नई दिल्ली। जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा को कर्ज के मामले में बड़ी राहत मिली है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने उनकी कर्ज चुकाने की योजना को मंजूरी दे दी है। इसके तहत 22,006 करोड़ से ज्यादा के कर्ज के मुकाबले करीब 6.5 करोड़ ही चुकाने होंगे। जिन लोगों ने सुभाष चंद्रा की कंपनियों से पैसे लेने का दावा किया है, उनका कुल दावा करीब 22 हजार करोड़ है। लेकिन एनसीएलटी से मंजूर योजना के मुताबिक उन्हें करीब 6.25 करोड़ ही मिलेंगे। बाकी रकम इस योजना के तहत वापस नहीं मिलेगी।
बड़ी कटौती को ‘हेयरकट
22,006 करोड़ के मुकाबले 6.25 करोड़ की रकम यानी कर्जदाताओं को हर 100 रुपए में 3 पैसे वापस मिलेंगे। मतलब 99.97 प्रतिशत रकम वापस नहीं मिलेगी। कर्ज के मामलों में इतनी बड़ी कटौती को ‘हेयरकट’ कहा जाता है। मंजूर योजना के अनुसार करीब 6.25 करोड़ कर्ज देने वालों को दिए जाएंगे। इसके अलावा 25 लाख इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के खर्च के लिए रखे गए हैं।
क्या है पूरा मामला
यह मामला विवेक इंनफरकाम कंपनी को दिए गए करीब 170 करोड़ के कर्ज से शुरू हुआ था। सुभाष चंद्रा ने इस कर्ज की गारंटी दी थी। कंपनी जब कर्ज नहीं चुका पाई तो कर्ज देने वाली कंपनी ने सुभाष चंद्रा से पैसे वसूलने की कोशिश की। इसके बाद उनके खिलाफ व्यक्तिगत तौर पर कर्ज चुकाने की कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान अलग-अलग कर्जदाताओं ने भी अपने दावे पेश किए। इस तरह दावों की रकम बढ़कर 22,006 करोड़ से ज्यादा हो गई।
बैंकों ने किया विरोध
कई बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने इस योजना का विरोध किया था। उनका कहना था कि 22 हजार करोड़ से ज्यादा के दावों के मुकाबले सिर्फ 6.25 करोड़ मिलना बहुत कम है। कुछ कर्जदाताओं ने सुभाष चंद्रा की संपत्ति को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि पहले उनकी संपत्ति और नेट वर्थ बहुत ज्यादा बताई जाती थी, लेकिन अब उनकी व्यक्तिगत संपत्ति की कीमत काफी कम बताई जा रही है।
अब आगे क्या होगा?
एनसीएलटी के फैसले के बाद अब सुभाष चंद्रा से जुड़े सभी कर्जदाताओं की अंतिम सूची बनेगी। इसके बाद 6.5 करोड़ की रकम बैंकों और दूसरी कर्ज देने वाली कंपनियों में बांटी जाएगी। इसके बाद मामले की बाकी कानूनी प्रक्रिया पूरी होगी और केस बंद हो जाएगा।
क्या बैंकों के 22 हजार करोड़ डूब गए?
इस मामले में ज्यादातर रकम वापस नहीं मिलेगी। करीब 99.97ः रकम की वसूली नहीं हो पाएगी। लेकिन जिन कंपनियों ने असल में कर्ज लिया था, उनके खिलाफ बैंक अलग से पैसा वसूलने की कोशिश कर सकते हैं। यानी बैंक उन कंपनियों की संपत्ति या दूसरी गारंटी के जरिए अपना पैसा वापस लेने की कोशिश जारी रख सकते हैं।
इस फैसले का क्या असर होगा?
यह फैसला आगे ऐसे मामलों में उदाहरण बन सकता है। अब अगर किसी बड़े कारोबारी पर बहुत ज्यादा कर्ज है और वह कम रकम चुकाने की योजना देता है, तो बैंक और दूसरे कर्जदाता इस फैसले को उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं। साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि कर्ज की बड़ी रकम होने के बावजूद अगर कर्जदाता किसी योजना को मंजूर कर देते हैं, तो छब्स्ज् उसे मंजूरी दे सकता है।




