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ऋषि पंचमी 2026: पकहा में सप्तऋषियों संग अरुंधती की पूजा, जानिए 108 बार चिचिरा दातुन स्नान की पूरी विधि और कथा

ऋषि पंचमी

ऋषि पंचमी

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत सनातन धर्म में आत्म-शुद्धि, श्रद्धा और तपस्या का एक अनूठा प्रतीक है। इस वर्ष पकहा क्षेत्र में ऋषि पंचमी का त्योहार पूरे धार्मिक नियम और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। महिलाएं प्रातःकाल से ही पवित्र नदियों, तालाबों और जलाशयों में एकत्र होकर इस पावन व्रत की परंपराओं का पालन करती हैं।

यह पर्व मुख्य रूप से अनजाने में हुई भूलों, मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुए स्पर्श (रजोस्वला दोष) तथा हरितालिका तीज के दौरान हुई गलतियों के प्रायश्चित के लिए रखा जाता है। इसमें मानव सभ्यता को सही मार्ग दिखाने वाले सप्तऋषियों और उनके साथ माता अरुंधती की विशेष पूजा की जाती है।

ऋषि पंचमी का धार्मिक महत्व और रजोस्वला दोष निवारण

ऋषि पंचमी का व्रत केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि यह शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धिकरण का संकल्प है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाओं द्वारा दैनिक जीवन में या मासिक धर्म के दौरान अनजाने में कई तरह की धार्मिक अशुद्धियां हो जाती हैं। इन अनजानी गलतियों के ऋणात्मक प्रभावों को दूर करने और परिवार की सुख-शांति बनाए रखने के लिए ऋषि पंचमी का व्रत अचूक माना गया है।

इस दिन महिलाएं अपने और अपने परिवार द्वारा जाने-अनजाने में किए गए पापों से क्षमा मांगती हैं। यह दिन वैदिक संस्कृति के महान आचार्यों और ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी एक माध्यम है।

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108 बार चिचिरा दातुन से स्नान की विशेष परंपरा

पकहा तथा आसपास के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में ऋषि पंचमी पर चिचिरा (जिसे अपामार्ग या लटजीरा भी कहा जाता है) की दातुन का उपयोग करने की प्राचीन परंपरा है।

सप्तऋषि और माता अरुंधती की पूजा विधि

स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र किया जाता है। चौक पूर कर उस पर हल्दी, चंदन और रोली से सप्तऋषियों की स्थापना की जाती है।

सप्तऋषियों के नाम:

  1. ऋषि कश्यप
  2. ऋषि अत्रि
  3. ऋषि भारद्वाज
  4. ऋषि विश्वामित्र
  5. ऋषि गौतम
  6. ऋषि जमदग्नि
  7. ऋषि वशिष्ठ

सप्तऋषियों के साथ महर्षि वशिष्ठ की परम पतिव्रता पत्नी माता अरुंधती की भी विशेष पूजा की जाती है। उन्हें ज्ञान, भक्ति और आदर्श गृहस्थ जीवन की देवी माना जाता है। पूजा में धूप, दीप, गंध, पुष्प, फल, और पंचामृत अर्पित किया जाता है।

व्रत के नियम: बिना हल जुते अनाज और सामक चावल का सेवन

ऋषि पंचमी व्रत में खान-पान से जुड़े नियम बेहद कड़े और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं:

ऋषि पंचमी की प्रामाणिक व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहते थे। उनकी एक पुत्री थी जो असमय विधवा हो गई। दुखी होकर ब्राह्मण दंपति अपनी पुत्री के साथ गंगा तट पर निवास करने लगे।

एक दिन पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ने लगे। दुखी होकर ब्राह्मण ने ध्यान लगाकर इसके पीछे का कारण जाना। उन्होंने देखा कि पूर्व जन्म में उनकी पुत्री ने मासिक धर्म के दौरान अनजाने में रसोई घर का काम किया था और बर्तन छू लिए थे। इस जन्म में भी उसने ऋषि पंचमी का प्रायश्चित व्रत नहीं किया था, जिसके कारण उसे यह कष्ट सहना पड़ा।

पिता के निर्देश पर पुत्री ने पूरी निष्ठा से ऋषि पंचमी का व्रत किया, 108 बार चिचिरा दातुन से स्नान किया और विधि-विधान से सप्तऋषियों की पूजा की। इस व्रत के प्रभाव से उसके सारे पाप नष्ट हो गए और उसे सभी शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिल गई।

एक अन्य मान्यता में यह भी बताया गया है कि पूर्व जन्म के दोषों के कारण एक ब्राह्मण की पत्नी कुतिया और ब्राह्मण बैल बने थे। उनके पुत्र ने ऋषि पंचमी का व्रत कर उसका पुण्य अपने माता-पिता को दान किया, जिससे उन्हें पशु योनि से मुक्ति मिली।

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FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

ऋषि पंचमी के दिन चिचिरा दातुन का प्रयोग क्यों किया जाता है?

उत्तर: चिचिरा (अपामार्ग) को अत्यंत पवित्र और औषधीय पौधा माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, 108 बार चिचिरा से दातुन और स्नान करने से शरीर के विषाक्त तत्व दूर होते हैं तथा मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुए स्पर्श और अशुद्धियों का दोष समाप्त हो जाता है।

ऋषि पंचमी की पूजा में किन सात ऋषियों की पूजा होती है?

उत्तर: ऋषि पंचमी की पूजा में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ—इन सात महान ऋषियों की पूजा की जाती है। इनके साथ ऋषि वशिष्ठ की पत्नी माता अरुंधती की भी विशेष रूप से पूजा की जाती है।

क्या ऋषि पंचमी पर सामान्य चावल या गेहूं खा सकते हैं?

उत्तर: नहीं, ऋषि पंचमी के व्रत में हल से जुते हुए खेत में उगाए गए अनाज जैसे गेहूं या सामान्य चावल का सेवन वर्जित होता है। इस दिन केवल बिना हल से जोती भूमि पर उगने वाले सामक के चावल (मोरधन) और कंद-मूल का ही सेवन किया जाता है।

क्या पुरुष भी ऋषि पंचमी का व्रत रख सकते हैं?

उत्तर: हां, हालांकि यह व्रत मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा रखा जाता है, लेकिन पुरुष भी अनजाने में किए गए पापों के प्रायश्चित, मानसिक शांति और सप्तऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस व्रत को पूरी निष्ठा के साथ रख सकते हैं।

ऋषि पंचमी का मुख्य धार्मिक उद्देश्य क्या है?

उत्तर: ऋषि पंचमी का मुख्य उद्देश्य जाने-अनजाने में हुए पापों, विशेष रूप से रजोस्वला काल में हुई धार्मिक अशुद्धियों और हरितालिका तीज की भूलों का प्रायश्चित करना है। यह व्रत महिलाओं को शारीरिक और मानसिक शुद्धि प्रदान कर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।

ऋषि पंचमी का यह पावन पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने, जीव-दया अपनाने और अपनी भूलों का सहर्ष प्रायश्चित करने की सीख देता है। पकहा में निभाई जा रही यह प्राचीन परंपरा हमारी समृद्ध सांस्कृतिक और वैदिक विरासत का जीवंत प्रमाण है।

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