Rani Ajab Kunwari Story: भारतीय इतिहास में जब भी कृष्णभक्ति की बात होती है, तो मीराबाई का नाम सबसे पहले स्मरण में आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मेवाड़ की उसी कृष्णभक्ति परंपरा में एक ऐसी राजकुमारी भी हुईं, जिनका विवाह विंध्य की धरती में, बांधवगढ़ यानी रीवा के महाराज भाव सिंह से हुआ था? उनका नाम था महारानी अजब कुंवरि। शायद बहुत कम लोगों को यह बात पता हो, वह परमकृष्ण भक्त थीं और मीराबाई की तरह ही कविताएं भी रचती थीं। तो चलिए आज के विडिओ में हम विंध्य और रीवा की मीराबाई; अजबकुंवरि के बारे में जानते हैं।
कौन थीं महारानी अजब कुंवरि | Who was Queen Ajab Kunwari?
महारानी अजब कुंवरि मेवाड़ के पराक्रमी महाराणा राज सिंह की कन्या थीं। उनके नामकरण को लेकर भी एक रोचक जानकारी राजस्थान के सुप्रसिद्ध इतिहासकार और विद्वान डॉ श्रीकृष्ण ‘जुगनू’ जी के माध्यम से हमें प्राप्त होती है। बहुत कम लोगों को यह बात पता है, कि महाराणा प्रताप की पत्नी का नाम भी अजब दे था। वह भी परम कृष्णभक्त थीं और कठिन से कठिन परिस्थितियों में छितु भट्ट से भागवत सुना करती थीं। उन्होंने अपने पुत्र अमर सिंह और पौत्र करण सिंह का शासन भी देखा था। बाद में जब करण सिंह के पुत्र, जगत सिंह के पौत्री हुई, तो उन्होंने अपने पिता की दादी अजबदे के नाम से ही, अपनी पौत्री का नाम अजब कुंवरि रखा। यही अजब कुंवरि आगे चलकर रीवा की महारानी बनीं। विवाह के बाद वह कृष्ण भक्त की अनुरागिनी सौ सखियों को उदयपुर से साथ लेकर यहाँ रीवा आईं थीं।
रानी अजब कुंवरि के विवाह का ऐतिहासिक प्रसंग
राजप्रशस्ति के अनुसार, राणा राज सिंह की पुत्री अजबकुंवरि का विवाह संवत 1721 के मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को बांधवगढ़-रीवा के महाराज अनूप सिंह के पुत्र भाव सिंह के साथ हुआ था। इसी प्रशस्ति के अनुसार, इस शुभ अवसर पर राणा राज सिंह के राजवंश और उनके आत्मीय संबंधियों की, 98 अन्य कन्याओं का विवाह भी, बारात में आए क्षत्रिय कुमारों के साथ हुआ था। इस पूरे विवाह प्रसंग में एक और रोचक घटना का उल्लेख मिलता है। प्रशस्ति के अनुसार, बांधवगढ़ यानी रीवा से आए क्षत्रिय अस्पर्श-भोजी थे। अर्थात वे अपने खान-पान और सामाजिक मर्यादाओं को लेकर इतने सख्त थे कि किसी अन्य के साथ एक ही पंगत में बैठकर भोजन नहीं करते थे। ऐसे में जब महाराणा राज सिंह स्वयं बारातियों के साथ भोजन करने के लिए पंगत में बैठे, तो एक अनोखी स्थिति पैदा हुई। लेकिन बारातियों ने सहर्ष कहा- राणा राज सिंह का अन्न तो स्वयं भगवान जगन्नाथ राय का प्रसाद है। इसके बाद महाराणा राज सिंह ने सभी नवविवाहित वरों को घोड़े, हाथी और बहुमूल्य आभूषण उपहार स्वरूप प्रदान किए। राजप्रशस्ति में यह भी उल्लेख मिलता है कि बाद में जब राजसमुद्र नाम की विशाल झील का निर्माण पूरा हुआ, तब महाराणा राज सिंह ने, रीवा नरेश भाव सिंह के लिए एक हाथी, दो घोड़े और बहुमूल्य जरी वस्त्र उपहार के रूप में भेजे थे।
