुचित्रा सेन की ही बेटी हैं,अभिनेत्री मुन मुन सेन।

रोमा से सुचित्रा कैसे बनीं :-


हमारी सुचित्रा यानी रोमा को गाने का बहोत शौक था और जब छोटी सी रोमा अपने पी के घर पहुँचीं तो पतिदेव ने उन्हें गाते हुए सुना और इतना प्रभावित हुए कि सीधा उन्हें फिल्म जगत के द्वार पर ले गए जहाँ उन्हें गाना तो गाने का मौका नहीं मिला पर उस वक़्त के मशहूर फिल्म निर्माता सुकुमार दासगुप्ता की नज़र उन पर पड़ गई जिन्होंने उनके अंदर अदाकारा बनने की काबिलियत को परखा और उनका स्क्रीन टेस्ट लिया और उनकी उम्मीदों पर खरी उतारते हुए रोमा ने टेस्ट पास भी कर लिया इसके बाद सुकुमार जी ने न केवल रोमा को अपनी फिल्म ‘सात नंबर कैदी’ दी बल्कि उनके असिस्टेंट नीतीश रॉय ने रोमा की सुन्दरता को देखते हुए उनका नाम बदलकर सुचित्रा सेन भी रख दिया और बस इसके बाद सुचित्रा सेन फिल्म जगत पर उभरते सितारे के रूप में जगमगाईं और साल 1953 में लगातार तीन फिल्में साइन कीं, जिसमें एक थी ‘काजोरी’, जिसका निर्देशन निरेन लाहिड़ी ने किया था वहीं दूसरी फिल्म थी ‘सारे चतुर’, जिसका निर्देशन निर्मल डे ने किया था इस फिल्म में उनके हीरो थे , उत्तम कुमार जिनके साथ सुचित्रा की जोड़ी को खूब पसंद भी किया गया और उनका नाम बंगाली सिनेमा की बड़ी एक्ट्रेस में गिना जाने लगा सुचित्रा की तीसरी फिल्म थी ‘भगवान श्री श्री कृष्ण चैतन्य’, जिसका निर्देशन देबकी बोस ने किया था।

सुचित्रा-उत्तम की आईकॉनिक जोड़ी :-

उत्तम कुमार बंगाली सिनेमा के महानायक कहे जाते थे और जब सुचित्रा सेन उनके साथ ‘सारे चतुर’ फिल्म में नज़र आईं तो लोगों ने न केवल सुचित्रा के भोले से चेहरे और एक्टिंग की तारीफ की बल्कि उनकी जोड़ी को भी आईकॉनिक जोड़ी घोषित कर दिया और निर्माताओं का इस पर ऐसा असर पड़ा कि उन्होंने इस जोड़ी को हिट की गारंटी मानते हुए क़रीब 20 साल तक उत्तम कुमार और सुचित्रा को लेकर कई फिल्में बनाई। इसी वजह से सुचित्रा ने अपने फ़िल्मी करियर की आधे से ज़्यादा क़रीब 30 फिल्में उत्तम कुमार के साथ की थीं।

सुचित्रा सेन का हिंदी फिल्मों तरफ रुख़:-

सुचित्रा कई भाषाओँ में माहिर थीं इसलिए बंगाली फिल्मों में एक ऊँचा मक़ाम हासिल करने के बाद सुचित्रा सेन ने हिंदी फिल्मों की तरफ रुख़ किया और साल 1955 में बिमल रॉय के निर्देशन में बनी फिल्म ‘देवदास’ से हिंदी सिनेमा में डेब्यू किया। हालाँकि इस फिल्म में पहले पारो का किरदार मीना कुमारी निभाने वाली थीं लेकिन उनके पति कमाल साहब ने मीना कुमारी को इस फिल्म में काम करने की इजाज़त नहीं दी और इसी वजह से बिमल रॉय ने सुचित्रा सेन को कास्ट किया और सुचित्रा ने वही किया जो अब तक वो अपनी फिल्मों में करती आ रहीं थीं जी हाँ उनकी ऐक्टिंग ने पारो के किरदार में जान डाल दी, उनके साथ फिल्म में दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की एक्टिंग ने चार चाँद लगाया और देवदास एक अनमोल कृति बन गई। इस फिल्म को लेकर एक बड़ी बात हुई जब चंद्रमुखी के रोल के लिए वैजयंतीमाला को बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला, लेकिन उन्होंने ये कहकर अवॉर्ड लेने से मना कर दिया कि उनका और सुचित्रा सेन का रोल फिल्म में बराबर था।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के किरदार में फूँके प्राण :-

