Rewa Transport History | जब साइकिल चलाने के लिए लगता था लाइसेंस!

Rewa Transport History In Hindi: आज पूरा रीवा और विंध्यक्षेत्र सड़क, रेलवे और हवाई तीनों परिवहन सेवाओं के साथ अच्छी तरह जुड़ गया है। यात्रा के सभी साधन यहाँ उपलब्ध हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है, आज से करीब सौ साल पहले यहाँ के लोगों के पास परिवहन की क्या सुविधा थी? यहाँ साइकल चलाने के लिए लगता था लाइसेंस। आवागमन के क्या साधन थे? और रीवा एवं विंध्य में आधुनिक परिवहन सुविधाएं कब और कैसे प्रारंभ हुईं और इनका इतिहास क्या है?

बैलगाड़ी थीं लाइफ लाइन

सड़कों के आभाव में करीब एक सदी पहले तक यहाँ पर यात्रा का सबसे प्रमुख साधन पैदल चलना ही था। गाँव से कस्बों और राजधानी रीवा तक लोग पैदल ही आते-जाते थे। पर अनाज एवं माल की ढुलाई और उनके परिवहन के लिए बैलगाड़ी ही सबसे प्रमुख साधन था, इसके अलावा छकड़े भी चलते थे। जबकि सम्पन्न लोग घोड़े से चलते थे और उनके घरों की स्त्रियाँ पालकी में। लेकिन समान ढोने के लिए बैलगाड़ी ही चलती थी, तो यह कह जाए बैलगाड़ी उस समय की लाइफ-लाइन थीं तो गलत नहीं होगा। राज्य के जंगली क्षेत्र में बैलगाड़ी की जगह छोटे आकार के गाड़ा चलते थे, जिनमें माल लादने के लिए बड़े आकार का टोकरा धरा होता था।

1870 में बनी रीवा राज्य की पहली सड़क

लेकिन फिर यहाँ धीरे-धीरे सड़कों का निर्माण होने लगा, पहली पक्की सड़क यहाँ रीवा से सतना के बीच में 1870 में महाराज रघुराज सिंह के समय बनी थी, क्योंकि सतना में उस समय बघेलखंड पॉलिटिकल एजेंट का दफ्तर हुआ करता था और सतना में स्टेशन बनने के बाद यहाँ आवाजाही ज्यादा हो गई थी। इसके बाद 1882 में रीवा राज्य में लोक निर्माण विभाग की स्थापना की गई और मिस्टर हैरिस नाम के ब्रिटिश इंजीनयर के नेतृव में यहाँ कई सड़कों निर्माण 1886 तक हो गया। महाराज व्यंकट रमण सिंह के समय तक और भी सड़कों का निर्माण हुआ, जिसके बाद आवागमन थोड़ा और सुगम हुआ। इसके बाद रीवा तथा रियासत के दूसरे शहरों में कमानीदार रबर के पहियों वाली गाड़ियां यहाँ-वहाँ दिखने लगी, महाराज साहब रीवा के पास भी कई मोटरगाड़ियां थीं। पर साधारण लोग अभी भी पारंपरिक साधनों छकड़ों और बिना कमानीदार वाले सिगरम से ही चल रहे थे। हालांकि राज्य के दक्षिण पहाड़ी क्षेत्र में गाड़ी-छकड़ों के स्थान पर टट्टूओं का प्रयोग ज्यादा किया जाता था।

1924 में चली लॉरी

लेकिन इसके बाद एक बड़ा परिवर्तन आया जब रीवा राज्य में लॉरी अर्थात बस सुविधा की शुरुआत हुई। महाराज गुलाब सिंह के समय में, रीवा राज्य में बस सेवा की शुरुआत वर्ष 1924 में, एक बड़े महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना के रूप से प्रारंभ में हुई। रीवा रियासत में ठेकेदारी का कार्य करने वाले रामचरण ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए ट्रेनों की आवाजाही के कारण व्यापारिक रूप से उभर रहे सतना में, एक निजी परिवहन मेसर्स की स्थापना की। इसके तहत पहली बार राज्य में सतना से राजधानी रीवा के बीच लॉरी संचालन प्रारंभ किया गया। उसके बाद सुप्रसिद्ध व्यापारी रामचरण मन्नूलाल खत्री ने सतना से पन्ना के बीच भी लॉरी चलवाई। यह केवल एक व्यापारिक उपक्रम नहीं था, बल्कि पूरे राज्य में एक बड़े सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की शुरुआत थी। हालांकि हम बस कह रहे हैं, तो आप आज की बसों के जैसे मत सोचिएगा यह तब बहुत अलग होती थीं, जिन्हें लॉरी कहा जाता था।

रीवा के सुप्रसिद्ध विद्वान रवीरंजन सिंह अपनी किताब “रीवा तब अउर अब” के पृष्ठ क्रमांक 125 में लिखते हैं- “सन 1924- सरबे सेटिलमेंट दफ्तर सतना चला गा औ इहै बरिष ते, मे. रामचरण ठेकेदार सतना से हमरे हियाँ तक औ रामचरण-मुन्नूलाल खत्री सतना ते पन्ना तक लॉरी चलबाइन।”

लाल बलदेव सिंह लाए थे पहली साइकल

19वीं शताब्दी में रीवा राज्य में साइकलें आनी भी प्रारंभ हो गईं, जिन्हें यहाँ बाइसिकिल कहा जाता था। रीवा राज्य में पहली साइकिल रीवा स्टेट के चीफ रहे लाल बलदेव सिंह लाए थे। उस समय साइकिल केवल कलकत्ता, बंबई और मद्रास इत्यादि शहरों में चलती थी। लाल बलदेव सिंह साइकिल कलकत्ता से लाए थे, बता दें वही पहले व्यक्ति थे जो रीवा राज्य का पहला आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस भी लाए थे और छापाकला का प्रारंभ करते हुए रीवा राज्य के पहले अखबार भारत-भ्राता का प्रकाशन किया था। प्रारंभ में साइकिल रईसों की प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थीं, क्योंकि इन्हें खरीदना बड़ा मुश्किल कार्य होता था, और हर कोई भी इन्हें आसानी से नहीं खरीद सकता था।

