Santan Saptmi Vrat – कैसे करें संतान सप्तमी में चूड़ी की पूजा – इस व्रत को संतान वती माताएं करती है, इसमें ठंडा दूध दही पुआ का प्रसाद लगता है और उन्हीं की पूजा होती है सबसे ज्यादा महत्व चांदी की चूड़ी के पूजन का है जो हर वर्ष महिलाएं नई खरीद कर पहनती हैं। संतान सप्तमी व्रत कथा के अनुसार चांदी की चुड़ी को पूजने और पहनने की परंपरा है लेकिन इसे महिलाएं अपनी अपनी सामर्थ्य से सोने की चूड़ी से लेकर चांदी,तांबां,सात गांठें लगा हुआ धागा और दूर्वा की चूड़ी का पूजन कर भी व्रत करती हैं। व्रत का आध्यात्मिक संदेश है सामाजिक और पारिवारिक समरसता तथा मानवीय रिश्तों में मजबूती। इस दिन लक्ष्मी गणेश सहित शिव परिवार की पूजा तो होती ही है विशेष महत्व पान के पत्ते पर सिंदूर व घी से उकेरी गईं दुबड़ी महारानी जिन्होंने एक परिवार के छः मृत्यु को प्राप्त पुत्रों के न सिर्फ़ प्राण वापस लौटाए बल्कि सातवें पुत्र पर आरहे जान लेवा संकट के संदेह से भी रक्षा कर प्राणों की रक्षा की थी और सांप को फंदे में फंसा कर उसकी पत्नी से सारे बेटों को मांग लिया था। संतान सप्तमी व्रत कथा में चांदी के चूड़ी वही फंदा मानकर महिलाएं इसे पूंजती है और अपने बच्चों की सुरक्षा का कवच मानकर हमेशा हाथ में पहनती हैं। आइए जानें चूड़ी को पूजने का सही तरीका।
संतान सप्तमी की चूड़ी की सही व सरल पूजा विधि
यह विधि काम काजी महिलाओं के लिए काफी उपयोगी है। करना सिर्फ़ इतना है कि चूंड़ी खरीदने के बाद किसी भी मंदिर में या पंडित से व्रत का संकल्प उसी दिन ले लें जब चूड़ी खरीदें। घर आकर चूड़ी घर के मंदिर में रख दें और संतान सप्तमी के दिन सात आटे व गुड़ के पुआ बना लें उन्हें ठंडा करें फिर ठंडा गाय का दूध-दही,याद रहे दूध कच्चा ही रहे पकाना नहीं है
अलग-अलग कटोरी में रख दें। सामान्य पूजा की तरह , पूजा की थाली सजाएं और घर के मंदिर या पूजा स्थल पर श्रीफल कलश एक पाटे पर स्थापित करें। पूजा से पहले चूड़ी दही की की कटोरी में डुबोकर रखें और पूजा प्रारंभ करें। सबसे पहले घर के मंदिर में विराजमान सभी देवी-देवताओं की नियमित पूजा से शुरू करें फिर दुबड़ी महारानी का विधिवत पूजन कर श्रृंगार,फल, फूल अर्पित करें। इसके बाद दही की कटोरी से चूड़ी निकाल कर एक अलग कटोरी में रखें और उसे कच्चे दूध से अभिषेक करें, फिर गंगा जल,शहद, गुलाब जल से चूड़ी का अभिषेक कर अंत में साफ शुद्ध जल से नहलाकर साफ सफ़ेद कपड़े से पोंछ कर पुआ के ऊपर रखें और पुआ व चांदी की चूड़ी का विधिवत पूजन करें।

चंदन, हल्दी, सिंदूर,अक्षत फूल और वस्त्र की जगह गड़ा चढ़ाएं जबकि दूर्वा की चूड़ी माता चुबड़ी के चरणों में रखकर अपने बच्चों के कुशलक्षेम की प्रार्थना करें। फिर कथा सुनने के बाद पंडित, बुजुर्ग माता-पिता, कन्या या अपनी पड़ोसी मित्रों से पूआ अपने आंचल में लें जबकि आसें प्रसाद के रूप में बांट दें। यह चूड़ी अगली संतान सप्तमी तक पहने नई चूड़ी पहनने के बाद पुरानी उतारने की परंपरा है जिसका हो सके तो निर्विवाद निर्वाह करें क्योंकि माना जाता है जो इस नियम का पालन करता है संतान सप्तमी व्रत के पुण्य प्रताप से ये चूड़ी संतान की सुरक्षा कवच साबित होती है जबकि साइंटिफिक रीज़न की बात करें तो यह अपनों की परवाह और प्रेम प्रदर्शित करने का एक आध्यात्मिक तरीका है जो तत्कालीन समय और आज भी पारिवारिक वातावरण को सौम्यता प्रदान करने में कारगर साबित होता है।
संतान सप्तमी की चूड़ी
यह प्रतिवर्ष नई खरीद कर या उसी चूड़ी में थोड़ी और चांदी डलवा कर पहनी जाती है। क्योंकि इस पूजा में विषम संख्या का महत्व बताया गया है अतः इस चूड़ी को भी सवाया बनवाया जाता है। इस में मौत के मुंह से लौटे और मृत्यु की घात से बचें पुत्र के स्वरूप मानकर चूड़ी में सात लकीरें उभारी जाती है जो सुनार ही उकेर कर देता है इसके बिना संतान सप्तमी कि चूड़ी पवित्र या इस दिन के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती।
विशेष – यह की पुराने समय में महिलाऐं ऐसी तरह सी आर्थिक रूप से खुद को मजबूती देती थीं शायद यही वजह है की इस मान्यता को आध्यात्म से जोड़ा जबकि इसे परम्परा को या त्योहार को मनाने के लिए अपनी समर्थता से सोने – चांदी के अलावा ताम्बा और सात गांठो का धागा बांध कर भी पूजा की जाने का उपाय भी बताया गया के जो सामाजिक समानता का सन्देश है।