मीराबाई की तरह कृष्णभक्त थीं रानी अजब कुंवरि
अपने कुल की परंपरा के अनुरूप अजबकुंवरि परम कृष्णभक्त थीं। बचपन से ही उनका मन श्रीकृष्ण की भक्ति में रमा रहता था। कहा जाता है कि वे प्रतिदिन श्रीकृष्ण को पत्र लिखती थीं और उनसे मेवाड़ आने का आग्रह करती थीं। वह अपने पत्रों में तर्क देते हुए कहती थीं- मीराबाई सा आपको ढूंढती फिरती थीं, लेकिन मैं तो अबोध बच्ची हूँ, मैं आपको कहाँ ढूँढ़ू, आपको तो मेवाड़ ही आना पड़ेगा। पत्र लिखने के बाद वे उसे श्रीविग्रह के पास रख देती थीं। मीरा की तरह उन्हें भी दृढ़ विश्वास था कि उनके कान्हा पत्र पढ़ेंगे, उनकी पुकार सुनेंगे और एक दिन उनके निमंत्रण को स्वीकार करके मेवाड़ अवश्य आएंगे। अजब कुंवरि केवल कृष्ण की उपासक ही नहीं थीं, बल्कि वे स्वयं कृष्णभक्ति की कवयित्री भी थीं। उन्होंने अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण को पदों के माध्यम से अभिव्यक्त किया।
कविताएं भी लिखती थीं रानी अजब कुंवरि
उनके द्वारा रचे गए कुछ पदों की जानकारी हमें डॉ श्रीकृष्ण ‘जुगनू’ के माध्यम से प्राप्त हुए हैं, जो अजब कुंवरि की भक्ति और उनके काव्यात्मक व्यक्तित्व की एक दुर्लभ झलक प्रस्तुत करते हैं।
“नाथ! निवेदन हमरो मानो।
पतियां पढ़कर तनिक बिचारो,
हमरे मन की जानो।।
मिसरी हमकू फीकी लागे,
रस बिन इक इक दानो।
दधि बिन स्वाद, दूध नहीं मीठो
ना नवनीत ही खानो।
अजबकुंवर की बिनती पाती
कहो कि किस दिन आनो।।”
यह पद अजब कुंवरि की कृष्णभक्ति का बहुत सुंदर उदाहरण है। इसमें विनय, आत्मीयता और प्रतीक्षा के भाव एक साथ दिखाई देता है। इन पंक्तियों में एक राजकुमारी का राजसी वैभव नहीं, बल्कि एक ऐसी भक्त का हृदय दिखाई देता है, जिसके लिए संसार की सारी मिठास भी उसके कान्हा के बिना फीकी पड़ चुकी थी। और इस पद की आखिरी पंक्ति- “कहो कि किस दिन आनो”, मानो अजब कुंवरि की पूरी जिंदगी की प्रतीक्षा को एक ही सवाल में समेट देती है।
अजब कुंवरि के बुलाने पर मेवाड़ आए श्रीकृष्ण
उनकी यह भक्ति-भाव की प्रतीक्षा एक दिन सुफल भी हुई। औरंगजेब के शासनकाल में जब मथुरा और ब्रज क्षेत्र के अनेक मंदिरों पर संकट आया, मूर्तियों को तोड़ा जाने लगा। तो उस समय वहाँ वल्लभाचार्य-विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित पुष्टिमार्ग की परंपरा का प्रभाव था, जिसके आराध्य श्रीनाथ जी थे, उनके बारे में यह विश्वास था, यह मूर्ति गोवर्धन पर्वत से प्रकट हुई थी। तब पुष्टिमार्ग की परंपरा से जुड़े दामोदर वैरागी श्रीनाथजी के विग्रह को सुरक्षित लेकर मेवाड़ की ओर आए। श्रीनाथजी का विग्रह जब मेवाड़ के सिहाड़ गांव पहुंचा, तो महाराणा राज सिंह स्वयं श्रीनाथजी के स्वागत के लिए वहां