रीवा स्टेट आर्मी में थी साइकीलिस्ट कंपनी

बताया जाता है साइकिल की सवारी उस शान की सवारी मानी जाती थी, जिनके यहाँ हाथी-घोड़ा और मोटरकार भी होती थी, वह भी शौक के लिए साइकल ले आते थे, साइकिल के साथ फ़ोटो खिंचवाना भी उस समय बड़ा प्रसिद्ध रहा है। 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही रीवा स्टेट आर्मी में एक साइकीलिस्ट कंपनी की स्थापना की गई थी, मतलब सेना की ऐसी कंपनी जो साइकिल से चला करती थी। रामपुर बघेलान से संबंध रखने वाले कर्नल रामेन्द्र सिंह इस कंपनी के हेड थे, राज्य सेना से अवकाश लेने के बाद भी साइकिल की सवारी किया करते थे। बताते हैं कर्नल साहब साइकिल में बैठ जाते, हैंडल संभाल लेते, दोनों पायडलों पर पैर जमा लेते और फिर उनका एक सेवक साइकिल ढोसता हुए वहाँ तक ले जाता था, जहाँ उन्हें जाना होता था।

जब साइकिल चलाने के लिए लगता था लाइसेंस! | Rewa Transport History

धीरे-धीरे समय के साथ साइकिल आम लोगों तक भी पहुँच गई, ग्रामीण क्षेत्रों में भी इनका चलन हो गया था। इसके बाद रीवा राज्य में साइकिल के लिए लाइसेंस जारी किए जाने लगे, मने उस समय आज के मोटरसाइकिल और कार की तरह साइकिल चलाने के लिए लाइसेंस अनिवार्य था। इसके साथ ही सुरक्षा की दृष्टि से उसके हैंडल पर घंटी और एक लैंप लगाना भी अनिवार्य था, जिससे यह रात के समय जले, ऐसा ना करने पर चालान भी काटा जाता था और चालान के डर से लोग ऐसा करवाते थे, बिल्कुल आज की तरह। साइकिल में लगे लैंप कारबाइड से जलते थे। हालांकि ग्रामीण क्षेत्र में यह नियम अनिवार्य नहीं थे, लेकिन नगर और कस्बों में यह जरूरी था। लाइसेंस म्यूनसिपल से बनवाया जाता था, गैर लाइसेंसी साइकिल चालकों का चालान होता था। बताया जाता है उस समय रेले, हैम्बर, हरकुलीज और बी. एस. ए. इत्यादि ब्रांड की साइकिल राज्य में खूब चलती थीं। साइकिल की उस समय क्या शान थी, कि लोग उन्हें धो-पोंछ के दीवार में टाँग कर रखते थे।

आजादी के समय हुआ निजी रिक्शे का चलन

राजधानी रीवा में यात्रियों को गंतव्य में आने-जाने के लिए तांगा और एक्का ही मात्र चलते थे। पर देश के आजादी तक यहाँ तीन रिक्शे आ गए थे, पर यह रिक्शे यात्रियों के लिए नहीं थे, बल्कि निजी रिक्शे थे। इसी में एक रिक्शा विंध्यप्रदेश के प्रथम प्रधानमंत्री कप्तान अवधेश प्रताप सिंह के पास था। बताया जाता है प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके आने-जाने के लिए स्टेट गैराज की तरफ से क्राइसलर कार लगा दी गई थी, पर फिर भी वह दफ्तर अर्थात सचिवालय अपने रिक्शा में बैठ कर ही जाते थे।

रीवा क्षेत्र में रेलवे का सफर

रीवा राज्य में रेलवे लाइन 1863 में आई जब प्रयाग के निकट नैनी से जबलपुर के मध्य पटरी बिछी और बघेलखंड पॉलिटिकल एजेंसी के दफ्तर होने और बघेलखंड और बुंदेलखंड के एकदम मध्य में होने के कारण सतना स्टेशन बना। इसके साथ गुलाबगंज अर्थात डभौरा में भी एक स्टेशन बनाया गया। हालांकि प्रारंभ में रेल में केवल अंग्रेज अफसर बैठते थे, भारतीयों को उसमें बैठने का अधिकार 1880 में मिला वह भी तीसरे दर्जे में। खैर कोयले की खोज बाद कटनी-बिलासपुर रेलवे लाइन योजना की तहत ही 1886 में रीवा राज्य के दक्षिणी क्षेत्रों में रेलवे आई। बाकि रीवा-सतना रेलवे का प्रारंभ वर्ष 1993 में हुआ।

कनेक्टिविटी का नया युग

और अब रीवा में एयरपोर्ट संचालित हो रहा है जहाँ से दिल्ली, इंदौर और रायपुर के लिए नियमित विमान सेवा चल रही हैं, हालांकि रीवा से पूर्व सतना में 1990 में विमान संचालन के प्रयास किए गए थे, लेकिन सफलता प्राप्त नहीं हुई थी। इसके साथ ही आने वाले समय में ललितपुर-सिंगरौली रेलवे लाइन के पूर्ण हो जाने के बाद पूरा विंध्यक्षेत्र ही देश के अन्य हिस्सों के साथ और भी सुगम रूप से जुड़ जाएगा।

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