Death Anniversary Of Music Director Ravi :रवि शंकर शर्मा हिंदी और मलयालम फ़िल्मों के ऐसे संगीतकार थे जिन्हें, फिल्म संगीत में महेन्द्र कपूर और आशा भोंसले को अपने संगीत के ज़रिये स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है, ये भी एक दिलचस्प बात है कि रवि की धुनों में रंगे गीत ,ब्याह-शादियों में गाए जाने वाले परंपरागत फिल्मी गीतों में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हुए ,’आज मेरे यार की शादी है’, ‘डोली चढ़के दुल्हन ससुराल चली’ और ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ जैसे फिल्मी गीत तो आज भी बैंड बाजे वालों के भी प्रिय गीतों में से हैं।
बिना संगीत की औपचारिक शिक्षा के बने पारखी :-
संगीतकार रवि 3 मार्च सन 1926 को दिल्ली में पैदा हुए थे उनके पिता जी भजन गाते थे और उन्हें सुनकर ही रवि को भी बचपन से सुरीली धुनें आकर्षित करती थीं गाने भी गाते थे क्योंकि दिली तमन्ना पार्श्व गायक बनने की ही थी पर इसके बावजूद रवि ने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली हाँ मोहम्मद रफ़ी उनके पसंदीदा गायक थे और उनके गानों से वो बहोत कुछ सीखा करते थे। इसी लगाव के चलते रवि सन 1947 में मोहम्मद रफी से मिलने गए जो उस वक़्त दिल्ली के फतेहपुर स्थित कोरोनेशन होटल में स्वतंत्रता दिवस समारोह ‘जश्न-ए-जम्हूरियत’ में गाने आए थे और जब उनसे मिले तो पूछा कि वो भी गायक बनना चाहते हैं तो इसके लिए कैसे रियाज़ करें तब मोहम्मद रफी ने उन्हें पहले बेसिक नोटेशन सीखने की सलाह दी थी इसके बाद रवि ने खुद हारमोनियम के साथ कुछ और साज़ भी बजाने सीखे।
गायक बनते बनते इलेक्ट्रिशियन बन गए :-
रवि के ऊपर पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी थी इसलिए अपने दिल में गायक बनने का अरमान संजोए , घर को सँभालने के लिए वो इलेक्ट्रिशियन बन गए जिससे घर खर्च तो चला पर उनका दिल बहोत परेशान हो गया था फिर सन 1950 में वो दिल्ली से मुम्बई रवाना हो गए जहाँ न उनके पास रहने का घर था और न ही पैसा। अपनी ज़्यादातर रातें तब वो मलाड स्टेशन पर बिताते थे।
हेमंत कुमार ने बनाया सहायक :-
एक दिन हेमंत कुमार ने उन्हें देखा और उनकी काबिलियत को परखने के बाद अपने साथ ले गए।उन्होंने पहले रवि से ‘आनन्द मठ’ फिल्म में ‘वंदे मातरम्’ गीत में कोरस गवाया और फिर उन्हें अपना सहायक निर्देशक बना लिया। यहाँ हम आपको ये भी बताते चलें कि ‘नागिन’ की सुपर हिट बीन वाली धुन रवि ने ही तैयार की थी, जो पहली बार ‘मेरा तन डोले, मेरा मन डोले’ में इस्तेमाल हुई थी।
पहली ही फिल्म में कर दिया कमाल :-
बतौर सहायक-निर्देशक का टैग हटाते हुए जब वो हेमंत दा से अलग हुए तो रवि की मुलाक़ात निर्माता-निर्देशक देवेन्द्र गोयल से हुई जो उन दिनों अपनी फ़िल्म ‘वचन’ के लिए संगीतकार की तलाश कर रहे थे। देवेन्द्र गोयल ने रवि की प्रतिभा को पहचान उन्हें अपनी फ़िल्म में बतौर संगीतकार काम करने का मौक़ा दिया और अपनी पहली ही फ़िल्म में रवि ने दमदार संगीत देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इस फिल्म में उन्होने तीन काम किये, पहला संगीत तो दिया ही, साथ ही साथ दो गीत “चंदा मामा दूर के” और “एक पैसा दे दे बाबू” की शब्द रचना की। इसके अलावा आशा भोसले के साथ एक युगल गीत “यूँ ही चुपके चुपके बहाने बहाने” को स्वर भी दिया। साल 1955 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘वचन’ में पार्श्वगायिक आशा भोंसले की आवाज़ में रचा बसा गीत ‘चंदा मामा दूर के पुआ पकाए भूर के…’ उन दिनों काफ़ी सुपरहिट हुआ और आज भी बच्चों और बड़ों के भी दिल के क़रीब है।
देवेन्द्र गोयल ने किया भरोसा :-
बस फिर क्या था इसके बाद रवि ने देवेन्द्र गोयल की सारी फिल्मों में संगीत देना शुरू कर दिया, जिनमें से कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं- ‘नई राहें’, ‘नरसी भगत’, ‘चिराग़ कहाँ रोशनी कहाँ’, ‘एक फूल दो माली’ और ‘दस लाख’, इन सभी फिल्मों की सफलता के बाद रवि कुछ हद तक फिल्म संगीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए। अपने वजूद को तलाशते रवि को फ़िल्म इंडस्ट्री में सही मुक़ाम पाने के लिए क़रीब पाँच साल का इंतज़ार करना पड़ा था। इस बीच उन्होंने ‘अलबेली’, ‘प्रभु की माया’, ‘अयोध्यापति’, ‘देवर भाभी’, ‘एक साल’, ‘घर संसार’, ‘मेंहदी’ जैसी कई दोयम दर्जे की फ़िल्मों के लिए भी संगीत दिया, लेकिन इनमें से कोई फ़िल्म टिकट खिड़की पर सफल नहीं हुई।