सुचित्रा सेन ने कुल सात हिंदी फिल्मों में काम किया, जिसमें एक फिल्म ‘आँधी ‘ भी रही। इस फिल्म में उन्होंने भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का किरदार निभाया था, इस फिल्म के गाने बेहद लोकप्रिय हुए और आज भी सदाबहार गीतों की फेहरिस्त में शामिल हैं जैसे – ‘तेरे बिना ज़िंदगी से. ..’ और ‘तुम आ गए हो नूर आ गया है. .’बेबाकी ऐसी थी उनमें कि जिन शोमैन राजकपूर की फिल्मों की सब तारीफ़ करते नहीं थकते थे उनके साथ सुचित्रा ने काम करने से ही मना कर दिया था ,वो भी ये कहकर कि उन्हें उनका काम करने का तरीक़ा नहीं पसंद है या जो वो अपनी अभिनेत्री को दिखाना चाहते हैं वो वैसी नहीं दिखना चाहतीं।

क्यों नहीं लेने आईं दादा साहब फाल्के पुरस्कार:-

फिल्म जगत को इतनी सुपरहिट फिल्में देने के बाद सुचित्रा को अपनी काबिलियत पर इतना भरोसा हो गया था कि वो अपनी मेहनत के बल पर हर फिल्म को चला लेंगीं उसे फ्लॉप नहीं होने देंगीं लेकिन झटका तो उन्हें तब लगा जब साल 1978 में उनकी अभिनीत फिल्म आई ‘प्रणय पाशा’, फ्लॉप हो गई इसके बाद उन्होंने ख़ुद को सारी दुनिया की नज़रों से दूर कर लिया जाने क्यों वो इस बात के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानती रहीं उन्होंने इस तरह तन्हाई इख़्तेयार की कि जब साल 2005 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार के लिए चुना गया, तब भी वो पुरस्कार लेने नहीं पहुंचीं। गुमनामी में रहने का उनका ये फैसला जाने कैसे सुचित्रा ने लिया कि वो पत्थर की लकीर बन गया और इतना तवील होता गया कि 36 साल गुज़र गए फिर एक रोज़ यानी 17 जनवरी 2014 को उनके इस दुनिया से गुज़र जाने की ख़बर आई और तब भी उनके चाहने वाले उनका दीदार न कर सके क्योंकि उनकी अंतिम इच्छा का सबको सम्मान करना था जिसमें उन्होंने कहा था कि इस वक़्त भी कोई उनका चेहरा ना देखेगा।

उनकी नई पीढ़ी भी जुडी अभिनय से :-

सुचित्रा सेन ने ख़ुद को अभिनय से दूर कर लिया , जीते जी दुनिया से दूर रहकर खुद को सज़ा दी पर उनकी आने वाली पीढ़ियों ने अभिनय को अपनाया है बेटी मुन मुन सेन और उनकी दोनों बेटियाँ यानी सुचित्रा सेन की नातिन राइमा और रिया भी अभिनेत्री हैं राइमा सेन तो नानी की ही तरह हिंदी और बंगाली फिल्मों और अब सीरीज़ के लिए भी जानी जाती हैं वो ‘एकलव्य’ और ‘तीन पत्ती’ जैसी फिल्मों में अमिताभ बच्चन के साथ अभिनय कर चुकी हैं वहीं रिया सेन अभिनेत्री होने के साथ-साथ मॉडल भी हैं, और हिंदी, बंगाली, अंग्रेजी, तेलुगु, तमिल और मलयालम फिल्मों में दिखाई देती हैं।

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