गए। कुछ भक्ति परंपरा के ग्रंथों के अनुसार अजब कुंवरि भी उनके साथ थीं। जिसने बचपन से अपने कान्हा को पत्र लिखकर मेवाड़ आने का निमंत्रण दिया था, आखिरकार उन्हीं के श्रीनाथजी स्वरूप का विग्रह ब्रजभूमि मथुरा से मेवाड़ की धरती पर आ पहुँचा था। एक भक्त के लिए इससे बड़ा संयोग और क्या हो सकता था? मेवाड़ की लोककथाओं और पुष्टिमार्गीय परंपरा के अनुसार तो एक प्रचलित गीत भी इस बात की पुष्टि करता है-
“अजब कुंवरि ने पाती भेजी रथ पर कीन्हि सवारी जी
वीरभूमि मेवाड़ पधारो जय-जय मंगलकारी जी”
रीवा में अजब कुंवरि ने किए कई लोक कल्याणकारी कार्य
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि रीवा से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों में महारानी अजब कुंवरि की कृष्णभक्ति का जिक्र नहीं मिलता, लेकिन उनके धर्मिक और लोक परोपकारी स्वभाव और कार्यों का जिक्र जरूर जरूर होता है। इतिहासकारों के अनुसार रीवा महाराज भाव सिंह की 19 पत्नियां थीं, इनमें से महारानी अजब कुंवरि का स्थान सर्वोच्च था। उन्होंने लोकहित में रीवा शहर के मध्य एक सरोवर का निर्माण करवाया था, जो आज रानी तालाब के नाम से जाना जाता है। तालाब के बीचों-बीच भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर का निर्माण भी उन्होंने करवाया था। माना जाता है कि महारानी स्वयं नाव से तालाब के मध्य स्थित मंदिर तक जाती थीं और भगवान शिव के दर्शन करती थीं। इसके अलावा रीवा के बासिनपुरबा, अर्थात वर्तमान गुढ़ चौराहे के पास, महारानी अजब कुंवरि द्वारा एक भव्य और कलात्मक बावड़ी तथा कोठी का निर्माण भी करवाया था, बावड़ी आज भी अपेक्षाकृत अच्छी स्थित में है और अपने संरक्षण की बाँट जोह रही है।
अखाड़ाघाट में है रानी अजब कुंवरि की समाधि
रीवा में महाराज भाव का शासनकाल 1666 से 1694 तक माना जाता है, बताया जाता है उनके निधन के बाद, उस समय की परंपरा के अनुसार महारानी अजब कुंवरि अपने पति के साथ सती हो गईं थीं। इस बात की पुष्टि महोपाध्याय कविराज श्यामलदास द्वारा रचित ऐतिहासिक ग्रंथ वीर-विनोद से भी होती है। बिछिया नदी के किनारे स्थित अखाड़ाघाट में महारानी और महाराज की छतरी और चबूतरा एक दूसरे से नजदीक स्थित हैं।
रीवा और विंध्य के लोग उनकी भक्ति से अनभिज्ञ
शायद यही अजब कुंवरि की कहानी की सबसे सुंदर बात है, जिस कृष्ण को वे बचपन में पत्र लिखकर अपने पास बुलाया करती थीं, उसी कृष्ण की भक्ति को अपने हृदय में लेकर वह रीवा की धरती पर आईं और अपना जीवन जिया। आज सदियों बाद भी रीवा के मंदिर, बावड़ी और तालाब इत्यादि के रूप में महारानी अजब कुंवरि की कहानी कहीं न कहीं जीवित है। हालांकि उनकी कृष्णभक्ति से हम विंध्य और रीवा के लोग अभी तक अनभिज्ञ थे। मेवाड़ और श्रीनाथ जी की परंपरा में वह भक्त शिरोमणि हैं और उनका नाम युगों-युगों तक अमर रहेगा।