‘चौदहवी का चांद’ फिल्म से चमका सितारा :-
रवि की क़िस्मत का सितारा वर्ष 1960 में प्रदर्शित निर्माता निर्देशक गुरुदत्त की क्लासिक फ़िल्म ‘चौदहवी का चांद’ से चमका। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फ़िल्म की कामयाबी ने रवि को बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया। आज भी इस फ़िल्म के सदाबहार गीत दर्शकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। संगीत निर्देशन में रवि ने सफलता की बुलंदी को छुआ। उनकी ज़्यादातर फिल्में म्यूज़िकल हिट रहीं। इस वक्त वो साहिर लुधियानवी को गीतकार के रूप में लेते थे और उनकी जोड़ी ने कई यादगार गीत निर्मित किये हैं। रवि ही एकमात्र ऐसे संगीतकार थे। जो पहले गीत लिखवाते थे फिर उन्हें संगीतवद्ध करते थे। जिस कारण उनके बनाये तक़रीबन सभी गीत अत्यधिक कर्णप्रिय और लोकप्रिय रहे।
बेमिसाल धुनों को सजोती फिल्म :-
इसके बाद रवि ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और दिल्ली से गायक बनने का सपना लेकर आया युवक रवि शंकर शर्मा हिन्दी फिल्मों का मशहूर संगीत निर्देशक रवि बन गया। ‘चाइना टाउन’, ‘गुमराह’, ‘ख़ानदान’, ‘व़क्त’, ‘फूल और पत्थर’, ‘हमराज’, ‘आँखेंं’, ‘नील कमल’, ‘एक फूल दो माली’, ‘घर संसार’, ‘मेहंदी’, ‘चिराग़ कहाँ रोशनी कहाँ ’, ‘नई राहें’, ‘चौदहवीं का चाँद ’, ‘घूंघट’, ‘घराना’, ‘चाइना टाउन’, ‘आज और कल’, ‘गुमराह’, ‘गृहस्थी’, ‘काजल’, ‘ख़ानदान’, ‘वक्त’, ‘दो बदन’, ‘फूल और पत्थर’, ‘सगाई’, ‘हमराज’, ‘आँखेंं’, ‘नील कमल’, ‘बड़ी दीदी’, ‘एक फूल दो माली’, ‘एक महल हो सपनों का’। ‘निकाह’ जैसी कुछ ख़ास फिल्मों को अगर हम याद करें तो रवि के संगीतबद्ध किए ,नगीनों के मानिंद बेश कीमती नग़्में हमारी आखों में झिलमिला उठेंगे।
पद्मश्री पुरस्कार से हुए सम्मानित :-
फिल्म ‘निकाह’ उनकी आखरी फिल्म थी ,इसके सभी गाने सुपर हिट थे। रवि ने हिन्दी फिल्मों के अलावा तमिल, तेलुगु, मलयालम और गुजराती भाषाओं में 250 से अधिक फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया और क़रीब 14 मलयालम फिल्मों में भी संगीत दिया यहाँ उनकी पहली फिल्म ‘पंचाग्नि’ थी। उन्होंने घराना (1961) और खानदान (1965) के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार जीते। वर्ष 1971 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री देकर सम्मानित किया। दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के संगीत के लिए भी वहाँ के राज्य पुरस्कार और राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा और भी कई पुरस्कार और सम्मान हासिल किए।
मलयालम फिल्म से की थी वापसी :-
रवि ने एक दशक के लम्बे अंतराल के बाद 80 के दशक में बॉम्बे रवि के नाम से’ मलयालम फिल्मों में संगीत निर्देशक’ के रूप में वापसी की थी। उनके दो अंतिम उल्लेखनीय सम्मान मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दिया जाने वाला ‘लता मंगेशकर पुरस्कार’ और मालवा रंगमंच समिति द्वारा दिया जाने वाला ‘कवि प्रदीप शिखर सम्मान’ था।
संगीतकार रवि लम्बी बीमारी के बाद 86 वर्ष की उम्र में 7 मार्च, 2012 को इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए उनके जाने से ,एक सुर संगीत और लय के परखी को हमने खो दिया। रवि एक मुकम्मल संगीतकर थे। उनमें कविता और शायरी की समझ भी थी। इसीलिए उनके गीत जीवंत बन सके। मेलोडी में तो उनका कोई सानी था ही नहीं। उनके संगीत निर्देशन में गायक या गायिका की आवाज़ हमेशा एक अनोखे अंदाज़ में उभर के आती थी यूं लगता था कि मानो वो धुन उसी आवाज़ के लिए बनी है ,फिर चाहे आप उनका ‘वचन’ फिल्म का गीत ही सुन लीजिए। फ़िल्मों में उन्होंने संगीत ही नहीं दिया बल्कि गाने भी लिखे और कुछ गाने गाये भी और ये तीनों किरदार ज़बर्दस्त अंदाज़ से निभाए। उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया, वो अपनी मेहनत और काबिलियत के बलबूते पर किया। ज़िंदगी के हर एहसास को अपने संगीत में पिरोने वाले रवि हमेशा हमारे दिलों में जवेदाँ रहेगें।
