सराभाई वर्सेज सराभाई के राउशेज यानी Rajesh kumar की जिंदगी का एक दौर ऐसा भी रहा है जब उन्होंने अपनी एक्टिंग छोड़कर खेती में अपना करियर बनाया था। बिहार के गया जिले लौटकर उन्होंने शुरू किया था ये सफर जो बिल्कुल भी आसान नहीं था। कुछ सालों में ही उन पर करीब 2 करोड रुपए का कर्ज भी हो गया था।
राजेश कुमार ने अपनी एक्टिंग छोड़ खेती क्यों शुरू की?
2017 में Rajesh kumar ने एक्टिंग के करियर से दूरी बनाकर अपने गांव बिहार गया चले गए थे। खेती में उनके दिलचस्पी सदगुरु के साथ जुड़ाव और 2017 के रैली फॉर रिवर्स अभियान के दौरान बढ़ी थी। राजेश के अनुसार व किसानों की समस्याओं को सिर्फ बाहर से समझने के बजाय खुद खेती करके समझने को इच्छुक थे। उन्होंने करीब 5 साल तक लगातार खेती और बागवानी को समझने की कोशिश की इस दौरान उन्होंने बड़े लेवल पर पेड़ लगाने का काम भी किया लेकिन कुछ प्राकृतिक आपदा और दूसरी परेशानियों के कारण उनकी मुश्किलें बढ़ गई। एक ऐसे इलाके में बाढ़ आई जहां लंबे समय से ऐसी स्थिति नहीं थी इसके बाद लगाए गए हजारों पौधे प्रभावित हो गए। बाद में कोविड महामारी और पानी की समस्या हो जाने से भी खेती के काम को झटका लगा।
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खेती से कैसे बढ़ा उनपर 2 करोड़ रुपये का कर्ज?
लगातार नुकसान और कमाई का स्थिर जरिया नहीं हो पाने के कारण राजेश कुमार पर करीब 2 करोड रुपए का खर्च हो गया। एक समय वह आर्थिक रूप से इतनी मुश्किल दौर में चले गए कि उन्हें अपने बेटे के स्कूल के बाहर सब्जियां तक बेचनी पड़ी थी। 2024 की जानकारी में उनके बैंक खाते में बेहद कम रकम बचने और आर्थिक संकट का भी जिक्र देखा गया है। हालांकि राजेश इस पूरे अनुभव को सिर्फ असफलता की तरह नहीं समझते उनका कहना है की खेती ने उन्हें जमीन किसान और जिंदगी को समझने का एक ऐसा अनुभव दिया जो शायद किसी और तरीके से उन्हें नहीं मिल सकता था।
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Rajesh kumar पर अब कर्ज की स्थिति क्या है?
अप्रैल 2026 में राजेश कुमार ने बताया था कि करीब 2 करोड रुपए की शुरुआती कर्ज का बड़ा हिस्सा बन चुका चुके हैं और लगभग 10 से 15% की रकम बाकी है यानी करीब 20 लख रुपए। इसके बाद वह दोबारा एक्टिंग की दुनिया में भी सक्रिय रहे हैं। राजेश कुमार की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि इसमें सिर्फ एक एक्टर की खेती में असफल होने के बारे में बात नहीं की गई है बल्कि उसे फैसले की कहानी है जिसमें उन्होंने अपनी सुरक्षित पहचान को छोड़कर एक बिल्कुल अलग क्षेत्र को समझने की कोशिश की और भारी आर्थिक नुकसान होने के बावजूद भी उसे अनुभव को बेकार नहीं समझा।

